रमजान मुबारक — नूर-ए-हिदायत और रूहानी बेदारी का महीना
रमजान मुबारक इस्लामी साल का सबसे मुक़द्दस और बाअज़मत महीना है, जिसमें अल्लाह ताला की खास रहमतें नाज़िल होती हैं और बंदों को अपनी इस्लाह, तौबा और कुर्ब-ए-इलाही का बेमिसाल मौका मिलता है। यह महीना महज भूख और प्यास का नाम नहीं बल्कि दिल व दिमाग की ततहीर, फिक्र व अमल की इस्लाह और ईमान की तजदीद का जामे निजाम है। रमजान इंसान को गफलत की तारीकियों से निकालकर शऊर-ए-बंदगी और नूर-ए-यकीन की राह पर गामजन करता है।
नुजूल-ए-कुरान — रमजान की असास और मरकज-ए-अज़मत
रमजान मुबारक की सबसे बड़ी और बुनियादी फजीलत यह है कि इसी मुक़द्दस महीने में कुरान मजीद नाज़िल हुआ, जो कयामत तक के लिए पूरी इंसानियत की हिदायत का सरचश्मा है।
अल्लाह ताला इरशाद फरमाता है:
﴿شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِي أُنزِلَ فِيهِ الْقُرْآنُ هُدًى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَاتٍ مِّنَ الْهُدَىٰ وَالْفُرْقَانِ﴾ (अल-बकरा: 185)
यह आयत इस हकीकत को नुमायाँ करती है कि रमजान की अज़मत उसके दिनों की तादाद से नहीं बल्कि कुरान-ए-हकीम की निस्बत से है। यही महीना है जो इंसान को किताब-ए-इलाही से जोड़कर उसकी फिक्र को जिला और जिंदगी को मकसद अता करता है।
फर्जियत-ए-रोजा — ज़ब्त-ए-नफ्स और तामीर-ए-तकवा

रोजा रमजान का बुनियादी रुक्न और उसकी रूह है। इसका मकसद महज जिस्मानी मशक्कत नहीं बल्कि रूहानी तरबियत और तकवा का हुसूल है।
कुरान मजीद में इरशाद है:
﴿يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ﴾ (अल-बकरा: 183)
यह आयत वाजेह करती है कि रोजा इंसान को ख्वाहिशात-ए-नफ्स पर काबू पाने, सब्र व बरदाश्त अपनाने और हर हाल में अल्लाह की इताअत का आदी बनाने के लिए फर्ज किया गया है। यूँ रोजा जाहिर व बातिन दोनों की इस्लाह का जरिया बनता है।
रमजान — महीना-ए-रहमत, मगफिरत और निजात

रमजान मुबारक वह बाबरकत महीना है जिसमें अल्लाह ताला अपने बंदों पर खुसूसी रहमत फरमाता है और गुनाहों की माफी के दरवाजे खोल देता है।
रसूल-ए-अकरम ﷺ ने फरमाया:
“जिसने ईमान और सवाब की नीयत से रमजान के रोजे रखे, उसके पिछले गुनाह माफ कर दिए जाते हैं।”
(सही बुखारी, सही मुस्लिम)
यह हदीस इस बात की रोशन दलील है कि रमजान बंदे को माजी की लग्ज़िशों से निजात और नई जिंदगी के आगाज का सुनहरा मौका अता करता है।
लैलतुल कद्र — हजार महीनों से बेहतर रात
रमजान मुबारक की फजीलत को उरूज बख्शने वाली रात लैलतुल कद्र है।
कुरान मजीद में इरशाद होता है:
﴿لَيْلَةُ الْقَدْرِ خَيْرٌ مِّنْ أَلْفِ شَهْرٍ﴾ (अल-कद्र: 3)
यह वह अजीम रात है जिसमें की गई इबादत हजार महीनों की इबादत से अफजल है। यह रात रहमतों के नुजूल, फरिश्तों की आमद और बंदों की तकदीरों के फैसले की रात है, जो रमजान को बेमिसाल मकाम अता करती है।
रमजान का रूहानी माहौल — खैर का गलबा और शर की पस्पायी
रमजान मुबारक में नेकी के रास्ते आसान और बुराई के असरात कम कर दिए जाते हैं।
नबी करीम ﷺ ने फरमाया:
“जब रमजान आता है तो जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं, जहन्नम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और शयातीन कैद कर दिए जाते हैं।”
(सही बुखारी, सही मुस्लिम)
यह हदीस रमजान के रूहानी माहौल की बेहतरीन अक्कासी करती है, जहां खैर को फरोग और शर को कमजोर कर दिया जाता है।
मुआशरती इस्लाह — हमदर्दी, ईसार और उखूवत का फरोग
रमजान मुबारक फर्द के साथ साथ मुआशरे की भी इस्लाह करता है। रोजा इंसान को भूखों और मोहताजों का एहसास दिलाता है, जिससे दिल में हमदर्दी और ईसार पैदा होता है। इफ्तार, सदकात और जकात के जरिए मुआशरती तवाज़ुन कायम होता है और इस्लामी भाई चारे को तकवियत मिलती है।
इख्तितामिया — रमजान: जिंदगी बदल देने वाला महीना
रमजान मुबारक दरहकीकत रूह की पाकीजगी, किरदार की तामीर और जिंदगी की इस्लाह का महीना है। कुरान व हदीस की रोशनी में यह बात वाजेह हो जाती है कि रमजान इंसान को अल्लाह ताला की बंदगी का शऊर अता करता है और उसे एक बेहतर इंसान और सच्चा मुसलमान बनने की राह दिखाता है।
खुश नसीब है वह शख्स जो इस मुक़द्दस महीने की कद्र पहचान ले, उसके पैगाम को अपनी जिंदगी में नाफिज करे और तकवा व इखलास को अपना शेआर बना ले। अल्लाह ताला हमें रमजान मुबारक की हकीकी रूह समझने और उसकी बरकतों से भरपूर फायदा उठाने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।