माह रमज़ान की फ़ज़ीलत और अहमियत
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माह रमज़ानुल मुबारक बड़ी बरकतों, सआदतों और नेमतों वाला महीना है। अल्लाह तआला ने जो बरकतें और सआदत इस मुबारक महीने के साथ खास फरमाई हैं वह किसी और महीने के साथ खास नहीं हैं। नीज़ जो बरकतें इस मुबारक महीने के अंदर किए जाने वाले नेक आमाल के साथ मखसूस हैं वह दूसरे महीनों में उन्हीं आमाल के साथ मखसूस नहीं हैं। इस महीने को अल्लाह तआला ने रोज़े और रात के कयाम के साथ खुसूसियत अता फरमाई है यानी सियाम रमज़ान और कयाम रमज़ान।नफ़्ली रोज़ा रमज़ानुल मुबारक के अलावा दूसरे महीनों में भी रखा जाता है और रात का कयाम, रमज़ानुल मुबारक की रातों के अलावा दूसरी रातों में भी होता है मगर जो फ़ज़ीलत माह रमज़ान की रातों के कयाम में है वह किसी और रात के कयाम में नहीं और जो फ़ज़ीलत, बरकत और सआदत माह रमज़ान के रोज़ों में है वह किसी और महीने के रोज़ों में नहीं। इसलिए कि इन आमाल की इस महीने के साथ एक खास निस्बत है और अल्लाह तआला को यह महीना बहुत अज़ीज़ है। इसलिए अल्लाह तआला ने फरमाया कि ’’रमज़ान मेरा महीना है, ,
नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वआलिही वसल्लम ने रोज़ेदारों के अजर के हवाले से इरशाद फरमाया :
عَنْ سَهْلٍ بن سعد قال : قال النبی صلی الله عليه وآله وسلم اِنَّ فِی الْجَنَّةِ بَابًا يُقَالُ لَه الرَّيان يَدْخُلُ مِنْه صَائمُوْنَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ لَا يَدْخُلُ مِنْه اَحَدٌ غَيْرُهُمْ يُقَالُ اَيْنَ الصَّائِمُوْنَ فَيَقُوْمُون لَايَدْخُلُ مِنْهُمْ اَحَدٌ غَيْرُهُمْ فَاِذَا دَخَلُوْا اُغْلِقْ فَلَمْ يَدْخُلْ مِنْهَ اَحَدٌ.
(صحيح البخاری، کتاب الصوم، باب الريّان للصائمين)
’’हज़रत सहल रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वआलिही वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि जन्नत में एक दरवाज़ा है जिस का नाम रय्यान है, रोज़-ए-कयामत इस में रोज़ेदार दाखिल होंगे उन के अलावा कोई दूसरा इस में से दाखिल नहीं होगा, कहा जाएगा रोज़ेदार कहां हैं? पस वह खड़े हो जाएंगे, उन के अलावा कोई दूसरा इस दरवाज़े में से दाखिल नहीं होगा और जब वह दाखिल हो जाएंगे दरवाज़ा बंद कर दिया जाएगा। पस इस से रोज़ेदारों के अलावा कोई दाखिल न होगा, , ।
जन्नत में तो बहुत सारे दरवाज़े हैं मगर एक खास दरवाज़ा है और इस दरवाज़े का नाम बाब अल-रय्यान है। अरबी ज़बान में रय्यान का एक मानी खूबसूरत फुहार वाली बारिश है। जिस से मौसम खुशगवार हो जाता है, न गर्मी की तपिश रहे और न बारिश का कीचड़ रहे।
रय्यान का दूसरा मानी सैराबी है, यह सैराबी, प्यास के बरअक्स है, प्यास को अल-अतश कहते हैं और शदीद प्यासे को अतशान कहते हैं लेकिन अगर कोई खूबसूरत, ठंडा, मीठा मशरूब पी के सैराब हो जाए, सैर हो जाए तो अतशान के मुकाबले में उसे रय्यान कहते हैं। गोया अतश और अतशान में जितनी प्यास है, रय्यान में उतनी ही सैराबी है।
यह दरवाज़ा सिर्फ माह रमज़ान के रोज़ेदारों के लिए मुख्तस होगा, रोज़ेदार इस दरवाज़े से गुज़ारे जाएंगे। इस की हिकमत क्या है?
दरहकीकत रोज़ा अल्लाह के लिए भूख और प्यास अपनाने का नाम है, रोज़ेदार अल्लाह के लिए प्यास अपना कर अतशान बन के जाएंगे, अल्लाह फरमाएगा मेरी खातिर अतशान होने वाले बंदों को रय्यान से गुज़ारो ताकि जन्नत में पहुंचने से पहले ही सैराब हो जाएं। पस आज की प्यास वहां की सैराबी से बदल जाएगी। अब फैसला हम पर है कि हम आज की प्यास को बर्दाश्त करके वहां की सैराबी के लिए अपने आप को किस कदर कमरबस्ता करते हैं।
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वआलिही वसल्लम ने फरमाया कि एलान कर दिया जाएगा कि सिवाए रोज़ेदारों के इस दरवाज़ों से किसी और को गुज़रने की इजाज़त न होगी। अल्लाह फरमाएगा कि यह दरवाज़े सिर्फ उन्हीं के लिए मुख्तस है जो मेरी खातिर भूखे और प्यासे रहते थे। अल्लाह तआला की तरफ से अमर होगा और आवाज़ दी जाएगी कि रोज़ेदार कहां हैं? पस इस आवाज़ को सुन कर रोज़ेदार मैदान-ए-कयामत में खड़े हो जाएंगे, अर्ज़ करेंगे मौला हम हाज़िर हैं, इस वक्त हुक्म होगा कि तमाम रोज़ेदार जन्नत में बाब अल-रय्यान से दाखिल हो जाएं और साथ ही फरमाया जाएगा कि इन रोज़ेदारों के सिवा इस दरवाज़े से और कोई दाखिल न हो और जब रोज़ेदार इस दरवाज़े से दाखिल हो जाएंगे तो दरवाज़ा बंद कर दिया जाएगा और फिर इस दरवाज़े से कोई और दाखिल न हो सकेगा। यह खास नेमत व सआदत अल्लाह तआला ने रोज़ेदारों के हिस्सा में रखी है।
हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वआलिही वसल्लम ने इरशाद फरमाया ’’जन्नत के कई दरवाज़े हैं जो नमाज़ी होंगे उन के लिए बाब अल-सलात होगा जो मुजाहिद होंगे उन को बाब अल-जिहाद से गुज़ारा जाएगा जो सदका व खैरात करने वाले होंगे वह बाब अल-सदका से गुज़ारे जाएंगे और जो रोज़ेदार होंगे उन्हें बाब अल-रय्यान से गुज़ारा जाएगा, , ।
अल्लाह तआला ने हर अमल के नाम पर एक दरवाज़ा रखा है और इस अमल के करने वाले उसी अमल के नाम वाले दरवाज़े से गुज़रेंगे। नमाज़ी है तो दरवाज़ा नमाज़ है। । । मुजाहिद है तो दरवाज़ा जिहाद है। । । सदका खैरात करने वाला है तो दरवाज़ा सदका है। इस उसूल पर चाहिए था कि रोज़ा रखने वालों के लिए बाब अल-सियाम होता, जिस तरह हर अमल का दरवाज़ा, फकत इस अमल के नाम पर है मगर रोज़ा रखने वालों के लिए दरवाज़ा बाब अल-सियाम के नाम से नहीं, क्यों? इसलिए कि यह लोग अल्लाह के लिए भूख प्यास बर्दाश्त करते हैं, लिहाजा अल्लाह ने इस दरवाज़े के नाम को मुख्तलिफ कर दिया और अपनी बारगाह की सैराबी के नाम पर बाब अल-रय्यान बना दिया और इरशाद फरमाया : कि जो रोज़ेदार होंगे उन्हें बाब अल-रय्यान से गुज़ारा जाएगा। अगर इस दरवाज़े का नाम बाब अल-सियाम होता यानी रोज़ों के नाम से ही दरवाज़ा होता तो इस दरवाज़े की कद्रो मनज़िलत भी दूसरे आमाल वाले दरवाज़ों के बराबर हो जाती। यहां नाम अमल के नाम पर नहीं बल्कि अमल के अजर के नाम पर रखा है और अजर क्या है? दीगर आमाल के अजर नेकियां हैं, किसी ने कोई नेक अमल किया तो दस, सौ या सात सौ नेकियां मिल गईं यानी अजर नेकियों की तादाद में मिला।
فَمَنْ جَآءَ بِالْحَسَنَةِ فَلَه عَشْرُوْا اَمْثَالِهَا.
’’जो एक नेकी करता है उस को दस गुना अजर मिलता है, , ।
हर अमल का अजर तादाद के हिसाब से मुकर्रर है और हर अमल का दरवाज़ा इस अमल के नाम पर मुकर्रर है मगर रोज़े के लिए अजर न नेकियों की तादाद में है न दरवाज़ा, अमल के नाम पर है बल्कि रोज़े के अजर के बारे में फरमाया कि
اَلصَّوْمَ لِيْ وَاَنَا اَجْزِيْ به
’’रोज़ा खास मेरे लिए है और मैं ही इस की जज़ा दूंगा, , ।
वह जज़ा क्या है? रोज़े की जज़ा को अल्लाह तआला ने दीगर आमाल की तरह वाज़ेह नहीं फरमाया बल्कि छुपा कर रखा है। इस अजर की थोड़ी सी झलक हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वआलिही वसल्लम के इस इरशाद मुबारक से सामने आ रही है।
لصائم فرحتان يفرحهما اذا افطره فرح واذا لقی ربه فرح.
(صحيح البخاری کتاب الصوم)
’’रोज़ेदार के लिए दो खुशियां हैं एक खुशी इफ्तार के वक्त और एक खुशी दीदार के वक्त, , ।
रय्यान का मानी इस हदीस के साथ मिलाकर समझने से मज़ीद वाज़ेह हो जाएगा कि रोज़े के अमल के मुताबिक इस का दरवाज़ा इस के नाम पर न रखने की वजह यह है कि बकिया आमाल के अजर नेकियों की तादाद के लिहाज़ से बता दिए गए इसलिए दराज़े का नाम भी अमल के नाम पर रख दिया गया मगर चूंकि अल्लाह ने रोज़े के अजर का एलान नहीं किया इस लिए इस अजर के नाम पर दरवाज़े का नाम रख दिया गया कि रोज़ेदारों का दरवाज़ा सैराबी का दरवाज़ा है और सैराबी किस चीज़ की? फरमाया कि रोज़ेदार के लिए मेरे दीदार के सिवा किसी और शय में सैराबी है ही नहीं। फरमाया : ऐ रोज़ेदार तू ने मेरी खातिर भूख बर्दाश्त की, आज अपने दीदार के ज़रिए तेरी भूख को रफा करता हूं। । । तू ने मेरी खातिर प्यास बर्दाश्त की आज अपने दीदार के शरबत से तेरी प्यास को दूर करता हूं। । । तू ने मेरी खातिर अपने नफ्स की लज़्ज़तों को खैर बाद कहा आज मैं अपने दीदार के ज़रिए तुझे अपनी कुर्बतों की लज़्ज़त अता करता हूं। । । तू ने मेरी खातिर अपने ऊपर बहुत सी राहतें हराम कर लीं आज मैं अपने विसाल की राहत से तुम्हें हमकिनार करता हूं।
पस यह सैराबी अल्लाह की कुर्बत से, अल्लाह के विसाल और दीदार से है।
जमाल-ए-यार की हसरत में जो मरीज़ हुआ*
जमाल-ए-यार ही उन का तबीब होता है
इसी मफहूम को किसी शायर ने फारसी में यूं बयान किया।
از سرِ بالین من برخیز اے نادان طبیب
*درد مندے عشق را دارو بجز دیدار نیست
!!!अज़ कलम मौलाना सोहैब अहमद۔۔۔