मौलाना अहमद अली लाहौरीؒ (देवबंदी) और मौलाना दाऊद ग़ज़नवीؒ (अहल-ए-हदीस) की मसलकी मतभेद के बावजूद आपस में गहरी दोस्ती थी। एक मर्तबा मौलाना ग़ज़नवीؒ ने हज़रत लाहौरीؒ को पैग़ाम भेजा कि आज नमाज़ मगरिब आप की मस्जिद में अदा करने का इरादा है, इसी बहाने आप से मुलाक़ात भी हो जाएगी। मौलाना ग़ज़नवी ने मौलाना लाहौरी की मस्जिद में जाने से पहले अपने साथ जाने वाले मुतअक़्क़िदीन को समझाया कि हम चूंकि नमाज़ में आमीन बिल-जहर (बुलंद आवाज़ में आमीन) करते हैं और मौलाना लाहौरी आमीन बिल-सिर (आहिस्ता आवाज़ में आमीन) के क़ाइल हैं। हम उनकी मस्जिद में जा कर बुलंद आवाज़ से आमीन कहें और बाक़ी तमाम नमाज़ी आहिस्ता आवाज़ में आमीन कहें तो अच्छा नहीं लगेगा। बेहतर यही है कि जब मौलाना लाहौरी की मस्जिद में नमाज़ पढ़ें तो हम भी बाक़ी नमाज़ियों की तरह आहिस्ता आवाज़ से आमीन कहें और रफ़ा अल-यदैन भी न करें, क्योंकि ये आमाल न करने से नमाज़ हो जाएगी और कोई गुनाह भी नहीं मिलेगा। दूसरी जानिब मौलाना लाहौरीؒ ने सोचा कि मौलाना ग़ज़नवीؒ चूंकि आमीन बिल-जहर के क़ाइल हैं और वह जब भरी मस्जिद में अकेले आमीन कहेंगे तो सुबकी होगी और मेहमान के लिए यह बात मुनासिब नहीं। चुनांचे उन्होंने अपने तलबा से कहा कि आज हमारे हां मसलक अहल-ए-हदीस के एक बहुत बड़े आलिम दीन आ रहे हैं, वह चूंकि ऊंची आवाज़ में आमीन कहने के क़ाइल हैं, लिहाज़ा आज तुम सब आमीन ऊंची आवाज़ में कहना और कुछ तालिब इल्मों को बुला कर यह भी समझा दिया कि आप लोग कुछ फ़ासले के साथ मौलाना ग़ज़नवी के इर्द गिर्द खड़े हो जाना, ताकि जब वह नमाज़ में बुलंद आवाज़ से आमीन कहें तो आप लोग भी उनके साथ कहना। इस तरह उनको आमीन बिल-जहर करते हुए सुबकी नहीं होगी और बुलंद आवाज़ में आमीन कहने से आप लोगों को कोई गुनाह भी नहीं मिलेगा। जब जमाअत की नमाज़ खड़ी हुई तो दोनों ने अपने अपने मंसूबे पर अमल किया। जिन तलबा ने आमीन बिल-जहर की, उनको चूंकि बुलंद आवाज़ में आमीन कहने का तजरबा नहीं था, इस लिए वह ज़्यादा बुलंद आवाज़ में आमीन कह गए। अब एक तरफ मौलाना ग़ज़नवीؒ और उनके शागिर्दों ने आमीन आहिस्ता आवाज़ में कही, जबकि मौलाना लाहौरीؒ के शागिर्दों ने बुलंद आवाज़ में। यानी दोनों ने एक दूसरे के एहतराम में अपने मसलक के बजाए मुख़ालिफ मसलक पर अमल किया और एक अजीब कैफ़ियत तारी हो गई। नमाज़ के बाद जब मामला खुल कर सामने आया तो मुख़ालिफ मसलक के एहतराम का यह आलम देख कर सब हैरान रह गए।
(हज़रत लाहौरीؒ के हैरत अंगेज़ वाक़िआत)
हमारे अकाबिरन का तर्ज़ क्या था और हमारा क्या है?
काश कि उम्मत एक उम्मत बन जाए।
लसानियत, वतनियत, क़ौमियत की असबियत से निकल कर सिर्फ़ मुहम्मदी का नारा हो।
इंशा अल्लाह यहूद व नसारा हमारे नारे से ही बिखर जाएंगे।
इंशा अल्लाह।