आब खुरे से जरअ नोशी का शरफ
गुल रज़ा राही अररियावी
✍🏻मौजूदा ज़माने में जहां उम्मत वाहियात और लगवियात जैसे कामों का खूगर है यही चीजें इन का मह्व-ए-ख्वाब बना हुआ है, ऐसे माहौल में कुछ लम्हा अल्लाह वाले या मस्जिदों, मकातिब और मक्तबात के शजर-ए-सायादार में गुज़रना यह मिन्जानिब अल्लाह खास तौफीक व इनाम है, और जिसे यह मौका मयस्सर आ जाए तो वह खुशनसीब है उसे अपनी नसीबा आवरी पे फरहां व नाज़ां होना चाहिए, बफज़्लिल्लाह व औनही इस नाचीज़ को यह मौका मयस्सर हुआ-
वल्लाह यफअल मा यशा
२१ मुहर्रमुल हराम १४४६ हिजरी मुताबिक २८ जुलाई २०२४ उस्ताद मोहतरम मुफ्ती आसिम मुबश्शिर कासमी साहब के अम्र-ए-आली से जामिया इस्लामिया अरबिया जामा मस्जिद अमरोहा के दारुल मुताला में हाज़िरी का शरफ हासिल हुआ -
दारुल मुताला तफसीर, हदीस, सीरत, फिकह व फतावा, तारीख वगैरह की बेशुमार कुतुब-ए-गालिया का वकी खजाना है, फारसी, अरबी की बहुतायत है, बहुत सी बोसीदा किताबें अलमारी की जीनत बनी हुई है, अहकर ने कुछ किताबों की वरक गर्दानी की, किताबों की बोसीदगी ऐसी की थोड़ी चौंक से किताब शक्क हो जाए, , कुछ कदीम उर्दू फारसी आमेज़ किताब ऐसी कि जो मेरी मुबल्लिग फहम से भी बालातर थी, ऐसी किताब कि जिस में तहकीकी रिवायत थीं, उस्ताद मोहतरम ने एक किताब मुझे दे दी, मैं ने औलन किताब के नाम तलाश किए मगर नहीं मिला, तो मैं ने वुजूह-ए-तालीफ का मुताला किया तो मालूम हुआ कि किताब का नाम "रद्द खतरात" है, जो कि सर सैय्यद खां साहबؒ की किताब बनाम "राह नजात" के जवाब में है, रद्द खतरात एक तहकीकी किताब है जो कि कुरान व हदीस, मोतबर तफसीर के हवाला जात से मुदल्लल, आरास्ता व मुज़य्यन है,
संस्कृत के ज़रिए अहकाम-ए-इस्लाम और अकाइद-ए-इस्लाम को साबित किया गया है- सर सैय्यद खां साहबؒ अपनी बेपनाह खूबियों व इल्मी कमालात के बावजूद राह-ए-सवाब इख्तियार करने से कासिर रहे, मग़रिबी उलूम ने उन को मुतास्सिर कर दिया था, और अपना गरवीदा बना लिया था, जिस की वजह से उन की बहुत सी बातें काबिले गिरफ्त हैं,
क्योंकि उन की कुछ किताब जम्हूर उलमा के अकाइद व नज़रियात के खिलाफ है, चुनांचे जिहाद, ज़कात, सफर-ए-हज के मुताल्लिक उन के अकवाल अहले सुन्नत वल जमात उलमा के नज़रियात के बिल्कुल मुआरिज है यह किताब (रद्द खतरात) इन ही जवाब में है-
यह किताब ऐसी है जिस पर अज़ सर-ए-नौ काम करने की ज़रूरत है ताकि साहिब-ए-तौफीक इस से मुस्तफीद हो सके -
फी ज़मानाना जहां बेशुमार किताबें मन्सा-ए-शुहूद पे आ रही हैं, क्या ही अच्छा हो कि जो किताब अपनी बोसीदगी और कदीम तर्ज़-ए-तहरीर की वजह से नाकाबिले इस्तेफादा हो रही हैं और कुतुब खानों की जीनत बनी हुई है, इस को तस्हील करके शाए किया जाए तो यह ज्यादा अहमियत का हामिल होगा -
अल्लाह ताला हम सब को उम्मत के लिए नाफे बनाए और वसायिर औन फिल खैरात में शामिल फरमाए, आमीन