*रमजानुल मुबारक के अहकाम* 


 *रोज़े की कज़ा* 
          (1) किसी उज़्र से रोज़ा कज़ा हो गया तो जब उज़्र जाता रहे जल्द अदा कर लेना चाहिए। ज़िंदगी और ताकत का भरोसा नहीं, कज़ा रोज़ों में इख्तियार है कि मुतवातिर रखे या एक एक दो दो करके रखे।
          (2) अगर मुसाफिर सफर से लौटने के बाद या मरीज़ तंदुरुस्त होने के बाद इतना वक्त न पाए कि जिसमें कज़ा शुदा रोज़े अदा करे तो कज़ा उसके ज़िम्मे लाज़िम नहीं। सफर से लौटने और बीमारी से तंदुरुस्त होने के बाद जितने दिन मिलें, उतने ही की कज़ा लाज़िम होगी।

वल्लाहू आलम बिस्सवाब