{मेरे चमन की रौनक तुझ से है}
बनाम मुफ़्ती दबीर अहमद क़ासमी
ख़ादिम तदरीस
जामिअतुल क़रात कफ़लियता गुजरात
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गुल रज़ा राही अररियावी ✍🏻
नाचीज़ अपने इलाक़े में जिन लोगों से बतौरे ख़ास मुतास्सिर है उन में एक नुमायां नाम मेरे मोहतरम हज़रत अक़दस मौलाना मुफ़्ती दबीर अहमद साहिब क़ासमी हैं जो अपने इल्मी व अमली एतबार से अतराफ़ व अक्नाफ़ के उलमा में मुमताज़ व मुतारिफ़, हज़रत बेशुमार खूबियों के हामिल हैं, ज़बान व अदब के माहिर, खुश गुफ़्तार, सलीक़ा शेआर, हुस्न किरदार, तवाज़ो व आजीज़ी के पैकर हैं, शफ़क़त व मेहरबान, खूबियों के मुतलाशी और एक बेहतरीन व नायाब इंसान हैं-
हज़रत का तारुफ़ मैंने गुजरात में दौरान तालीम भी सुना, फिर इलाक़ा के लोगों से सुना, मालूम हुआ कि उलमा व तलबा में हज़रत यकसां क़द्र की निगाह से देखे जाते हैं-
मैं गरचे हज़रत के ही गांव का हूं, मगर मेरी सब से पहली शनासाई उस वक़्त हुई जब मुझे जामा मस्जिद कमलदाहा में तरावीह सुनाने का शर्फ हासिल हुआ-
मेरे लिए सआदत व मसर्रत की बात थी कि वालिद मोहतरम और मुफ़्ती साहिब के ज़ेर निगरानी तरावीह पढ़ा रहा था,
पहली दूसरी तरावीह बल्कि दस दिन तक मैं न जान सका कि ये कौन हैं, चूंकि इस वक़्त मेरा शऊर बालिग़ न हुआ था और न इतनी फ़हम थी कि मैं किसी से दरयाफ़्त करूं, जब तरावीह में बहसन व ख़ूबी क़ुरान की तकमील हुई और फिर हज़रत ने बड़े ही पुरसुक़ लहजे में
, ख़िताब फ़रमाया
सामईन गोश बर आवाज़ होकर पूरी तकरीर बग़ैर किसी नक़्ल व हरकत के नज़रें जमा कर समाअत करते रहे, क़ुरान करीम की अहमियत व फ़ज़ीलत, हुफ़्फ़ाज़ का मक़ाम व मर्तबा, उलमा दीन की क़द्र पर रौशनी डाली, और मेरी ख़ामियों के बावजूद हौसला अफ़ज़ाई के साथ मुझे सराहा और तारीफ़ की, मुझे बहुत ख़ुशी हुई, इसके बाद से हज़रत मुफ़्ती साहिब मेरे दिल के सब ज़्यादा क़रीब होगए और दिल में उनकी क़द्र बैठ गई, गुज़िश्ता दो तीन सालों से हज़रत रमज़ान के मौक़े पे तशरीफ़ लाते हैं और अपने
फ़यूज़ व बरकात से लोगों को फ़ायदा पहोंचाते हैं
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हज़रत मुफ़्ती साहिब दारुल उलूम देवबंद से फ़राग़त के बाद से ताहल जामिअतुल क़रात कफ़लियता गुजरात के मुसनद तदरीस पर फ़ाइज़ हैं, कामयाब मुदर्रिस व मुरब्बी हैं और कई सालों से वहां हदीस व इफ़्ता की ख़िदमात अंजाम दे रहे हैं- वहां की इल्मी शख्सियत में बहुत मक़बूल हैं -
आज मेरे गांव कमलदाहा का नाम रौशन है, उलमा गुजरात का दौरा होता है, यहां की ख़िदमात देख कर मसर्रत का इज़हार करते हैं -
आज कमलदाहा का मुसबत पैग़ाम गुजरात तक पहोंचा है इसकी वजह हज़रत मुफ़्ती साहिब दामत बरकातहुम की ज़ात अक़दस है
अल्लाह उनके उम्र में बरकत अता फ़रमाए और मज़ीद हमें इस्तिफ़ादे का मौक़ा अता फ़रमाए- आमीन