रमज़ान अल-मुबारक की पुरनूर आमद

रमज़ान मुबारक अल्लाह तआला की वो अज़ीम और बेमिसाल नेमत है जो साल में सिर्फ़ एक मर्तबा नसीब होती है, और ख़ुशनसीब हैं वो लोग जो इस बाबरकत महीने की क़द्र व क़ीमत को पहचानते और इसके लम्हात को ग़नीमत जानते हैं। अब इस मुक़द्दस महीने की आमद में चंद ही लम्हे बाक़ी रह गए हैं। ज्योंही ये माह-ए-रहमत तुलू होता है, फ़ज़्ल व मग़फ़िरत के दरवाज़े खुल जाते हैं और अल्लाह तआला अपने बंदों पर बेशुमार बरकतें नाज़िल फ़रमाता है। इस महीने के दिन और रातें ख़ुसूसी रहमत का पैग़ाम लेकर आती हैं, दुआएँ क़बूलियत का शरफ़ पाती हैं, नेक आमाल के अजर को कई गुना बढ़ा दिया जाता है, और गुनाहगारों और ख़ताकारों को अपनी बेपायाँ रहमत के साए में माफ़ फ़रमा दिया जाता है।
नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है: जब रमज़ान क़रीब आता है तो जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, जहन्नम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं, सरकश शैतानों को जकड़ दिया जाता है और अल्लाह तआला की जानिब से एक मुनादी एलान करता है: ऐ बुराई के ख़्वाहिशमंद! बाज़ आ जा, और ऐ भलाई के तलबगार! आगे बढ़। (बुख़ारी)

माह-ए-सियाम इस वक़्त तुलू हो रहा है जब मुसलमान मु्तलिफ़ और पेचीदा मसाइल में घिरे हुए हैं, जिन का मुक़ाबला करना अल्लाह तआला की ख़ास मदद और नुसरत के बग़ैर मुमकिन नहीं, वही मदद जिस का वादा उस ने अपने मोमिन बंदों से फ़रमाया है: ये वो लोग हैं कि अगर हम इन्हें ज़मीन में इक़्तेदार अता करें तो वो नमाज़ क़ायम करेंगे, ज़कात अदा करेंगे, नेकी का हुक्म देंगे और बुराई से रोकेंगे। और तमाम उमूर का अंजाम अल्लाह ही के हाथ में है। (अल-हज २२:४१)
आज मुसलमान वादी-ए-नील, फ़लस्तीन और जज़ाइर-ए-अरब जैसे संगीन मसाइल से दोचार हैं, इसी तरह हिंदुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और मुस्लिम मुमालिक में मुस्लिम अक़ल्लियत को दरपेश मुश्किलात भी निहायत तशवीशनाक हैं। इस के अलावा यूरोप और अफ़्रीक़ा में भी मुसलमान बेशुमार गुमभीर मसाइल में घिरे हुए हैं, जिन से नजात अल्लाह तआला की ख़ास मदद के बग़ैर मुमकिन नहीं। और ये हक़ीक़त है कि अल्लाह की नुसरत नाफ़रमानी से नहीं बल्कि इताअत व फ़रमाँ बरदारी से हासिल होती है।
लिहाज़ा इस अज़ीम और बाबरकत मौक़े से भरपूर फ़ायदा उठाने के लिए ख़ुद को तैयार कीजिए। अपने दिलों को हर तरह की आलइश से पाक कीजिए, अपने नफ़्स को नेकी पर आमादा कीजिए, पूरे शौक़ और इख़्लास के साथ रमज़ान का इस्तिक़बाल कीजिए, कसरत से तौबा व इस्तिग़फ़ार का एहतिमाम कीजिए और हर हाल में अल्लाह से अपना रिश्ता मज़बूत रखिए, ताकि अल्लाह आप के साथ रहे। जब अल्लाह साथ हो तो वो अपनी मदद व नुसरत नाज़िल फ़रमाता है, और जिस पर अल्लाह की मदद हो, उस पर कोई ग़ालिब नहीं आ सकता।

इबादत की हिकमत
इस्लाम में जिन आमाल और इबादात को फ़र्ज़ या वाजिब क़रार दिया गया है, उन के पस-ए-पुश्त बड़ी गहरी हिकमत पोशीदा है। अल्लाह तआला ने अपने बंदों पर बेपनाह शफ़क़त फ़रमाते हुए उन के लिए ऐसे उसूल मुक़र्रर का है जो उन की दुनिया व आख़िरत की कामयाबी और फ़लाह का ज़रिया बनते हैं। 
अल्लाह के हुज़ूर क़बूल होने वाली इबादत की सब से बुनियादी शर्त ख़ुलूस-ए-नियत और दिल की यकसूई है। अगर इबादत में अल्लाह की रज़ा मक़सूद न हो तो वो बे रूह रह जाती है, न उस की कोई क़द्र होती है और न ही इस पर कोई अजर मिलता है। इसी लिए नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि बहुत से रोज़ादार ऐसे होते हैं जिन्हें अपने रोज़े से सिवाए भूख और प्यास के कुछ हासिल नहीं होता।
इस्लाम का दूसरा नुमायाँ उसूल ये है कि वो बंदों को तंगी और मुशक़्क़त में नहीं डालता बल्कि आसानी और सहूलत फ़राहम करता है। इसी बिना पर मरीज़ को रोज़ा छोड़ने की इजाज़त दी गई है ताकि सेहत याब होने के बाद इस की क़ज़ा कर सके, और अगर सेहत की उम्मीद न हो तो फ़िदया अदा करे। याद रखना चाहिए कि बग़ैर किसी उज़्र के इबादत तर्क करना दरअस्ल हमेशा की महरूमी और नुक़सान का सबब बनता है।
तीसरा निहायत अहम पहलू ये है कि इन तमाम इबादात के असरात इंसान की इन्फ़िरादी और इज्तिमाई ज़िंदगी में नुमायाँ तौर पर ज़ाहिर होने चाहिएँ। ये फ़राइज़ महज़ रस्मी अदायगी या ज़ाहिरी इबादत के लिए मुक़र्रर नहीं किए गए, बल्कि इन का मक़सद आख़िरत की कामयाबी के साथ साथ दुनियावी ज़िंदगी की इस्लाह, किरदार की तामीर और मुआशरे की बेहतरी भी है। इस्लाम ने कोई ऐसा अमल फ़र्ज़ नहीं किया जिस के समरात इंसान की अमली ज़िंदगी में झलकते न हों। शरीअत ने जिस चीज़ का हुक्म दिया है, वो सरासर ख़ैर और भलाई पर मबनी है और बंदों की ज़िंदगी पर इस के मुस्बत और ख़ुश गवार असरात मुरत्तब होते हैं, और जिस काम से मना किया है, वो इस लिए कि वो इंसानी ज़िंदगी के लिए नुक़सानदेह, तबाह कुन और बिगाड़ का सबब बनता है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है: पस आज ये रहमत उन लोगों के लिए है जो इस पैग़ंबर, नबी उम्मी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पैरवी इख़्तियार करते हैं, जिन का ज़िक्र वो अपने पास तौरात और इंजील में लिखा हुआ पाते हैं। वो इन्हें नेकी का हुक्म देते हैं, बुराई से रोकते हैं, इन के लिए पाकीज़ा चीज़ों को हलाल और नापाक चीज़ों को हराम क़रार देते हैं, और इन पर से वो बोझ उतार देते हैं जो इन पर लदे हुए थे और वो बंदिशें खोल देते हैं जिन में वो जकड़े हुए थे। (अल-आराफ़ ७:१५७)
मैं मुस्लिम हुकूमतों से पुरज़ोर अपील करता हूँ कि वो दीगर मुल्की क़वानीन की ख़िलाफ़ वर्ज़ी करने वालों की तरह रमज़ान मुबारक के महीने में बिला उज़्र-ए-शरई रोज़ा न रखने वालों के लिए भी मुनासिब और मुअस्सिर सज़ाएँ मुक़र्रर करें, ताकि किसी को इस माह-ए-मुक़द्दस की हुरमत पामाल करने की जुरअत न हो। इस सिलसिले में सिर्फ़ चंद सरकारी महकमों की जानिब से अपने ज़ैली इदारों को रमज़ान के एहतिराम पर मुश्तमिल रस्मी हिदायात जारी कर देना काफ़ी नहीं, क्यूँकि उमूमन न इन पर अमल किया जाता है और न ही इन की ख़िलाफ़ वर्ज़ी पर कोई अमली कार्रवाई की जाती है। लिहाज़ा हुकूमत को चाहिए कि वो अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करते हुए इस हवाले से संजीदा, ठोस और मुअस्सिर इक़दामात उठाए, ताकि मुआशरे में रमज़ान मुबारक के तक़द्दुस और अज़्मत का हक़ीक़ी तौर पर तहफ़्फ़ुज़ हो सके।

नेकियों का मौसम-ए-बहार
इस्लाम में इबादत महज़ किसी क़ानूनी तक़ाज़े की अदायगी या किसी ज़ाहिरी बोझ से सुबुकदोश होने का नाम नहीं, बल्कि ये रब-ए-काइनात और बंदा-ए-मोमिन के दरमियान क़ायम होने वाले उस पाकीज़ा और लतीफ़ रूहानी रिश्ते की अलामत है, जो दिलों को नूर-ए-ईमान से मुनव्वर और सीनों को सकीनत व इत्मीनान से लबरेज़ कर देता है। ये इबादात इंसानी रूह में ऐसी सरमदी रौशनी बिखेरती हैं जो गुनाहों की सियाही, वसवसों की घटा और अंदेशों की तारीकी को चाक कर देती है। सब से बढ़ कर ये कि इंसान की असल इज़्ज़त व सर बुलंदी इसी में है कि वो ख़ाक से उठ कर इबादत के ज़रीए अर्श-ए-इलाही तक रसाई हासिल करे और रब-ए-ज़ुलजलाल के हुज़ूर सर बसजूद हो कर राज़ व नियाज़ के नज़राने पेश करे।
रमज़ान मुबारक इताअत व इबादत का वो दिलकश मौसम-ए-बहार है जिस में अल्लाह तआला बंदों के शब व रोज़ को नूर, बरकत और रहमत के गुल हाय रंगारंग से आरास्ता फ़रमा देता है, और यही इस महीने के हुस्न व जमाल का हक़ीक़ी जौहर है। इताअत गुज़ारी अगरचे हर वक़्त मतलूब और हर आन महबूब है, मगर रमज़ान में इस की क़द्र व क़ीमत, तासीर व मअनोवियत और लुत्फ़ व लज़्ज़त कई गुना बढ़ जाती है। इस महीने की रूह और इस का जौहर रोज़ा है, जो महज़ भूख और प्यास का नाम नहीं बल्कि ज़ब्त-ए-नफ़्स, तहज़ीब-ए-इरादा और ततहीर-ए-शऊर का जामे उनवान है। रूहानी एतबार से अपनी फ़िक्र, नीयत और ज़िंदगी के तमाम ज़ावियों को अल्लाह तआला की रज़ा और इस के क़ुर्ब के हुसूल का मेहर बना लेना ही तक़वा है, और रोज़ा इस तक़वा को जला बख़्शने, उसे परवान चढ़ाने और दिल की ज़मीन में ईमान की शादाबी पैदा करने का सब से मुअस्सिर और बाबरकत वसीला है।

क़ुरआन से ख़ुसूसी ताल्लुक़
रमज़ान मुबारक वो बाबरकत महीना है जो दिलों को क़ुरआन के नूर से मुनव्वर करने, रूहों को इस की हरारत से ज़िंदा करने और ज़िंदगियों को इस की हिदायत से हम किनार करने का पैग़ाम लेकर आता है। यही वो महीना है जिस में क़ुरआन-ए-मजीद नाज़िल हुआ, इसी लिए इस माह-ए-मुक़द्दस में कलाम-ए-इलाही के साथ ख़ुसूसी ताल्लुक़ क़ायम करना, कसरत से इस की तिलावत करना और दिल की गहराईयों से इस के मआनी में ग़ोताज़न होना ईमान की ताज़गी और रूह की बालिदगी का सब से मुअस्सिर ज़रिया है। हज़रत जिब्रील-ए-अमीन अलैहिस्सलाम हर साल रमज़ान में बारगाह-ए-मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम में हाज़िर हो कर क़ुरआन-ए-हकीम सुनते थे, और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हयात-ए-तैयबा के आख़िरी बरस ये सआदत दो बार नसीब हुई। ये वही क़ुरआन है जो सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम के सीनों में महफ़ूज़ था, वही कलाम-ए-रब्बानी जो हमारे असलाफ़ के क़ुल्ब की धड़कन था, और वही सहीफ़ा-ए-हिदायत जो आज भी हमारे हाथों में मौजूद है।
फिर आख़िर क्या सबब है कि यही क़ुरआन उन की ज़िंदगियों में इंक़लाब बन कर उतरा और हमारी ज़िंदगियों में महज़ तिलावत बन कर रह गया? क्यूँ इस के नूर ने उन के अख़लाक़ को सँवारा, किरदार को निखारा और मुआशरे को बदल दिया, मगर हमारे अंदर वो हरारत, वो तासीर और वो हमहगीर तबदीली पैदा न हो सकी? क्यूँ हमारे दिल इस की आयात से लरज़ते नहीं, हमारी आँखें नम नहीं होतीं और हमारी ज़िंदगियाँ इस के साँचे में नहीं ढलतीं?
इस का राज़ ये है कि उन्होंने क़ुरआन को महज़ पढ़ा नहीं बल्कि जिया; उन्होंने इस पर ईमान ही नहीं लाया बल्कि इस के सामने सर-ए-तस्लीम ख़म किया; उन्होंने इस के अहकाम को अल्फ़ाज़ की हद तक महदूद नहीं रखा बल्कि अमल के क़ालिब में ढाल दिया; उन्होंने अपनी ख़्वाहिशात, इरादों और तरजीहात को इस की मर्ज़ी के ताबे कर दिया। वो क़ुरआन के क़ारी नहीं बल्कि इस के तर्जुमान थे, वो इस के सामए नहीं बल्कि इस के अमीन थे। इसी लिए तो डॉक्टर इक़बाल का ये शेर बड़ा मक़बूल है: 
वो ज़माने में मुअज़्ज़ज़ थे मुसलमाँ हो कर 
 और आज हम ख़ार हुए तारिक़-ए-क़ुरआँ हो कर 
आज भी अगर हम इस किताब-ए-हिदायत को इसी सिद्क़-ए-दिल, इसी ख़ुलूस-ए-नियत और इसी सुपुर्दगी-ए-कामिल के साथ थाम लें, तो बईद नहीं कि हमारे वजूद में भी वही नूर उतर आए, हमारे अख़लाक़ में भी वही इंक़लाब बरपा हो जाए और हमारी ज़िंदगियों में भी वही ताज़गी और शादाबी लौट आए। शर्त सिर्फ़ ये है कि हम इस के हलाल को हलाल जानें, इस के हराम को हराम मानें, इस की आयात में तदब्बुर करें, इस के अहकाम को नाफ़िज़ करें और अपनी पूरी ज़िंदगी को इस के नूर में ढाल दें। अब ये सवाल हमारे सामने है कि क्या हम इस अज़ीम तबदीली के लिए तैयार हैं?

सदक़ा और कसरत-ए-इस्तिग़फ़ार
रमज़ान मुबारक की इम्तियाज़ी खुसूसियात में कसरत-ए-सदक़ा व ख़ैरात और ग़रीबों, मोहताजों और मसाकीन की दस्त गिरी को नुमायाँ मक़ाम हासिल है। ये वो महीना है जिस में दिलों में ईसार की चिंगारी भड़कती और हाथों में सख़ावत की रवानी उतर आती है। नबी-ए-रहमत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सरापा जूद व सख़ा थे, मगर रमज़ान में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की फ़ैयाज़ी तेज़ रफ़्तार हवा की मानिंद हो जाती थी, जो बिला रोक टोक हर सम्त ख़ैर व बरकत बिखेरती चली जाती है। गोया ये महीना इंसान को महज़ इबादत गुज़ार नहीं बल्कि दर्द-ए-दिल रखने वाला, हमदर्द और ग़म गुसार बनने की तरबियत देता है।
इसी तरह दुआ और कसरत-ए-इस्तिग़फ़ार भी इस माह-ए-मुक़द्दस की ख़ास इबादात में शामिल हैं। ये दुआओं की क़बूलियत का मौसम-ए-बहार है, जिस में रहमत-ए-इलाही के दरवाज़े खुल जाते हैं, माँगने वालों की झोलियाँ भर दी जाती हैं और तौबा करने वालों की लग़्ज़िशें माफ़ कर दी जाती हैं। रोज़ेदार की दुआ रद्द नहीं की जाती, बल्कि बारगाह-ए-इलाही में क़बूलियत का शरफ़ पाती है। लिहाज़ा ऐ मेरे मुसलमान भाइयो! कहीं ऐसा न हो कि ये मुबारक रातें यूँ ही ग़फ़लत की नज़र हो जाएँ और हम अल्लाह की बेपायाँ रहमतें समेटे बग़ैर, इस की रज़ा हासिल किए बग़ैर ही इस माह-ए-अज़ीम से रुख़्सत हो जाएँ।
आज जब हर सम्त नफ़सा नफ़सी का आलम है, दिल बेचैन और रूह बेक़रार है, अल्लाह तआला ने रमज़ान मुबारक को सुकून-ए-क़ल्ब और इत्मीनान-ए-रूह का सामान बना दिया है। इस महीने में दिन को रोज़े के ज़रीए दुनियावी लज़्ज़तों, नफ़सानी ख़्वाहिशात और लग़्व मशग़ाल से किनारा कशी इख़्तियार की जाती है, और रात को क़ियाम, तिलावत-ए-क़ुरआन और मुनाजात के नूर से दिलों को मुनव्वर किया जाता है। यूँ ये महीना इंसान को ज़ाहिरी व बातिनी ततहीर का पैग़ाम दे कर उसे क़ुर्ब-ए-इलाही की शाहराह पर गामज़न कर देता है।

मेरे अज़ीज़ भाइयो! ये लम्हे बड़ी सआदत और अज़ीम नेमत ले कर आए हैं, इस लिए इस मौक़े से भरपूर फ़ायदा उठाते हुए पहले ही दिन से पुख़्ता अज़्म और मज़बूत इरादे के साथ इस में दाख़िल हो जाइए। अपने दिल व दिमाग़ को हर आन तौबा व इस्तिग़फ़ार से ज़िंदा रखिए और अपनी कोताहियों पर नदामत के साथ बारगाह-ए-इलाही में रुजू करते रहिए। क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत को महज़ मामूल न बनाइए बल्कि ग़ौर व फ़िक्र, तदब्बुर और ख़ुशू व ख़ुज़ू के साथ उसे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाइए। अपने नफ़्स को रोज़े की बरकतों, इस की रूहानी तासीर और इस के अज़ीम फ़वाइद से रोशनास कराइए। हत्तल इमकान क़ियामुल लैल का एहतिमाम कीजीए कि यही लम्हात क़ुर्ब-ए-इलाही के ख़ास मवाक़े होते हैं। ज़िक्र व फ़िक्र में ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त सर्फ़ कीजीए ताकि दिल की दुनिया रोशन हो और रूह को ताज़गी नसीब हो। माद्दियत के फ़ितनों से अपनी रूह की हिफ़ाज़त कीजीए और पूरी कोशिश कीजीए कि इस माह-ए-मुबारक के इख़्तिताम पर आप का शुमार मुत्तक़ियों और परहेज़गारों में हो।

तहरीर: मोहम्मद फ़िदा अल-मुस्तफ़ा क़ादरी 
राब्ता नंबर: 9037099731
पी स्कॉलर: दारुल हुदा इस्लामिक यूनिवर्सिटी