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क्या हर नेक अमल सही भी होता है?



नेकी का तसव्वुर हर इंसान के दिल में खूबसूरत होता है। जब कोई अमल “नेक” कहला दे तो उमूमन इस पर सवाल उठाना मएयूब समझा जाता है,

हालांकि असल सवाल यही है कि क्या हर नेक नीयत से किया गया अमल लाज़िमन सही भी होता है?

 इस्लाम हमें जज़्बात के बजाए शऊर के साथ सोचने की दावत देता है, और यही शऊर इस सवाल को जन्म देता है।

इस्लाम में अमल की क़द्र ओ क़ीमत सिर्फ़ नीयत से तय नहीं होती, बल्कि इस के लिए दुरुस्त तरीक़ा भी लाज़िम है। नीयत अगर इख़लास पर मबनी हो मगर तरीक़ा शरीयत के मुताबिक़ न हो, तो वो अमल क़ाबिल-ए-क़बूल नहीं रहता।

 इसी लिए दीन ने हमें सिखाया कि इबादत हो या मामलात, हर काम इल्म और रहनुमाई के तहत होना चाहिए।

अक्सर देखा गया है कि नेकी के जज़्बे में इंसान हुदूद को नज़रअंदाज़ कर देता है। वो समझता है कि चूँकि मक़सद अच्छा है, इस लिए तरीक़ा भी खुद-ब-खुद दुरुस्त हो जाएगा।

 यही सोच बहुत सी ग़लत फहमियों और बिदआत की बुनियाद बनती है। नेकी अगर इल्म के बग़ैर हो तो वो इस्लाह के बजाए बिगाड़ का सबब बन सकती है।

एक और अहम पहलू ये है कि जब नेकी इल्म से ख़ाली हो तो इंसान खुद को मेयार-ए-हक़ समझने लगता है। ऐसी सूरत में इख़्तिलाफ़ दुश्मनी बन जाता है और नसीहत तनक़ीद महसूस होने लगती है। हालंकि दीन का मिज़ाज नरमी, हिकमत और फहम का है, न कि सख़्ती और जल्दबाज़ी का।

ये भी याद रखना चाहिए कि इल्म का मतलब सिर्फ़ मालूमात का अंबार नहीं, बल्कि ये समझना है कि कहाँ, कब और कैसे अमल करना है। सही इल्म के साथ किया गया अमल ही वो नेकी है जो इंसान को अल्लाह के क़रीब करती है और मुआशरे में बेहतरी लाती है।

आखिर में यही कहा जा सकता है कि:
हर नेक अमल नेकी की नीयत से शुरू तो हो सकता है,

मगर सही वही है जो इल्म और शरीयत की रोशनी में हो।
हक़ीक़ी नेकी वो है जिस में इख़लास भी हो और दुरुस्त रहनुमाई भी—क्योंकि दीन में मक़सद जितना अहम है, तरीक़ा भी उतना ही ज़रूरी है।