वैलेंटाइन डे को आमतौर पर मोहब्बत के इज़हार का दिन समझा जाता है, मगर संजीदा फ़िक्र रखने वालों के नज़दीक यह सवाल ज़्यादा अहम है कि हम किस मोहब्बत को मनाते हैं और किस तरीके़ से। मोहब्बत अगर महज़ जज़्बात की तस्कीन बन जाए तो वो देरपा नहीं रहती, लेकिन अगर वो ज़िम्मेदारी, एहतराम और हुदूद के साथ हो तो इंसानी मुआशरे को मज़बूत करती है।

इस्लामी और अख़लाक़ी नुक्ते-ए-नज़र से मोहब्बत कोई ममनूअ जज़्बा नहीं, बल्कि वो एक फितरी कैफ़ियत है जिसे ज़ाब्ते और अख़लाक़ी उसूलों के अंदर रखा गया है। माँ बाप से मोहब्बत, शरीक-ए-हयात से वफ़ादारी, उस्ताद का एहतराम और इंसानियत से खैरख़्वाही—यह सब मोहब्बत की वो सूरतें हैं जो किरदार बनाती हैं, न कि वक़्ती खुशी।

वैलेंटाइन डे का अलमिया यह है कि इसे अक्सर commercial culture के तहत पेश किया जाता है, जहाँ जज़्बा कम और नुमाइश ज़्यादा होती है। इस तनाज़ुर में ज़रूरी है कि नौजवान नस्ल मोहब्बत को एक ज़िम्मेदार अमल के तौर पर समझे, न कि एक दिन की रस्म के तौर पर।

अहल-ए-दानिश के नज़दीक असल सवाल दिन मनाने का नहीं, बल्कि मोहब्बत के मेयार का है। अगर मोहब्बत इंसान को अख़लाक़, वफ़ा और ज़ब्त-ए-नफ़्स सिखाए तो वो क़ाबिल-ए-क़द्र है, और अगर वो हुदूद तोड़ दे तो वो सिर्फ़ फ़ितना बन जाती है।

लिहाज़ा ज़रूरत इस बात की है कि मोहब्बत को जज़्बात नहीं बल्कि किरदार से पहचाना जाए, क्योंकि जो मोहब्बत इंसान को बेहतर इंसान बनाए, वही हक़ीक़ी मोहब्बत कहलाने की मुस्तहिक़ है।वैलेंटाइन डे: मोहब्बत का शरई व अख़लाक़ी मेयार