اقلیم سلطنت شتر بے مہار کیوں؟
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✍🏻گل رضا राही अररियावी 

 यह हमारी बदनसीबी है कि हमने इस प्यारे वतन अज़ीज़ के ज़माम-ए-इक्तिदार को ऐसे लोगों को सौंपा है, जो मुल्क के खसीस, लईन और रज़ील शख्स हैं 
जिसकी ज़िंदगी ज़ुल्म-ओ-जब्र का तोदा है, गरीबों के पेट पर लात मारना उनके घर को ज़मींदोज़ करना तोशा है, उनकी ज़िंदगी के जिस वरक़ को आप उठाकर देखें तो ज़ुल्म-ओ-बरबरियत, इंसानियत सोज़, बेरहम जहालत पसंदी इस्तेहसाल-ए-हक़ का उनवान है, उनका किरदार यह है कि वह मुल्क के आवाम में इश्तआल अंगेज़ी करके नफ़रत को हवा दे रहा है।
 और मसला यह भी है मुल्क के बेस्तर सुफ़हा-ए-बेदरीग़ बिला ताम्मुल इसको अपना आका समझ रहे हैं और आका को अपने गरीब व लाचार खस्ता हाल शिकस्ता चाल मुहब्बीन व हमनवा से कोई मतलब व सरोकार नहीं है, उन्हें तो बेचारे अपने मुहब्बीन का सही तरीके से इस्तेमाल करना आता है और यह इस्तेमाल हो जाते हैं-
उन्हें सिर्फ कुर्सी से मतलब है चाहे उसके लिए किसी भी हद तक जाना पड़े - ख्वाह ऐन इंतखाबी वक़्त में कुछ पैसे देकर मुल्क के जाहिल औरत को गुमराह करना पड़े या फिर दीगर हरबे अपनाना पड़े-
इसके कुसूरवार सिर्फ वह नहीं जो इक्तिदार के लिए सियासत की रोटी सेकते हैं, मुल्क के आवाम को मज़हब के नाम पर गुमराह कर रहे हैं, बल्कि वह सब आवाम हैं जो ऐसे लोगों की हिमायत में खड़े होते हैं, यह मुल्क के साथ हरगिज़ खैरख्वाही नहीं हो सकती -
जो लोग भी ऐसे ख्यालात के साथ हैं, वह मुल्क की खूबसूरती और उसकी जम्हूरियत के लिए खतरा है, इस मज़मूम हरकत से मुजाहिदीन-ए-आज़ादी की कुर्बानियों की तोहिन होती है

आइए! अब देखते हैं
कि हमारे सियासतदान और मुक़्तदर जमातों के सरबराहान क्या कर रहे हैं -
मुस्लिम दुश्मनी की कोशिश पूरे मुल्क में ज़ोरो शोर से जारी है, इसमें एक तो हुक्काम व वज़रा तो अपना किरदार अदा कर ही रहे हैं वहीं एक खास मज़हबी शनाख्त रखने वाले एक खास तंज़ीम मुकम्मल तौर पर शबो रोज़ मेहनत कर रहे हैं हर रोज़ मीडिया में आकर मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगलना और मुसलमानों को मुल्क दुश्मन करार देना, इस्लामी इस्लाहात व रिवायत पर सवाल खड़ा करना यह उनका रोज़मर्रा का मामूल है, इससे दीगर लोगों को शह मिलती है वह मुसलमानों के दरमियान खलीज की राह पैदा कर रहे हैं -
हमारे वह गैर मुस्लिम भाई जो एक अरसा-ए-दराज़ से एक साथ एक मुआशरे में रहते चले आ रहे थे, बाहमी तकरीबात व सम्मेलन में शिरकत करते चले आ रहे थे-
 आज वह सब एक दूसरे से घबरा रहे हैं, डर और खौफ महसूस कर रहे हैं
आदाब व सलाम और नमस्ते के अल्फाज़ कहने में झिझक रहे हैं -

 यह बात किसी से पोशीदा नहीं है कि बाहमी इत्तेहाद व इत्तेफाक से गांव शहर, रियासत और मुल्क सब तरक्की करता है, अमन व अमान की फ़िज़ा बनी रहती है, इससे मुल्की अमलाक व अराज़ी सब महफूज़ और तरक्की पज़ीर होती हैं,
 जब कि ब सूरत-ए-दिगर ज़वाल व इनहात की तरफ रवां होता है,। मुल्क की सूरत हाल यह है कि मआशियत व रोज़गार खत्म हो रहे हैं और बाहमी खाना जंगी की वजह से मुल्क गहरे सदमे का शिकार होकर कमजोर हो रहा है और इस कमजोरी का फायदा गैर को हो रहा है

तो! मैं बात करने लगा हूं ऐसे रियासत के सदर कि जिसमें अब रियासत की कुर्सी पर बैठने की अहलियत बाकी नहीं रही, उनकी फिक्री साख्त, फिक्रो तदब्बुर की सलाहियत खत्म होने के डगर पे है-
 
हालिया वाकिया जो एक मुस्लिम डॉक्टर खातून के साथ पेश आया, भरी महफिल में आवाम के दरमियान वज़ीर-ए-आला ने एक खातून का हिजाब चेहरे से बेझिझक खींच लिया और सब लोग मूरत बने इस तमाशाई का मंज़र देख रहे थे, हैरत तो तब हुई जब उसके एक तम्मुलक बाज़ ने यह कहा कि चेहरे से ही नकाब हटाया, बुर्का नहीं हटाया, क्या ज़ेहनियत है, मातम है उसकी खसीस ज़ेहनियत पर, और अफसोस है बीमार शख्स की हालत पर-
 
साल गुज़िश्ता तलबा पर हुकूमत अह्लकारों के ज़रिए सरज़निश करना, जाइज़ हुकूक के मुतालबा पर मौसम-ए-शिता में तलबा व तालिबात पर ज़द व कोब करना यह उन्हीं की बीमार ज़ेहनियत शख्स का फरमान था -
खवातीन ज्यादा खुश न हों और मुलाज़िमत की चाहत, उसकी हिरस व तमअ में उसकी तरफदारी में खड़ी न हों क्योंकि मुस्तकबिल सब के दांव पर हैं-
अगर वह आपको किसी सरकारी शोबा में नौकरी दे रहा है तो उसके पस-ए-पर्दा एक बुनियादी मकासिद हैं जो आए दिन के हालात से मालूम होते हैं, आपकी शख्सियत को मजरूह करना, आप पर मज़हबी हमला करना, आपकी हतक-ए-इज़्ज़त करना और आपको इज़्ज़त व वकार के घर से निकालकर आवाम के सामने लाना ताकि आप घर की ज़ीनत न बनकर आवाम की ज़ीनत बनें और उनकी सामान-ए-दिल का ज़रिया बनें -
बा शऊर कौम हमेशा क़याफ़ा शनास होती है, मुस्तकबिल के खतरात को महसूस करके रद खतरात के रास्ते ढूंढ लेती है,-
बातें समझने की है और समझने वालों के लिए है वरना अंधे कुएं में रहने वाले को कोई शऊर व इदारक का दरस नहीं दे सकता -
अल्लाह ताला हमें फहम व शऊर अता फरमाए आमीन