तकवा का मतलब है अल्लाह ताला का खौफ रखते हुए हर उस चीज से बचना जो अल्लाह को नापसंद हो, और नेकी की तरफ बढ़ना। यह दिल की कैफियत है जो इंसान के अमल को पाकीजा बनाती है। और यह एक ऐसी सिफते हुस्ना है जो बंदे को रब से करीब तर करने और जन्नत में ले जाने की भरपूर सलाहियत रखती है। और तकवा इख्तियार करने वाले लोगों को अल्लाह रब्बुल इज्जत बहुत पसंद फरमाता है, और उन्हें सबसे बाइज्जत होने का मुज्दा जानफिजा सुनाता है। इरशादे खुदावंदी है:"इन्न अकरमकुम इन्दल्लाह अत्काकुम" यानी अल्लाह के नजदीक तुम में सबसे ज्यादा बाइज्जत वह शख्स है जो तुम में सबसे ज्यादा अल्लाह से डरने वाला है।
इरशादे बारी ताला है:
"वत्तकुलल्लाह वअलमू अन्नल्लाहा मअल मुत्तकीन" ﴿अल-बकरा: 194﴾
तर्जुमा कंजुल ईमान:
"और अल्लाह से डरते रहो और जान रखो कि अल्लाह डर वालों के साथ है।"
इस आयते करीमा में जिक्र किया गया है कि बेशक अल्लाह डरने वालों के साथ है, यानी परहेजगारों के।
अल्लामा जलालुद्दीन बिन अब्दुर्रहमान बिन अबी बक्र सुयूती रहमतुल्लाह अलैह तहरीर फरमाते हैं:
"इत्तकुलल्लाह" (फिल इन्तिसार व तर्क अल-इत्तेदा)
"वअलमू अन्नल्लाहा मअल मुत्तकीन" (बायून वन्नसर)
(तफसीर जलालीन: 28)
इस आयते करीमा में खालिके कायनात ने जहां एक तरफ तकवा इख्तियार करने का हुक्म सादिर फरमाया है, वहीं दूसरी तरफ इस बात की खुशखबरी और बशारत भी दी है कि अल्लाह ताला की मदद व नुसरत और उसके करम व एहसानात तकवा इख्तियार करने वालों के साथ है।
दूसरी जगह इरशाद फरमाया:
"उलाइका अला हुदम मिर रब्बिहिम व उलाइका हुमुल मुफलिहून" ﴿अल-बकरा: 5﴾
तर्जुमा कंजुल ईमान:
"वही लोग अपने रब की तरफ से हिदायत पर हैं और वही मुराद को पहुंचने वाले।"
और जलालुद्दीन बिन अब्दुर्रहमान बिन अबी बक्र सुयूती रहमतुल्लाह अलैह अपनी तफसीर में तहरीर फरमाते हैं:
"उलाइका" (अल-मौसूफून बिमा जक्र)
"हुदम मिर रब्बिहिम व उलाइका हुमुल मुफलिहून" (अल-फाइजून बिल जन्नह, नाजून मिनन्नार)
(तफसीर जलालीन: 4)
"इन्नल मुत्तकीना फी जन्नतिव व नईम
फाकिहीन बिमा आताहुम रब्बुहुम
व वकाहुम रब्बुहुम अजाबल जहीम" ﴿अत्तूर: 17-18﴾
तर्जुमा कंजुल ईमान:
"बेशक परहेजगार बागों और चैन में हैं। अपने रब की दैन पर शाद शाद और उन्हें उनके रब ने आग के अज़ाब से बचा लिया।"
इस आयते करीमा में "फाकिहीन" से मुराद लजीज फल हैं, जिसे हमारा रब मुत्तकियों को जन्नत में अता करेगा।
इन तमाम आयात से तकवा का अमली पहलू रोजे रोशन की तरह वाजेह हो जाता है।
अब हदीसे पाक की रोशनी में तकवा की अहमियत को उजागर किया जाता है। चुनांचे हदीसे पाक है:
"अन् अबी हुरैरह रदियल्लाहु अन्हु काल: कील: या रसूल अल्लाह, मा अक्सरु मा युदखिलुन्नास अल-जन्नह?
काल: तकवल्लाहि व हुस्नुल खुलुक"
(अत-तिरमिजी: 2004)
हजरत अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अर्ज किया गया:
"या रसूल अल्लाह ﷺ! वह कौन सी चीज है जो लोगों को सबसे ज्यादा जन्नत में दाखिल करेगी?"
आप ﷺ ने फरमाया: "अल्लाह का तकवा और अच्छा अखलाक।"
तकवा ऐसा नूर है जो अगर इंसान के अंदर पैदा हो जाए तो उसे दुनिया व आखिरत में सुर्खुरू कर देता है और जन्नत की तरफ रहनुमाई करता है।
आज के परफितन दौर में तकवा की सबसे ज्यादा जरूरत है।
अल्लाह ताला हमें भी तकवा की दौलत से मालामाल फरमाए और अपने बरगुजीदा बंदों में शामिल फरमाए।
आमीन या रब्बुल आलमीन, बिजाहे सैयदिल मुरसलीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम।*
तकवा का मतलब है अल्लाह ताला का खौफ रखते हुए हर उस चीज से बचना जो अल्लाह को नापसंद हो, और नेकी की तरफ बढ़ना। यह दिल की कैफियत है जो इंसान के अमल को पाकीजा बनाती है। और यह एक ऐसी सिफते हुस्ना है जो बंदे को रब से करीब तर करने और जन्नत में ले जाने की भरपूर सलाहियत रखती है। और तकवा इख्तियार करने वाले लोगों को अल्लाह रब्बुल इज्जत बहुत पसंद फरमाता है, और उन्हें सबसे बाइज्जत होने का मुज्दा जानफिजा सुनाता है। इरशादे खुदावंदी है:"इन्न अकरमकुम इन्दल्लाह अत्काकुम" यानी अल्लाह के नजदीक तुम में सबसे ज्यादा बाइज्जत वह शख्स है जो तुम में सबसे ज्यादा अल्लाह से डरने वाला है।
इरशादे बारी ताला है:
"वत्तकुलल्लाह वअलमू अन्नल्लाहा मअल मुत्तकीन" ﴿अल-बकरा: 194﴾
तर्जुमा कंजुल ईमान:
"और अल्लाह से डरते रहो और जान रखो कि अल्लाह डर वालों के साथ है।"
इस आयते करीमा में जिक्र किया गया है कि बेशक अल्लाह डरने वालों के साथ है, यानी परहेजगारों के।
अल्लामा जलालुद्दीन बिन अब्दुर्रहमान बिन अबी बक्र सुयूती रहमतुल्लाह अलैह तहरीर फरमाते हैं:
"इत्तकुलल्लाह" (फिल इन्तिसार व तर्क अल-इत्तेदा)
"वअलमू अन्नल्लाहा मअल मुत्तकीन" (बायून वन्नसर)
(तफसीर जलालीन: 28)
इस आयते करीमा में खालिके कायनात ने जहां एक तरफ तकवा इख्तियार करने का हुक्म सादिर फरमाया है, वहीं दूसरी तरफ इस बात की खुशखबरी और बशारत भी दी है कि अल्लाह ताला की मदद व नुसरत और उसके करम व एहसानात तकवा इख्तियार करने वालों के साथ है।
दूसरी जगह इरशाद फरमाया:
"उलाइका अला हुदम मिर रब्बिहिम व उलाइका हुमुल मुफलिहून" ﴿अल-बकरा: 5﴾
तर्जुमा कंजुल ईमान:
"वही लोग अपने रब की तरफ से हिदायत पर हैं और वही मुराद को पहुंचने वाले।"
और जलालुद्दीन बिन अब्दुर्रहमान बिन अबी बक्र सुयूती रहमतुल्लाह अलैह अपनी तफसीर में तहरीर फरमाते हैं:
"उलाइका" (अल-मौसूफून बिमा जक्र)
"हुदम मिर रब्बिहिम व उलाइका हुमुल मुफलिहून" (अल-फाइजून बिल जन्नह, नाजून मिनन्नार)
(तफसीर जलालीन: 4)
"इन्नल मुत्तकीना फी जन्नतिव व नईम
फाकिहीन बिमा आताहुम रब्बुहुम
व वकाहुम रब्बुहुम अजाबल जहीम" ﴿अत्तूर: 17-18﴾
तर्जुमा कंजुल ईमान:
"बेशक परहेजगार बागों और चैन में हैं। अपने रब की दैन पर शाद शाद और उन्हें उनके रब ने आग के अज़ाब से बचा लिया।"
इस आयते करीमा में "फाकिहीन" से मुराद लजीज फल हैं, जिसे हमारा रब मुत्तकियों को जन्नत में अता करेगा।
इन तमाम आयात से तकवा का अमली पहलू रोजे रोशन की तरह वाजेह हो जाता है।
अब हदीसे पाक की रोशनी में तकवा की अहमियत को उजागर किया जाता है। चुनांचे हदीसे पाक है:
"अन् अबी हुरैरह रदियल्लाहु अन्हु काल: कील: या रसूल अल्लाह, मा अक्सरु मा युदखिलुन्नास अल-जन्नह?
काल: तकवल्लाहि व हुस्नुल खुलुक"
(अत-तिरमिजी: 2004)
हजरत अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अर्ज किया गया:
"या रसूल अल्लाह ﷺ! वह कौन सी चीज है जो लोगों को सबसे ज्यादा जन्नत में दाखिल करेगी?"
आप ﷺ ने फरमाया: "अल्लाह का तकवा और अच्छा अखलाक।"
तकवा ऐसा नूर है जो अगर इंसान के अंदर पैदा हो जाए तो उसे दुनिया व आखिरत में सुर्खुरू कर देता है और जन्नत की तरफ रहनुमाई करता है।
आज के परफितन दौर में तकवा की सबसे ज्यादा जरूरत है।
अल्लाह ताला हमें भी तकवा की दौलत से मालामाल फरमाए और अपने बरगुजीदा बंदों में शामिल फरमाए।
आमीन या रब्बुल आलमीन, बिजाहे सैयदिल मुरसलीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम।