क्या आए रोज़ का जलसा तमाशा लगी नहीं?

गुल रज़ा राही अररियावी ✍🏻

✍🏻लिखते हुए हाथ कांप रहे हैं और हुजूम ख्याल में यह बात बार-बार खटक रही है कि जो मैं लिख रहा हूं लोग क्या-क्या तब्सरा करेंगे कोई तो मुखालिफ हवा चलेगी, या फिर मुवाफिक तल्ख़ घूंट होगा या शीरीं अजीब से ख्यालात हैं इन सब के बावजूद ख्यालात को कलम की ज़ीनत बना रहा हूं और अल्फाज़ की लड़ी में पिरो रहा हूं-

आजकल इजलास व मुशायरा एक मज़ाक बन कर रह गया है, कस्बाई इजलास हो या ज़िलई इजलास, सूबाई इजलास हो या फिर मुल्की इजलास, यक रोज़ा इजलास हो या सेह रोज़ इजलास सब खेल बन कर रह गया है, लंबे चौड़े इश्तिहारात लगाए जाते हैं, बड़े-बड़े अल्काब से नवाज़े जाते हैं, अल्लामा, फहामा, शहंशाह खिताबत, पीर तरीकत, रहबर शरीयत, दाई इस्लाम, हस्सान उल हिन्द बुलबुल बाग़ मदीना जैसे अज़ीम अल्काब से मुल्लकब किए जाते हैं, ख्वाह उनकी ज़ात इस इन सिफात से मुत्तसिफ हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता, इसी साल का वाकिया है हमारे एक साथी ने बतौर ज़बान ज़द के इश्तिहार में एक उस्ताद के लिए अल्लामा का लफ्ज़ इस्तेमाल किया तो इस पर हमारे उस्ताद मोहतरम ने हमें तंबीह की थी तुम किसी के नाम के आगे अल्लामा और इन जैसे मुबालगा आमेज़ अल्काब न लगाया करो क्योंकि इस ज़माने में किसी की तोहिन और उसकी रुसवाई के लिए यही बात काफी है तुम उसको अल्लामा कह दो इसलिए कि इस दौर अब कोई अल्लामा नहीं है वह पहले ज़माना के लोग होते थे जो मुजतहिद फिज़्ज़मान कहलाते थे और जिबाल इल्म होते थे तो उनको बतौर मुबालगा अल्लामा कहा जाता था, अब ऐसा कोई नहीं है इसलिए इनसे एहतराज़ करना चाहिए-
 अब दीनी इजलास का हाल यह हो गया है इस में सियासी लोग एमपी, एमएलए, मुखिया, ज़िला परिषद् और दीगर मज़ाहिब के पंडित वगैरा को मदऊ किया जाता है,
यह रिवाज हमारे यहां कुछ ज्यादा उरूज पे है,
एक वक्त था जब एक जलसे से कौम की तकदीर बदल जाती थी और वह जलसा एक तहरीक की बुनियाद बन जाती थी, पहले हर दिन जलसे नहीं होते थे, एक जलसा होता था वह तारीख़ साज़ होता था,
मगर आजकल का जलसा एक मज़ाक और दिल लगी का सामान बन गया है, खतीब की खिताबत मुकर्रिर की तकरीर, शायर का शेर, नकीब की नकाबत कमाने का ज़रिया और धंधा बन गया है, कई शिकायतें ऐसी मौसूल हुई हैं कि लोगों ने पूरी रात जलसे में तकरीर सुनी और फज्र के वक्त लोग और मुकर्रिर ख्वाब खरगोश के मज़े ले रहे हैं हत्ता कि फज्र की नमाज़ भी गोल गई, भला ऐसे जलसे कोई तहरीक बन सकती है जिस जलसे से उस दिन की फज्र की नमाज़ न पढ़ी गई हो-
अजीब सालगता है वह कौम जो कभी खामोशी से हज़ार इंकलाब लाती थी, आज वह शोर व गुल करके एक भी इंकलाब नहीं ला पा रही है, कौम का एक बड़ा सरमाया जलसे जुलूस में सर्फ हो रहा है,
नतीजा यहां तक आपहुंचा कि मदरसा के जलसए दस्तारबंदी में आलिमा तकरीर के लिए मदऊ हो रही हैं,
सोचिए कौम कहां जा रही है, मैं जलसा का मुखालिफ नहीं हूं मगर हर रोज़ इजलास और हर दिन के प्रोग्राम का ज़रूर मुखालिफ हूं, 
पूरे ज़िले में एक या दो प्रोग्राम हो कायदे से हो, अन्ज़िलुन्नास मनाज़िलहुम के तर्ज़ पर हो, इश्वा तराज़ी से दूर हो, रात का प्रोग्राम ज्यादा लंबा न हो, और जो भी हो वह एक तहरीक साज़ जलसा हो, जो भी बात जलसे में पेश हो उसको अमली जामा पहनाया जाए,
लेकिन हर रोज़ के जलसे से दीगर कौमों में सिर्फ हमारा मज़ाक बनता है और कौम का एक कीमती सरमाया इन चीज़ों में सर्फ होता है, जिस का कोई फायदा नज़र नहीं आता-
आज दीगर कौमें बतौर खास जिनके हाथ में इक्तिदार है उनके बानी उसकी जमात के लोगों ने उन्होंने खुफिया तरीके से जमीनी और अफरादी सतह पे वह काम किया कि आज हम हैरान हैं और उनके जुल्म का शिकार हैं 
इस वक्त उम्मत मुस्लिमा को जिन चीजों की जरूरत है हम उसको नहीं पूरा कर पा रहे हैं, जिन बातिल ताकतों ने हमारे लोगों में अकायद व नज़रियात में तश्कीक व तश्बीह का काम किया और उनके अकायद बदल दिए उनके लिए हमने कुछ काम नहीं किया, आप सोचें कि क्या हमें इस्लामिक स्कूल यूनिवर्सिटी और कॉलेजेस की जरूरत नहीं है, दुख्तर इस्लामिया के लिए अलग निज़ामे तालीम की जरूरत नहीं अगर है तो हम करोड़ों पे जलसे जुलूस में सर्फ करने के बजाए इन में क्यों नहीं करते,
हमें गौर करने की जरूरत है कि हम जिन हालात से गुजर रहे हैं इनके अज़ाला के लिए हमारे पास क्या लाइहए अमल है-
मुफक्किरान मिल्लत सोचें कि हमें क्या मुश्किलात दरपेश है और हम क्या कर रहे हैं अब हमें जमीनी सतह पे काम करने की जरूरत है, सादगी के साथ हर फेल अंजाम देने की जरूरत है, और इन तमाम बुराइयों को मुआशरे से खत्म करने की जरूरत है जो आज हमारे मुफादात में पनप रही है, मसलन दीनी तालीम से दूरी, इंटरनेट और मल्टीमीडिया मोबाइल का बेजा इस्तेमाल, सूदी लेन देन, और शादी ब्याह में इसराफ व फुजूल खर्ची इन चीजों में गौर करने की जरूरत और हमें कुर्बानी देने की जरूरत है, कौम को मजबूत करने की और तरक्की दिलाने की जरूरत है, वरना मुल्क व मिल्लत के जो हालात हैं वह मजीद बदतरी की गम्माज़ है
खुदावंद करीम फहम सलीम  अता फरमाए आमीन