अगर शिबली नोमानी आज ज़िंदा होते
दुनिया में कुछ ऐसी शख्सियतें पैदा होती हैं जो अपने ज़माने से बहुत आगे सोचती हैं।
उनमें एक नाम अल्लामा शिबली नोमानी का भी है।
वह न सिर्फ एक बड़े आलिम और मुहाक़्क़िक़ थे बल्कि एक मुसलेह, उस्ताद और मुफ़क्किर भी थे।
उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी तालीम, अदब और इस्लाहे मुआशरा के लिए वक़्फ़ कर दी।
अगर शिबली नोमानी आज ज़िंदा होते तो वह इस दौर के नौजवानों, मुसलमानों और तालीमी इदारों की हालत देख कर यक़ीनन फ़िक्रमंद होते, मगर मायूस नहीं।
वह फिर से इल्म व अमल की शमा रोशन करते।
तालीम के बारे में शिबली का नज़रिया
शिबली नोमानी तालीम को सिर्फ नौकरी हासिल करने का ज़रिया नहीं समझते थे।
उनके नज़दीक तालीम का मक़सद इंसान को बाअख़लाक़, बाशऊर और बाअमल बनाना था।
वह कहते थे कि इल्म वह है जो इंसान के दिल को रोशन करे और उसके किरदार को बेहतर बनाए।
अगर वह आज होते तो वह मौजूदा तालीमी निज़ाम में तब्दीली लाते।
वह ऐसी तालीम चाहते जो जदीद साइंस और मज़हब दोनों को साथ ले कर चले।
वह कहते कि दीन और दुनिया की तालीम एक दूसरे की दुश्मन नहीं बल्कि साथी हैं।
वह तलबा को नसीहत करते कि तालीम का असल फ़ायदा तब है जब इंसान इससे अपने आप को और अपने मुआशरे को बेहतर बनाए।
शिबली कॉलेज का ख़्वाब
शिबली नोमानी का ख़्वाब था कि आज़मगढ़ में एक ऐसा तालीमी इदारा बने जहां इल्म के हर शोबे की रौशनी हो।
इसी ख़्वाब की ताबीर है शिबली नेशनल कॉलेज।
अगर वह आज ज़िंदा होते तो वह इस कॉलेज को एक बड़ी यूनिवर्सिटी की शक्ल दे देते।
जिस तरह सर सैय्यद अहमद खान ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी क़ायम की,
इसी तरह शिबली भी अपने कॉलेज को इल्मी तहरीक का मरकज़ बनाते।
वह चाहते कि यहां के तलबा सिर्फ किताबी इल्म न लें बल्कि अमली ज़िंदगी में अख़लाक़, ईमान और खिदमते ख़ल्क़ के जज़्बे के साथ आगे बढ़ें।
वह अपने तलबा से शायद यूं कहते:
> “यह कॉलेज तुम्हारी दरसगाह ही नहीं, तुम्हारा मुस्तक़बिल है।
यहां से जो इल्म लो, उसे क़ौम और इंसानियत की खिदमत में लगाओ।”
दीन और अक़्ल का ताल्लुक़
शिबली नोमानी ने हमेशा दीन को अक़्ल के साथ जोड़ कर पेश किया।
वह अंधी तकलीद के क़ाइल नहीं थे।
वह चाहते थे कि मुसलमान दीन को समझ कर, तहक़ीक़ के साथ अमल करे।
अगर वह आज ज़िंदा होते तो वह देखते कि लोग मज़हब के नाम पर इख़्तिलाफ़ और झगड़े कर रहे हैं।
वह ऐसी फ़िज़ा में इत्तेहाद, बर्दाश्त और फ़िक्री बेदारी की बात करते।
वह यक़ीनन कहते:
> “इस्लाम अक़्ल का मुखालिफ़ नहीं, बल्कि अक़्ल को रौशनी देता है।”
अदब और तहक़ीक़
शिबली नोमानी का उर्दू और अरबी अदब पर गहरा असर है।
उनकी मशहूर किताबें अल-फ़ारूक़, सीरतुन्नोमान और शेरुल अजम आज भी इल्म का ख़ज़ाना हैं।
अगर वह आज के ज़माने में होते तो वह अदब के ज़रिए क़ौम को बेदार करने का काम करते।
वह नौजवान लिखने वालों को नसीहत करते कि अदब का मक़सद सिर्फ तफ़रीह नहीं बल्कि इस्लाह है।
वह कहते:
> “क़लम अमानत है, इसे सिर्फ सच और ख़ैर के लिए इस्तेमाल करो।”
मग़रिब और जदीद दुनिया
शिबली नोमानी मग़रिबी इल्म और तरक़्क़ी से मुतास्सिर थे, मगर वह अंधी तकलीद के क़ाइल नहीं थे।
अगर वह आज होते तो वह मुसलमानों को नसीहत करते कि मग़रिब की साइंसी तरक़्क़ी से फ़ायदा उठाओ,
मगर अपनी तहज़ीब और अख़लाक़ को मत छोड़ो।
वह यक़ीनन नौजवानों से कहते:
> “तरक़्क़ी हासिल करो, लेकिन अपनी पहचान न खोओ।
इल्म हासिल करो, मगर अपने दीन और अक़दार को साथ रखो।”
मुआशरती इस्लाह
शिबली अगर आज ज़िंदा होते तो वह मुआशरे में फैली हुई झूठ, नफ़रत, और खुदग़र्ज़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते।
वह इत्तेहाद, मुहब्बत और सच्चाई का पैग़ाम देते।
वह कहते कि क़ौमों की तरक़्क़ी का राज़ अख़लाक़ में है, दौलत या ताक़त में नहीं।
उनके नज़दीक ज़वाल की सबसे बड़ी वजह किरदार की कमज़ोरी थी।
वह आज के नौजवानों को यही नसीहत करते:
> “अगर तुम अपने अंदर सच्चाई, मेहनत और ईमान पैदा कर लो तो दुनिया की कोई ताक़त तुम्हें पीछे नहीं रख सकती।”
अगर शिबली नोमानी आज ज़िंदा होते तो वह यक़ीनन उम्मते मुस्लिमा के हालात बदलने की कोशिश करते।
वह तालीम में इस्लाह, अदब में मक़सद, और मुआशरे में अख़लाक़ की नई लहर पैदा करते।
वह शिबली कॉलेज को एक आलमी मेयार का तालीमी मरकज़ बनाते,
जहां इल्म, अख़लाक़ और खिदमत तीनों एक साथ चलते।
वह हमें यह पैग़ाम देते:
> “क़ौमें किताबों से नहीं, किरदार से बनती हैं।
इल्म हासिल करो, मगर उसके साथ इंसानियत को न भूलो।”
शिबली नोमानी का ख़्वाब आज भी ज़िंदा है,
बस ज़रूरत इस बात की है कि हम उनकी सोच को समझें और अपने अमल से उसे हक़ीक़त बनाएं।
दुनिया में कुछ ऐसी शख्सियतें पैदा होती हैं जो अपने ज़माने से बहुत आगे सोचती हैं।
उनमें एक नाम अल्लामा शिबली नोमानी का भी है।
वह न सिर्फ एक बड़े आलिम और मुहाक़्क़िक़ थे बल्कि एक मुसलेह, उस्ताद और मुफ़क्किर भी थे।
उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी तालीम, अदब और इस्लाहे मुआशरा के लिए वक़्फ़ कर दी।
अगर शिबली नोमानी आज ज़िंदा होते तो वह इस दौर के नौजवानों, मुसलमानों और तालीमी इदारों की हालत देख कर यक़ीनन फ़िक्रमंद होते, मगर मायूस नहीं।
वह फिर से इल्म व अमल की शमा रोशन करते।
तालीम के बारे में शिबली का नज़रिया
शिबली नोमानी तालीम को सिर्फ नौकरी हासिल करने का ज़रिया नहीं समझते थे।
उनके नज़दीक तालीम का मक़सद इंसान को बाअख़लाक़, बाशऊर और बाअमल बनाना था।
वह कहते थे कि इल्म वह है जो इंसान के दिल को रोशन करे और उसके किरदार को बेहतर बनाए।
अगर वह आज होते तो वह मौजूदा तालीमी निज़ाम में तब्दीली लाते।
वह ऐसी तालीम चाहते जो जदीद साइंस और मज़हब दोनों को साथ ले कर चले।
वह कहते कि दीन और दुनिया की तालीम एक दूसरे की दुश्मन नहीं बल्कि साथी हैं।
वह तलबा को नसीहत करते कि तालीम का असल फ़ायदा तब है जब इंसान इससे अपने आप को और अपने मुआशरे को बेहतर बनाए।
शिबली कॉलेज का ख़्वाब
शिबली नोमानी का ख़्वाब था कि आज़मगढ़ में एक ऐसा तालीमी इदारा बने जहां इल्म के हर शोबे की रौशनी हो।
इसी ख़्वाब की ताबीर है शिबली नेशनल कॉलेज।
अगर वह आज ज़िंदा होते तो वह इस कॉलेज को एक बड़ी यूनिवर्सिटी की शक्ल दे देते।
जिस तरह सर सैय्यद अहमद खान ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी क़ायम की,
इसी तरह शिबली भी अपने कॉलेज को इल्मी तहरीक का मरकज़ बनाते।
वह चाहते कि यहां के तलबा सिर्फ किताबी इल्म न लें बल्कि अमली ज़िंदगी में अख़लाक़, ईमान और खिदमते ख़ल्क़ के जज़्बे के साथ आगे बढ़ें।
वह अपने तलबा से शायद यूं कहते:
> “यह कॉलेज तुम्हारी दरसगाह ही नहीं, तुम्हारा मुस्तक़बिल है।
यहां से जो इल्म लो, उसे क़ौम और इंसानियत की खिदमत में लगाओ।”
दीन और अक़्ल का ताल्लुक़
शिबली नोमानी ने हमेशा दीन को अक़्ल के साथ जोड़ कर पेश किया।
वह अंधी तकलीद के क़ाइल नहीं थे।
वह चाहते थे कि मुसलमान दीन को समझ कर, तहक़ीक़ के साथ अमल करे।
अगर वह आज ज़िंदा होते तो वह देखते कि लोग मज़हब के नाम पर इख़्तिलाफ़ और झगड़े कर रहे हैं।
वह ऐसी फ़िज़ा में इत्तेहाद, बर्दाश्त और फ़िक्री बेदारी की बात करते।
वह यक़ीनन कहते:
> “इस्लाम अक़्ल का मुखालिफ़ नहीं, बल्कि अक़्ल को रौशनी देता है।”
अदब और तहक़ीक़
शिबली नोमानी का उर्दू और अरबी अदब पर गहरा असर है।
उनकी मशहूर किताबें अल-फ़ारूक़, सीरतुन्नोमान और शेरुल अजम आज भी इल्म का ख़ज़ाना हैं।
अगर वह आज के ज़माने में होते तो वह अदब के ज़रिए क़ौम को बेदार करने का काम करते।
वह नौजवान लिखने वालों को नसीहत करते कि अदब का मक़सद सिर्फ तफ़रीह नहीं बल्कि इस्लाह है।
वह कहते:
> “क़लम अमानत है, इसे सिर्फ सच और ख़ैर के लिए इस्तेमाल करो।”
मग़रिब और जदीद दुनिया
शिबली नोमानी मग़रिबी इल्म और तरक़्क़ी से मुतास्सिर थे, मगर वह अंधी तकलीद के क़ाइल नहीं थे।
अगर वह आज होते तो वह मुसलमानों को नसीहत करते कि मग़रिब की साइंसी तरक़्क़ी से फ़ायदा उठाओ,
मगर अपनी तहज़ीब और अख़लाक़ को मत छोड़ो।
वह यक़ीनन नौजवानों से कहते:
> “तरक़्क़ी हासिल करो, लेकिन अपनी पहचान न खोओ।
इल्म हासिल करो, मगर अपने दीन और अक़दार को साथ रखो।”
मुआशरती इस्लाह
शिबली अगर आज ज़िंदा होते तो वह मुआशरे में फैली हुई झूठ, नफ़रत, और खुदग़र्ज़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते।
वह इत्तेहाद, मुहब्बत और सच्चाई का पैग़ाम देते।
वह कहते कि क़ौमों की तरक़्क़ी का राज़ अख़लाक़ में है, दौलत या ताक़त में नहीं।
उनके नज़दीक ज़वाल की सबसे बड़ी वजह किरदार की कमज़ोरी थी।
वह आज के नौजवानों को यही नसीहत करते:
> “अगर तुम अपने अंदर सच्चाई, मेहनत और ईमान पैदा कर लो तो दुनिया की कोई ताक़त तुम्हें पीछे नहीं रख सकती।”
अगर शिबली नोमानी आज ज़िंदा होते तो वह यक़ीनन उम्मते मुस्लिमा के हालात बदलने की कोशिश करते।
वह तालीम में इस्लाह, अदब में मक़सद, और मुआशरे में अख़लाक़ की नई लहर पैदा करते।
वह शिबली कॉलेज को एक आलमी मेयार का तालीमी मरकज़ बनाते,
जहां इल्म, अख़लाक़ और खिदमत तीनों एक साथ चलते।
वह हमें यह पैग़ाम देते:
> “क़ौमें किताबों से नहीं, किरदार से बनती हैं।
इल्म हासिल करो, मगर उसके साथ इंसानियत को न भूलो।”
शिबली नोमानी का ख़्वाब आज भी ज़िंदा है,
बस ज़रूरत इस बात की है कि हम उनकी सोच को समझें और अपने अमल से उसे हक़ीक़त बनाएं।