नमाज़ इस्लाम का बुनियादी स्तम्भ और मोमिन की पहचान है। यह सिर्फ़ चंद हरकतों का नाम नहीं बल्कि बंदे और उसके रब के दरम्यान बराहे रास्त ताल्लुक़ का ज़रिया है। अफ़सोस कि आज हमारे मुआशरे में बे नमाज़ी का रुझान तेज़ी से बढ़ रहा है, ख़ास तौर पर नौजवान नस्ल नमाज़ से दूर होती जा रही है। यह सूरत-ए-हाल न सिर्फ़ दीनी एतबार से ख़तरनाक है बल्कि समाजी और अख़लाक़ी बिगाड़ का भी सबब बन रही है।



मसले की तशख़ीस और अस्बाब!!



बे नमाज़ी के बढ़ने की सब से बड़ी वजह दीनी शऊर की कमी है। बहुत से लोग नमाज़ की फ़र्ज़ियत और उसके मक़ाम से वाक़िफ़ नहीं। दूसरा अहम सबब सुस्ती और ग़फ़लत है, जैसा कि क़ुरान-ए-करीम में मुनाफ़िक़ीन के बारे में फ़रमाया गया:


وَإِذَا قَامُوا إِلَى الصَّلَاةِ قَامُوا كُسَالَى


(सूरۃ النساء: ١٤٢)


तर्जुमा: और जब वह नमाज़ के लिए खड़े होते हैं तो सुस्ती के साथ खड़े होते हैं।


तीसरा सबब माहौल की खराबी है। घरों में नमाज़ का एहतिमाम न होना, वालिदैन की लापरवाही, और मोबाइल फ़ोन व सोशल मीडिया में हद से ज़्यादा मशगूलियत नौजवानों को मस्जिद से दूर कर रही है।



बे नमाज़ी के दीनी और दुनियावी असरात!!



नमाज़ छोड़ने के दीनी असरात निहायत संगीन हैं। क़ुरान-ए-करीम में साफ़ अल्फ़ाज़ में नमाज़ के फ़वाइद बयान किए गए हैं:


إِنَّ الصَّلَاةَ تَنْهَىٰ عَنِ الْفَحْشَاءِ وَالْمُنكَرِ،


(सूरۃ العنکبوت: ٤۵)


तर्जुमा: बेशक नमाज़ बे हयाई और बुराई से रोकती है।


जब नमाज़ छूट जाती है तो इंसान गुनाहों में मुब्तला हो जाता है। दुनियावी एतबार से बे नमाज़ी इंसान बे सुकूनि, ज़ेहनी इज़्तिराब और अख़लाक़ी ज़वाल का शिकार हो जाता है। मुआशरे में झूठ, धोका दही और बदामाली बढ़ जाती है क्योंकि नमाज़ इंसान में अल्लाह के सामने जवाब दही का एहसास पैदा करती है।



अमली हल और तजावीज़ (सब से अहम हिस्सा)!!



इस मसले का हल सब से पहले घरों से शुरू होना चाहिए। वालिदैन खुद नमाज़ के पाबंद बनें और बच्चों को मुहब्बत और नरमी के साथ नमाज़ सिखाएँ। रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:


"مُرُوا أَوْلَادَكُمْ بِالصَّلَاةِ وَهُمْ أَبْنَاءُ سَبْعِ سِنِينَ"


(अबू दाऊद)


तर्जुमा: अपनी औलाद को सात साल की उम्र में नमाज़ का हुक्म दो।


नौजवानों को मस्जिद से जोड़ने के लिए मसाजिद में इस्लाही मजालीस, दरस-ए-क़ुरान और अख़लाक़ी तरबियत के प्रोग्राम मुनअक़िद किए जाएँ।


असातिज़ा स्कूलों और मदारिस में नमाज़ को अमली तौर पर अपनाने की तरग़ीब दें।


आइम्मा किराम ख़ुतबात में सिर्फ़ डाँट डपट के बजाए हिकमत, नरमी और उम्मीद वाला उस्लूब इख़्तियार करें।



क़ुरान व हदीस से मज़बूत दलाइल!!



नमाज़ की अहमियत पर क़ुरान-ए-करीम में सख़्त तनबीह भी आई है: فَوَيْلٌ لِّلْمُصَلِّينَ ( ٤ ) الَّذِينَ هُمْ عَن صَلَاتِهِمْ سَاهُونَ


(सूरۃ الماعون: ٤-۵)


तर्जुमा: पस हलाकत है उन नमाज़ियों के लिए जो अपनी नमाज़ से ग़ाफ़िल रहते हैं।


रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:


"الْعَهْدُ الَّذِي بَيْنَنَا وَبَيْنَهُمُ الصَّلَاةُ، فَمَنْ تَرَكَهَا فَقَدْ كَفَرَ"


(तिरमिज़ी)


तर्जुमा: हमारे और उन के दरम्यान फ़र्क़ नमाज़ है, जिस ने नमाज़ छोड़ दी उस ने कुफ़्र किया।


हज़रत उमरؓ फ़रमाया करते थे:


"لَا حَظَّ فِي الْإِسْلَامِ لِمَنْ تَرَكَ الصَّلَاةَ"


जिस ने नमाज़ छोड़ दी उस का इस्लाम में कोई हिस्सा नहीं।


नतीजा!!


ख़ुलासा यह है कि बे नमाज़ी का बढ़ता हुआ रुझान एक संगीन दीनी व समाजी मसला है, जिस का हल सिर्फ़ बातों से नहीं बल्कि अमली कोशिश से मुमकिन है। अगर वालिदैन, असातिज़ा, आइम्मा और नौजवान सब मिल कर नमाज़ की अहमियत को समझें और इस पर अमल करें तो मुआशरा दोबारा दीन की रौशनी से मुनव्वर हो सकता है।


अल्लाह तआला हमें नमाज़ का पाबंद बनाए और दूसरों के लिए भी हिदायत का ज़रिया बनाए, आमीन या रब्बुल आलमीन