आज वह बेहद खुश थी। उसका चेहरा मनशूर की सी खासियत रखे हुए था कि एक मध्यम सी रोशनी भी पड़ती तो सात विभिन्न रंगों में विभाजित होकर पलट रही थी। लोगों का जमघट, उनकी तरफ से मिलने वाले दुआंईया कलमात, मुबारकबाद गो कि हर लम्हा फराहत बख्श महसूस हो रहा था। क्योंकि के ये तमाम बातें कुछ ऐसे अशखास के मुंह से भी निकल रही थी जो कभी फजूलियात भरी बातें और ताने दिया करते थे। और ये तमाम बातें सिवाय अज़ियत के कुछ न थीं।
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           अब तक ज़रूरियात ज़िन्दगी मामूल के मुताबिक रवां दवां थीं। खाने, कपड़े, मामूली मकान जो रहने के लिए काफी था सब कुछ अल्लाह के फज़ल से मयस्सर था। इसी बीच वक़्त इतनी तेज़ी से गुज़रा कि एहसास भी न कराया। ना जाने आंचल पकड़ कर खेलती हुई बच्चियां कब खुद ही आंचल को संभालने के काबिल हो गईं कुछ खबर ही न हुई। दहलीज के अंदर पड़े हुए कदम को खुशी से बाहर निकालने का वक़्त आ गया था। निगाह किसी मर्द की मुंतज़िर थी। जो खुशी से उसकी बेटी का हाथ थाम कर ज़िन्दगी के तमाम रास्तों को पार कराता। वक़्त गुज़रता गया। निगाह थी कि वह मुंतज़िर ही रही।
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। बाजी आप बज़िद क्यों हैं कि कोई ऐसा लड़का जिस में मर्द की खासियत होगी आपकी बेटी को ब्याहेगा? बड़े ताज्जुब से पड़ोसन ने यह बात कही।
दिन में ख्वाब देखना छोड़ दें। मैं यह नहीं कह रही कि ऐसा कोई नहीं है जिसे सिर्फ समझदार, दीनदार और सलीका मंद बहू या बीवी चाहिए उनका जहेज़ से कोई लेना देना नहीं होता। ऐसे लोग हैं तो ज़रूर मगर आटे में नमक के बराबर, अब तो बदसूरत, बदचलन भी हो तो लोग पैसों में ढांप लेते हैं। मैं आपकी बातों को समझती हूं क्योंकि हमारा इस्लाम भी तो यही कहता है कि हमने मर्द को औरतों पर हाकिमियत दी है और एक हाकिम का फ़र्ज़ है कि वह अपने मातहतों की ज़रूरतों का ख्याल रखे ना कि मातहतों से अपनी ज़रूरतों और ख्वाहिशों को पूरा करवाए। हदीस का मफहूम है कि खुद नबी करीम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि लोग औरतों से चार चीज़ों की बिना पर निकाह करते हैं। उसके हसब नसब की वजह से, मालदारी से, खूबसूरती से तुम इन में दीनदारी को पसंद करो।
               लेकिन आज कल न जाने लोगों के बच्चे कैसे होते हैं कि वह तलाश में होते हैं किसी ऐसे घराने की जो उन के लड़कों को कुछ बना दें पड़ोसन ने बड़ी हैरत का मुज़ाहरा रते हुए अपनी बात को आगे बढ़ाया और मुखातिब हुई ;
बाजी! मुझे एक बात समझ नहीं आ रही है कि, अल्लाह ने उन्हें बेहतरीन साख़्त, शक्ल व सूरत वाला, अक़्ल ए सलीम दे कर मर्द ए कामिल बना कर तो भेजा है आखिर अब उन्हें क्या बनाने की डिमांड करते हैं?
वह मुस्कुरा कर पड़ोसन की तरफ देखी और खामोश नज़रों से बहुत कुछ कह गुज़री।

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           उस की हम उम्र लड़कियों की शादियां हो रही थीं। कुछ की तो शादी हुए ज़माना बीत चुका था। लोगों की सवालिया नज़रें जब उसकी तरफ उठती तो उसे सिर्फ उन्ही ही बात का मलाल होता कि काश! वह भी एक बड़े बाप की औलाद होती या फिर निहायत गरीब बाप की, या फिर उसका कोई वजूद ही न होता। क्योंकि बड़े घरानों में पैदा होने वाली लड़कियों की शक्ल व सूरत, हुनरमंदी आड़ नहीं होती थी हर कोई ब्याह कर अपनी घर लाने की ख्वाहिश रखता था। क्योंकि उनकी नज़र में सिर्फ दौलत की वक़्अत हुआ करती है। उन्हें नस्लों की बेहतरीन परवरिश करने वाली माओं की ज़रूरत नहीं होती। और वालिदैन भी अपनी बेटियों के लिए बड़े शौक से अच्छी कीमत पर दूल्हा खरीद लिया करते हैं। उन के लिए ये सब एक तफरीह का, खुश होने का मौका हुआ करता है। रही बात गरीबों की, तो वह गरीब होते हैं। हर तरफ से मुआशरे के कुछ तबकात मदद के लिए आगे हाथ बढ़ा दिया करते हैं वह अपने फ़र्ज़ से अदा हो जाते हैं। मामूली तनख्वाह से ज़रूरियात ए ज़िन्दगी पूरी करने वाला खुददार खानदान ज़ाईद ज़रूरतों को पूरा करने से क़ासिर था। उन के यहां सिर्फ बच्चियों की सही परोश, उनकी बेहतरीन तरबियत, हुनरमंदी, दीनदारी और सलीका मंदी जैसे सरमाए मौजूद थे। लेकिन सौदागर की कमी थी।
     उस ने अपनी बेटियों को हमेशा यही तरबियत दी कि यहां जो चीज़ें मयस्सर हैं हो सकता है कि वह दाईमी न हों जहां तुम जाओगी हो सकता है ये चीज़ें तुम्हें न मिलें। तो कभी इस की शिकायत न करना। अगर इस से बेहतर मिल जाए तो कभी भी अपनी हैसियत न भूलना। इंसान एक मुसाफिर है और ज़िन्दगी उसकी गाड़ी है अगर वह लग्ज़री हो तो क्या हुआ मंज़िल पर पहुंचने पर आप को इस पर से उतरना ही है। अगर सवारी तकलीफदेह हो तो भी तो मंज़िल पर पहुंचने पर उतर जाना है। फानी चीज़ों पर क्या शिकायत और कैसा घमंड करना। ससुराल में जाने के बाद खुदा रा किसी चीज़ के न होने की शिकायत न करना जो तुम्हें यहां मयस्सर है, और जो मिल जाए उस पर खुदा का शुक्र बजा लाना।

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        आखिर वह दिन आ ही गया जब उसकी बेटी दुल्हन बनी स्टेज की खूबसूरती में चार चांद लगा रही थी। और वह दौड़ दौड़ मेहमानों की ज़ियाफ़त कर रही थी। लोग बड़े पर जोश से मिल रहे थे। वह बहुत खुश थी। फ़र्ज़ से अदायगी उसे राहत बख्श रही थी। उसके चेहरे से सब कुछ साफ़ अयां था। मगर दिल में एक मलाल था। रंजिश थी। और ख्वाहिश थी कि जो अधूरी ही रही। चौदहवीं के चमकते चांद के पीछे अबर के घने बादल भी थे। खुशी देने के लिए अपने हिस्से में गम को भी खरीदा था। उस ने पड़ोसन की बात मान ली थी। और वह सच भी थी कि आखिर उसे अपनी बेटी के लिए हमसफ़र चंद ज़मीन के टुकड़े को फ़रोख्त कर के, क़र्ज़ में डूब कर के खरीदना पड़ा। खैर वह अज़ियत से ही सही अपने फ़र्ज़ से अदा हो गई। मगर हमारे मर्दों की गैरत कहां खो गई। अपने ही हाथों से जहेज़ के सामान को तरतीब से अपने घरों में सजाते हैं। दुल्हन दो दिन बाद और दूल्हे की कीमत (जहेज़) दो दिन पहले ही हमारे घरों की ज़ीनत बन जाती है। यह मज़मून पढ़ रहे हैं। हमें गम भी है। लेकिन हम शामिल भी उन्ही में रहने वाले हैं।

             खुदाया दे वह माएं जो जने मर्दान ए मोमिन को
              शरीयत का जो क़ाइद, पासबान ए दीन ओ मिल्लत हों

                                     अज़ क़लम : शेख ज़ीनत अबु तालिब