पूर्वी तुर्किस्तान 29 सालों से न भरने वाला ज़ख्म:
और गुलजा हत्याकांड,
5 फरवरी 1997 को पूर्वी तुर्किस्तान के शहर गुलजा में हजारों उइगर तुर्कों का खून बहाया गया। रमजान के आखिरी दिनों में सिर्फ एक सांस्कृतिक समागम में शिरकत पर औरतों को गिरफ्तार किया गया। जब मासूम आवाम उनके हक में निकले तो चीनी सिक्योरिटी फोर्सेस ने गोलियों की बारिश कर दी।
तुर्क नौजवानों को माइनस 30 डिग्री सर्दी में पानी छिड़क कर जमा दिया गया।
औरतों और बच्चों को बेदर्दी से शहीद किया गया।
हजारों लोग लापता कर दिए गए, आज तक कोई खबर नहीं।
लेकिन आज भी कुछ लोग हैं जो यह जुल्म सुनना ही नहीं चाहते।
तुर्क दुनिया खामोश…
उम्मत अंधी, बहरी, गूंगी…
और दुनिया अपने मुफ़ाद के लिए इस जुल्म पर पर्दा डाल रही है।
आह दिल ज़ख्म ज़ख्म है ٫ किससे कहें ٫ कहाँ जाएँ ٫
आह: मेरा ग़ज़ा लुट रहा है٫
मेरा कश्मीर जल रहा है ٫
कोई है जो मेरे ज़ख्मों पर मरहम रखे٫ है कोई ?
और गुलजा हत्याकांड,
5 फरवरी 1997 को पूर्वी तुर्किस्तान के शहर गुलजा में हजारों उइगर तुर्कों का खून बहाया गया। रमजान के आखिरी दिनों में सिर्फ एक सांस्कृतिक समागम में शिरकत पर औरतों को गिरफ्तार किया गया। जब मासूम आवाम उनके हक में निकले तो चीनी सिक्योरिटी फोर्सेस ने गोलियों की बारिश कर दी।
तुर्क नौजवानों को माइनस 30 डिग्री सर्दी में पानी छिड़क कर जमा दिया गया।
औरतों और बच्चों को बेदर्दी से शहीद किया गया।
हजारों लोग लापता कर दिए गए, आज तक कोई खबर नहीं।
लेकिन आज भी कुछ लोग हैं जो यह जुल्म सुनना ही नहीं चाहते।
तुर्क दुनिया खामोश…
उम्मत अंधी, बहरी, गूंगी…
और दुनिया अपने मुफ़ाद के लिए इस जुल्म पर पर्दा डाल रही है।
आह दिल ज़ख्म ज़ख्म है ٫ किससे कहें ٫ कहाँ जाएँ ٫
आह: मेरा ग़ज़ा लुट रहा है٫
मेरा कश्मीर जल रहा है ٫
कोई है जो मेरे ज़ख्मों पर मरहम रखे٫ है कोई ?