तरावीह बीस रकअत या आठ*
*अज़ क़लम मुफ़्ती मुहम्मद अब्दुल हमीद शाकिर क़ासमी*
तोपरान ज़िला मेडक तेलंगाना
रमज़ानुल मुबारक की रातों को अल्लाह तआला ने ग़ैर मामूली फ़ज़ीलत अता फ़रमाई है। दिन के रोज़े अगर बंदा-ए-मोमिन को सब्र, तक़वा और ज़ब्त-ए-नफ़्स की तरबियत देते हैं तो रातों का क़ियाम ईमान को ताज़गी, दिल को ख़ुशूअ और रूह को क़ुर्ब-ए-इलाही अता करता है। इसी क़ियाम-ए-रमज़ान को बाद के अद्वार में नमाज़-ए-तरावीह कहा गया, जो अहद-ए-नबवी ﷺ से लेकर आज तक उम्मत-ए-मुस्लिमा का मुतवातिर और मुसलसल अमल है। तरावीह की रकअत की तादाद के हवाले से जो आठ और बीस का इख़्तिलाफ़ पाया जाता है, वह दरअसल फ़िक़्ही व इज्तिहादी इख़्तिलाफ़ है, न कि अक़ीदे या फ़र्ज़ियत का, और इसी नुक्ते को समझे बग़ैर इस मसले पर गुफ़्तगू अक्सर शिद्दत और इंतिशार का सबब बन जाती है। हवाला: सूरह अल-इसरा: 79; तफ़सीर इब्न कसीर, ज 4, स 256।
क़ुरआन-ए-करीम ने क़ियामुल लैल की मशरूइयत को उमूमी और मुतलक़ अंदाज़ में बयान किया है, किसी मख़सूस अदद का तअय्युन नहीं फ़रमाया। अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं: وَمِنَ اللَّيْلِ فَتَهَجَّدْ بِهِ نَافِلَةً لَكَ, यानी रात के कुछ हिस्से में तहज्जुद अदा कीजिए, यह आपके लिए ज़ाइद इबादत है। इसी तरह फ़रमाया: كَانُوا قَلِيلًا مِّنَ اللَّيْلِ مَا يَهْجَعُونَ, यानी अल्लाह के नेक बंदे रात को बहुत कम सोते थे। इन आयात से वाज़ेह होता है कि शरीअत की नज़र में असल मक़सूद रात का क़ियाम है, न कि रकअत की गिनती, और यही उसूल नमाज़-ए-तरावीह के मसले की बुनियाद बनता है। हवाला: सूरह अल-इसरा: 79; सूरह अज़-ज़ारियात: 17; तफ़सीर क़ुर्तुबी, ज 10, स 308।
नबी करीम ﷺ के ज़ाती अमल के बारे में हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की रिवायत बुनियादी हैसियत रखती है। वह फ़रमाती हैं कि रसूल अल्लाह ﷺ रमज़ान और ग़ैर रमज़ान में ग्यारह रकअत से ज़्यादा क़ियाम नहीं फ़रमाया करते थे। इस रिवायत को बाज़ हज़रात ने आठ रकआत-ए-तरावीह की दलील बनाया है, हालांकि मुहद्दिसीन और फ़ुक़हा ने वाज़ेह किया है कि यह हदीस हुज़ूर ﷺ के मामूल-ए-तहज्जुद को बयान करती है, न कि उम्मत के लिए तरावीह की हद बंदी को। खुद हज़रत आइशाؓ की दीगर रिवायत से मालूम होता है कि नबी ﷺ क़ियाम की तवालत को तरजीह देते थे, न कि रकअत की कसरत को। हवाला: सही बुख़ारी, हदीस 1147; सही मुस्लिम, हदीस 738; शरह मुस्लिम लिन-नववी, ज 6, स 39।
रमज़ान में बा जमाअत क़ियाम का आग़ाज़ खुद नबी करीम ﷺ के अमल से साबित है। हज़रत आइशाؓ बयान फ़रमाती हैं कि रसूल अल्लाह ﷺ ने चंद रातें सहाबाؓ को मस्जिद में क़ियाम कराया, फिर चौथी रात तशरीफ़ नहीं लाए, और सुबह फ़रमाया कि मुझे अंदेशा हुआ कि यह तुम पर फ़र्ज़ न कर दी जाए। इससे मालूम होता है कि जमाअत के साथ क़ियाम मशरूअ है, लेकिन नबी ﷺ ने उम्मत पर आसानी के लिए इस का इल्तिज़ाम तर्क फ़रमाया, न कि इस की मशरूइयत को मंसूख़। हवाला: सही बुख़ारी, हदीस 1129; सही मुस्लिम, हदीस 761; फ़तह अल-बारी, ज 4, स 253।
नबी करीम ﷺ के विसाल के बाद जब फ़र्ज़ियत का अंदेशा बाक़ी न रहा तो हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने उम्मत को एक इमाम पर जमा करने का तारीखी फ़ैसला फ़रमाया। हज़रत अब्दुल रहमान बिन अब्दुल कारीؓ फ़रमाते हैं कि हज़रत उमरؓ ने लोगों को हज़रत उबई बिन कअबؓ की इक़्तिदा में जमा कर दिया और फ़रमाया: نِعْمَتِ الْبِدْعَةُ هَذِهِ। इस इक़दाम का मक़सद इबादत को मुनज़्ज़म करना और इंतिशार को ख़त्म करना था, न कि कोई नई इबादत ईजाद करना। हवाला: सही बुख़ारी, हदीस 2010; फ़तह अल-बारी, ज 4, स 253।
हज़रत उमरؓ के ज़माने में तरावीह की रकअत की तादाद के बारे में मुतअद्दिद आसार मौजूद हैं। ताबई बुज़ुर्ग हज़रत यज़ीद बिन रूमानؒ फ़रमाते हैं कि लोग हज़रत उमरؓ के दौर में बीस रकअत क़ियाम करते थे। यही रिवायत इमाम मालिकؒ ने मुवत्ता में नक़्ल फ़रमाई है और इमाम बैहक़ीؒ ने इसे सुनन कुबरा में मुतअद्दिद असानेद से ज़िक्र किया है, जिस से मालूम होता है कि बीस रकअत का अमल महज़ एक फ़र्द या शहर तक महदूद नहीं था बल्कि अहद-ए-फ़ारूक़ी का उमूमी मामूल था। हवाला: मुवत्ता इमाम मालिक, हदीस 250; अस-सुनन अल-कुबरा लिल-बैहक़ी, ज 2, स 496; मुसन्निफ़ इब्न अबी शैबा, ज 2, स 393।
यह अमल सिर्फ़ हज़रत उमरؓ तक महदूद नहीं रहा बल्कि हज़रत उस्मानؓ और हज़रत अलीؓ के अद्वार में भी इसी तरीक़े पर उम्मत क़ायम रही। हज़रत अलीؓ से मरवी है कि उन्होंने रमज़ान में लोगों को बीस रकअत पर क़ायम रखा और इस पर किसी सहाबी ने नकीर नहीं की, जो इस बात की वाज़ेह दलील है कि यह अमल इजमाई हैसियत इख़्तियार कर चुका था। हवाला: मुसन्निफ़ इब्न अबी शैबा, ज 2, स 393; अस-सुनन अल-कुबरा लिल-बैहक़ी, ज 2, स 496; फ़तह अल-बारी, ज 4, स 253।
आइम्मा-ए-अरबआ के अक़वाल भी इसी तारीखी और अमली तसल्सुल की तर्जुमानी करते हैं। इमाम अबू हनीफ़ाؒ और उन के तलामिज़ा के नज़दीक तरावीह बीस रकअत सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। इमाम शाफ़ईؒ फ़रमाते हैं कि मैं ने मक्का और मदीना के लोगों को बीस रकअत ही पढ़ते पाया। इमाम अहमद बिन हंबलؒ से भी बीस रकअत का क़ौल मनक़ूल है, जबकि इमाम मालिकؒ के ज़माने में अहल-ए-मदीना छत्तीस रकअत पढ़ते थे, जो दरअसल तवाफ़ की कसरत के बदल के तौर पर थीं। हवाला: बदाए अल-सनाए, ज 2, स 275; अल-उम्म लिल-शाफ़ई, ज 1, स 191; अल-मुग़नी लि-इब्न क़ुदामा, ज 2, स 604; मुवत्ता इमाम मालिक, हदीस 249।
आठ रकअत के क़ाइलिन का असल मदार हज़रत आइशाؓ की हदीस पर है, मगर जम्हूर मुहद्दिसीन ने वाज़ेह किया है कि इस हदीस को तरावीह पर महमूल करना महल-ए-नज़र है, क्योंकि खुद सहाबाؓ ने इस से बीस रकअत मुराद नहीं ली। अगर यह हदीस तरावीह की तहदीद के लिए होती तो हज़रत उमरؓ, हज़रत अलीؓ और दीगर जलील अल-क़द्र सहाबाؓ इस के ख़िलाफ़ अमल न करते। हवाला: शरह मुस्लिम लिन-नववी, ज 6, स 39; फ़तह अल-बारी, ज 4, स 254।
इस पूरी बहस का खुलासा यह है कि तरावीह आठ या बीस दोनों सूरतों में क़ियाम-ए-रमज़ान है, मगर बीस रकअत का अमल सुन्नत-ए-ख़ुल्फ़ा-ए-राशिदीन, तआमुल-ए-सहाबाؓ और इजमा-ए-उम्मत से साबित है, जबकि आठ रकअत नबी करीम ﷺ के ज़ाती मामूल-ए-तहज्जुद की इत्तिबा पर मबनी हैं। इस लिए इस मसले में वुसअत, तहम्मुल और उम्मत के इज्तिमाई मिन्हज को सामने रखना ज़रूरी है, न कि तशद्दुद और तफ़रीक़। हवाला: सही बुख़ारी, हदीस 2010; हुज्जत अल्लाह अल-बालिग़ा, ज 1, स 123; फ़तावा जम्हूर अहल-ए-इल्म, ज 4, स 273।
और जम्हूर का मसलक के नज़दीक नमाज़-ए-तरावीह के मसले को समझने के लिए महज़ चंद रिवायत पर इक्तिफ़ा नहीं किया जाता बल्कि उसूल-ए-फ़िक़्ह, तआमुल-ए-सहाबाؓ, तसल्सुल-ए-उम्मत और मक़ासिद-ए-शरीअत को मजमूई तौर पर सामने रखा जाता है। इमाम अबू हनीफ़ाؒ के मिन्हज की असास यही है कि जिस इबादत पर सहाब-ए-किरामؓ का इज्तिमाई और मुतवारिस अमल क़ायम हो जाए, वह सुन्नत-ए-मुअक्कदा के दर्जे में दाख़िल हो जाती है, अगरचे इस की रकअत या हैयत में नबी करीम ﷺ से एक से ज़ाइद सूरतें मनक़ूल हों। इसी उसूल के तहत फ़िक़्ह में बीस रकअत तरावीह को सुन्नत-ए-मुअक्कदा क़रार दिया गया, क्योंकि यह वह सूरत है जो ख़ुल्फ़ा-ए-राशिदीन, बाल्खुसूस हज़रत उमर, हज़रत उस्मान और हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हुम के अद्वार में बिला इख़्तिलाफ़ राइज़ रही। हवाला: उसूल अल-शाशी, स 289; बदाए अल-सनाए, ज 2, स 275; फ़तह अल-क़दीर, ज 1, स 407।
फ़िक़्ह में सुन्नत-ए-मुअक्कदा की तारीफ़ यह है कि वह अमल जिस पर नबी करीम ﷺ ने मुदावमत फ़रमाई हो या आप ﷺ के बाद सहाब-ए-किरामؓ ने इस पर दवाम इख़्तियार किया हो और इस का तर्क उम्मत में शाज़ समझा जाता हो। नमाज़-ए-तरावीह बीस रकअत इसी तारीफ़ पर पूरी उतरती है, क्योंकि अहद-ए-फ़ारूक़ी से ले कर सदियों तक उम्मत का तआमुल इसी पर क़ायम रहा। यही वजह है कि फ़िक़्ह में बीस रकअत का तर्क बिला उज़्र मकरूह शुमार किया गया है, अगरचे आठ रकअत पढ़ लेने से क़ियाम-ए-रमज़ान का असल सवाब हासिल हो जाता है। हवाला: रद अल-मुहतार, ज 2, स 45; अद्-दुर्र अल-मुख़्तार, ज 1, स 456।
जम्हूर का मसलक दरअसल फ़िक़्ह और हदीस फ़हमी के इस जामे मिन्हज का तसल्सुल है जिस में रिवायत और दिरायत दोनों को जमा किया जाता है। जम्हूर मुहक़्क़िक़ीन ने तरावीह के मसले में हमेशा एतदाल, वुसअत और उम्मत के इज्तिमाई मिन्हज पर ज़ोर दिया है। हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोहीؒ फ़रमाते हैं कि बीस रकअत तरावीह ख़ुल्फ़ा-ए-राशिदीन का मसनून तरीक़ा है और इसी पर उम्मत का अमल चला आ रहा है, लिहाज़ा इसे छोड़ कर आठ पर इसरार करना फ़ितना का सबब बन सकता है, खुसूसन वहां जहां बीस का तआमुल हो। हवाला: फ़तावा रशीदिया, स 274; फ़तावा जम्हूर अहल-ए-इल्म, ज 4, स 273।
हज़रत शैख़ अल-हिंद मौलाना महमूद हसनؒ और उन के तलामिज़ा ने भी इसी मिन्हज की ताईद फ़रमाई कि तरावीह की असल रूह क़ियाम, ख़ुशूअ और क़ुरआन के साथ तअल्लुक़ है, न कि महज़ अदद पर निज़ाअ। ताहम जहां उम्मत का ग़ालिब और मुतवारिस अमल बीस रकअत पर हो, वहां इसी को इख़्तियार करना इत्तिहाद-ए-उम्मत और सद्द-ए-फ़ितना के लिए ज़रूरी है। यह मौक़िफ़ दरअसल हज़रत शाह वलीउल्लाह देहलवीؒ के इस उसूल की अमली शक्ल है कि फ़ुरूई इख़्तिलाफ़ात में मक़ामी और इज्तिमाई अमल की रियायत की जाए। हवाला: हुज्जत अल्लाह अल-बालिग़ा, ज 1, स 123; फ़तावा शैख़ अल-हिंद, ज 1, स 215।
अकाबिर के नज़दीक आठ रकअत का क़ौल अगरचे बाज़ अहल-ए-इल्म से मनक़ूल है, मगर इसे बीस रकअत के बिलमुक़ाबिल खड़ा करना इल्मी दियानत के ख़िलाफ़ है, क्योंकि आठ रकअत के हक़ में न तो सहाब-ए-किरामؓ का इज्तिमाई तआमुल है और न ही ख़ुल्फ़ा-ए-राशिदीन का तसल्सुल। इसी लिए जम्हूर मुहक़्क़िक़ीन ने वाज़ेह फ़रमाया कि आठ रकअत को सुन्नत-ए-तरावीह कहना दुरुस्त नहीं, बल्कि यह नबी ﷺ के तहज्जुद के मामूल से माख़ूज़ एक इज्तिहादी ततबीक़ है। हवाला: फ़तावा महमूदिया, ज 7, स 175; शरह मुस्लिम लिन-नववी, ज 6, स 39।
और नुक्ता-ए-नज़र में एक अहम उसूल यह भी है कि इबादत में कसरत-ए-अमल को उम्मत के इज्तिमाई मिज़ाज के साथ जोड़ा जाए। बीस रकअत तरावीह में क़ुरआन-ए-करीम की ज़्यादा मिक़दार सुनने और सुनाने का मौक़ा मिलता है, जिस की तरफ़ खुद अकाबिर ने तवज्जोह दिलाई है। यही वजह है कि बर्रे सग़ीर में रमज़ान के दौरान मुकम्मल क़ुरआन सुनाने का जो रिवाज क़ायम हुआ, वह बीस रकअत के साथ ज़्यादा मुनासिब और सहल है। हवाला: फ़तावा जम्हूर अहल-ए-इल्म, ज 6, स 243; अहसन अल-फ़तावा, ज 3, स 514।
जम्हूर के तहक़ीक़ी मिन्हज के मुताबिक़ नमाज़-ए-तरावीह के मसले में हतमी और राज़ेह मौक़िफ़ वही है जो तआमुल-ए-सहाबाؓ, इजमा-ए-उम्मत और आइम्मा-ए-अरबआ के मुत्तफ़िक़ा अक़वाल से साबित हो। इसी बुनियाद पर आठ रकअत को नमाज़-ए-तरावीह क़रार देना दुरुस्त नहीं बल्कि यह सरीह तौर पर ख़िलाफ़-ए-आसार-ए-सहाबाؓ और ख़िलाफ़-ए-इजमा-ए-अमली है। हज़रत आइशाؓ की रिवायत जिस में ग्यारह रकअत का ज़िक्र है, जम्हूर मुहद्दिसीन व फ़ुक़हा के नज़दीक तहज्जुद से मुतअल्लिक़ है, और इसे तरावीह पर मुनतबिक़ करना उसूल-ए-हदीस और फ़हम-ए-सल्फ़ के ख़िलाफ़ है। अगर यह रिवायत तरावीह की तहदीद के लिए होती तो हज़रत उमरؓ, हज़रत अलीؓ, हज़रत इब्न अब्बासؓ और दीगर सहाबाؓ इस के ख़िलाफ़ कभी बीस रकअत पर इज्तिमा न करते। हवाला: शरह मुस्लिम लिन-नववी, ज 6, स 39; फ़तह अल-बारी, ज 4, स 254; मुसन्निफ़ इब्न अबी शैबा, ज 2, स 393।
जम्हूर अहल-ए-इल्म ने बारहा इस अमर की सराहत की है कि आठ रकअत को तरावीह कहना तारीखी, हदीसी और फ़िक़्ही लिहाज़ से नाक़ाबिल-ए-क़ुबूल है। हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोहीؒ फ़रमाते हैं कि तरावीह बीस रकअत हैं, यही सुन्नत-ए-ख़ुल्फ़ा-ए-राशिदीन है, और इस के ख़िलाफ़ कहना बिदअत और गुमराही का दरवाज़ा खोलता है। इसी तरह फ़तावा जम्हूर अहल-ए-इल्म में वाज़ेह तौर पर दर्ज है कि आठ रकअत को सुन्नत-ए-तरावीह कहना ग़लत है और इस की कोई सही बुनियाद अहद-ए-सहाबाؓ में नहीं मिलती। हवाला: फ़तावा रशीदिया, स 274; फ़तावा जम्हूर अहल-ए-इल्म, ज 4, स 273।
आइम्मा-ए-अरबआ के अक़वाल इस मसले में निहायत वाज़ेह और फ़ैसलाकुन हैं। इमाम अबू हनीफ़ाؒ, इमाम शाफ़ईؒ और इमाम अहमद बिन हंबलؒ के नज़दीक नमाज़-ए-तरावीह बीस रकअत है, जबकि इमाम मालिकؒ के नज़दीक असल बीस ही हैं, अलबत्ता अहल-ए-मदीना के अमल के तौर पर छत्तीस रकअत भी मनक़ूल हैं, जो बीस की नफ़ी नहीं बल्कि इस पर इज़ाफ़ा है। किसी एक इमाम से भी आठ रकअत को तरावीह क़रार देना साबित नहीं। हवाला: बदाए अल-सनाए, ज 2, स 275; अल-उम्म लिल-शाफ़ई, ज 1, स 191; अल-मुग़नी लि-इब्न क़ुदामा, ज 2, स 604; मुवत्ता इमाम मालिक, हदीस 249।
आइम्मा-ए-अरबआ के इस मुत्तफ़िक़ा मौक़िफ़ के बाद आठ रकअत के जवाज़ या तरजीह की बात करना इजमा-ए-उम्मत के मुक़ाबले में शाज़ और नाक़ाबिल-ए-इल्तिफ़ात है। उसूल-ए-फ़िक़्ह का मुस्लिम क़ाइदा है कि जब किसी मसले में सहाबाؓ का तआमुल और आइम्मा का इत्तिफ़ाक़ मौजूद हो तो इस के ख़िलाफ़ इनफ़िरादी फ़हम या जुज़वी रिवायत को क़ुबूल नहीं किया जाता। यही मिन्हज जम्हूर अहल-ए-इल्म का है और यही मिन्हज अहल-ए-सुन्नत वल जमाअत का इम्तियाज़ है। हवाला: उसूल अल-शाशी, स 289; फ़तह अल-क़दीर, ज 1, स 407।
लिहाज़ा इस तहक़ीक़ी मुताला का क़तई और हतमी नतीजा यह है कि नमाज़-ए-तरावीह बीस रकअत सुन्नत-ए-मुअक्कदा है, जो नबी करीम ﷺ के इशारे, ख़ुल्फ़ा-ए-राशिदीन के फ़ैसले, सहाबाؓ के इजमा-ए-अमली और आइम्मा-ए-अरबआ के मुत्तफ़िक़ा अक़वाल से साबित है। आठ रकअत को तरावीह कहना इल्मी दियानत के ख़िलाफ़ और उम्मत के मुतवारिस दीनी निज़ाम में ख़लल डालने के मुतरादिफ़ है। जम्हूर अहल-ए-इल्म के इल्मी मेयार के मुताबिक़ इसी मौक़िफ़ की तरजीह वाजिब है और इसी को उम्मत के सामने पेश करना हक़ व सवाब है। हवाला: सही बुख़ारी, हदीस 2010; फ़तावा जम्हूर अहल-ए-इल्म, ज 4, स 273; रद अल-मुहतार, ज 2, स 46।
इस तहरीर में इख़्तियार किया गया मिन्हज किसी फ़र्द, इदारे या मुआसिर उनवान का मोहताज नहीं बल्कि वही क़दीम, मुतवारिस और मोहतात इल्मी तरीक़ा है जो उम्मत के अकाबिर फ़ुक़हा और मुहद्दिसीन ने इख़्तियार किया। इस मिन्हज की बुनियाद यह है कि इबादत के बाब में वही सूरत राज़ेह और लाज़िम अल-अमल होती है जिस पर नबी करीम ﷺ के बाद सहाब-ए-किरामؓ का इज्तिमाई तआमुल क़ायम हो, जिसे ख़ुल्फ़ा-ए-राशिदीन ने नाफ़िज़ किया हो और जिसे आइम्मा मुजतहिदीन ने बिला तरद्दुद क़ुबूल किया हो। इस तरीक़-ए-कार में शाज़ रिवायत, जुज़वी फ़हम या बाद के इनफ़िरादी रुजहानात को असल के मुक़ाबिल नहीं रखा जाता, बल्कि उन्हें नुसूस, आसार और इजमा के ताबे समझा जाता है। यही वजह है कि इस मिन्हज में नमाज़-ए-तरावीह के मसले को महज़ अददी बहस के तौर पर नहीं देखा गया बल्कि इसे सुन्नत के तहफ़्फ़ुज़ और उम्मत के इज्तिमाई दीनी निज़ाम के बक़ा से जोड़ा गया है। हवाला: फ़तह अल-क़दीर, ज 1, स 407; उसूल अल-शाशी, स 289; अल-इअतिसाम लिल-शातबी, ज 1, स 64।
इसी मिन्हज को अगर उम्मत के एक और मुत्तफ़िक़ अलैह मसले, यानी दाढ़ी के हुक्म पर मुनतबिक़ किया जाए तो उसूल पूरी तरह वाज़ेह हो जाता है। दाढ़ी के बारे में नबी करीम ﷺ का हुक्म सरीह है, सहाब-ए-किरामؓ का इस पर तआमुल मुतवातिर है और उम्मत का इस पर इजमा-ए-अमली क़ायम है, इस लिए फ़ुक़हा ने इस में कमी बेशी या गुंजाइश की बात को क़ुबूल नहीं किया। अगर कोई शख़्स चंद जुज़वी एहतिमालात या बाद के उरफ़ी रुजहानात की बुनियाद पर दाढ़ी के वुजूब में नरमी पैदा करे तो उसे इल्मी तौर पर मरदूद क़रार दिया जाता है, क्योंकि वह मुतवारिस सुन्नत के मुक़ाबिल एक शाज़ ज़ाविया-ए-नज़र पेश करता है। बईनिही यही उसूल नमाज़-ए-तरावीह पर लागू होता है। जिस तरह दाढ़ी के बाब में मुतवातिर अमल के होते हुए चंद एहतिमाली ताबीरात को असल पर तरजीह नहीं दी जा सकती, इसी तरह तरावीह के बाब में सहाब-ए-किरामؓ और आइम्मा उम्मत के मुत्तफ़िक़ा तआमुल के मुक़ाबिल आठ रकअत के इनफ़िरादी फ़हम को क़ुबूल नहीं किया जा सकता। हवाला: सही बुख़ारी, हदीस 5892; रद अल-मुहतार, ज 6, स 407; अल-इअतिसाम लिल-शातबी, ज 2, स 182।
यही वजह है कि इस मिन्हज में दाढ़ी और तरावीह दोनों को एक ही उसूली ज़ाविए से देखा जाता है, यानी सुन्नत की हिफ़ाज़त, शिआर-ए-उम्मत का बक़ा और दीन में तदरीज़ी कमज़ोरी के दरवाज़े बंद करना। अगर तरावीह जैसे शईरा में अदद के नाम पर गुंजाइश का दरवाज़ा खोला जाए तो बिलआख़िर यही तर्ज़-ए-फ़िक्र दीगर मसनून आमाल में तख़फ़ीफ़ और तातील तक पहुंचता है, जैसा कि दाढ़ी, लिबास, नमाज़ की हैयत और दीगर ज़ाहिरी शआइर में देखा जा चुका है। इस लिए अकाबिर फ़ुक़हा ने हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया कि जहां नुसूस के साथ तआमुल-ए-सहाबाؓ और इजमा-ए-उम्मत मौजूद हो, वहां रुख़सत और तख़फ़ीफ़ की बात करना दरअसल सुन्नत को कमज़ोर करना है। हवाला: हुज्जत अल्लाह अल-बालिग़ा, ज 1, स 123; अल-इअतिसाम लिल-शातबी, ज 1, स 110।
इस बहस का मक़सद किसी गिरोही शनाख़्त को उभारना नहीं बल्कि इस उसूली हक़ीक़त को वाज़ेह करना है कि दीन अपनी असल सूरत में तभी महफ़ूज़ रहता है जब उसे उसी इज्तिमाई, मोहतात और विरसाती मिन्हज के साथ मुंतक़िल किया जाए जिस के ज़रीए वह हम तक पहुंचा है। नमाज़-ए-तरावीह की बीस रकअत इसी मिन्हज की अमली मिसाल हैं, जैसे दाढ़ी का वुजूब इसी मिन्हज की अलामत है। दोनों में क़द्र-ए-मुश्तरक यह है कि यह आमाल नस, तआमुल और इजमा के इम्तिज़ाज से साबित हैं, और दोनों में गुंजाइश पैदा करना दरअसल उम्मत के मुत्तफ़िक़ा दीनी तशख़्ख़ुस को मजरूह करना है। हवाला: सही बुख़ारी, हदीस 2010; रद अल-मुहतार, ज 2, स 46; अल-इअतिसाम लिल-शातबी, ज 2, स 200।
ख़ुलासा कलाम
यह तहक़ीक़ी मज़मून नमाज़-ए-तरावीह के मसले को महज़ रकअत की अददी बहस के तौर पर नहीं बल्कि सुन्नत के फ़हम, इस के तहफ़्फ़ुज़ और उम्मत के मुतवारिस दीनी मिन्हज के तनाज़ुर में पेश करता है। क़ुरआन-ए-करीम ने क़ियामुल लैल की असल को बयान फ़रमाया, नबी करीम ﷺ ने इस की तरग़ीब दी, और आप ﷺ के बाद सहाब-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम ने इस इबादत को मुनज़्ज़म, महफ़ूज़ और इज्तिमाई शक्ल में उम्मत के लिए जारी रखा। ख़ुल्फ़ा-ए-राशिदीन के फ़ैसले, खुसूसन हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु का बीस रकअत पर इज्तिमा, इस बात का क़तई सुबूत है कि नमाज़-ए-तरावीह की यही सूरत उम्मत के लिए राज़ेह, मज़बूत और लाज़िम अल-अमल है।
यह गुफ़्तगू वाज़ेह करती है कि आठ रकअत को नमाज़-ए-तरावीह क़रार देना न सहाब-ए-किरामؓ के तआमुल से साबित है, न आइम्मा मुजतहिदीन के अक़वाल से, बल्कि यह नबी करीम ﷺ के ज़ाती मामूल-ए-तहज्जुद को तरावीह पर मुनतबिक़ करने का नतीजा है, जो उसूल-ए-हदीस और फ़हम-ए-सल्फ़ के ख़िलाफ़ है। इस के बरख़िलाफ़ बीस रकअत का सुबूत आसार-ए-सहाबाؓ, इजमा-ए-अमली और आइम्मा-ए-अरबआ के मुत्तफ़िक़ा मौक़िफ़ से क़ायम है, और इसी बुनियाद पर इसे सुन्नत-ए-मुअक्कदा तस्लीम किया गया है।
अल-हासिल : इबादत में वही तरीक़ा इख़्तियार किया जाए जो सुन्नत-ए-नबवी ﷺ, सुन्नत-ए-ख़ुल्फ़ा-ए-राशिदीन और उम्मत के इज्तिमाई अमल से साबित हो, और ऐसे शाज़, इनफ़िरादी या बाद के रुजहानात से इज्तिनाब किया जाए जो बज़ाहिर सहूलत या तवस्सुअ के नाम पर दीन की मुतवारिस हैयत को कमज़ोर कर देते हैं। इसी उसूली तनाज़ुर में यह मज़मून अददी निज़ाअ और जिद्दत पसंदी की नफ़ी करते हुए सुन्नत-ए-साबिता के तहफ़्फ़ुज़ को अपना मरकज़ी हदफ़ बनाता है।
ज़ेर-ए-नज़र मक़ाला नमाज़-ए-तरावीह की रकअत के मसले का उसूली, हदीसी और फ़िक़्ही तजज़िया पेश करता है। इस तहक़ीक़ में क नुसूस क़तइया, नबी करीम ﷺ के अमली उसवा, सहाब-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम के मुतवातिर तआमुल और आइम्मा-ए-अरबआ के मुत्तफ़िक़ा अक़वाल की रोशनी में यह साबित किया गया है कि नमाज़-ए-तरावीह की बीस रकअत ही सुन्नत-ए-साबिता और उम्मत का मुतवारिस तरीक़ा हैं। मक़ाला इस अमर की वज़ाहत करता है कि आठ रकअत का तसव्वुर नबी ﷺ के मामूल-ए-तहज्जुद से माख़ूज़ एक ग़ैर मुनतबिक़ फ़हम है, जिसे न तआमुल-ए-सहाबाؓ की ताईद हासिल है और न फ़िक़्ही इजमा की। तहक़ीक़ का मरकज़ी मक़सद यह है कि इबादत के बाब में सुन्नत-ए-नबवी ﷺ और सुन्नत-ए-ख़ुल्फ़ा-ए-राशिदीन की पैरवी को मेयार बनाया जाए और अददी निज़ाअ या जिद्दत पसंदाना ताबीरात के ज़रीए दीनी शआइर में तख़फ़ीफ़ से इज्तिनाब किया जाए। यह मक़ाला इस नतीजे पर पहुंचता है कि बीस रकअत तरावीह पर अमल न सिर्फ़ फ़िक़्ही तौर पर राज़ेह बल्कि उम्मत के इत्तिहाद, सुन्नत के तहफ़्फ़ुज़ और दीनी तसल्सुल के लिए नागुज़ीर है।