पंद्रह शाबान का रोज़ा रखना मुस्तहब है, हदीस शरीफ से साबित है, इसे नाजायज़ समझना और इस दिन रोज़ा वालों को ताना देना या इस दिन के रोज़े को लाज़िम समझना और न रखने वालों को ताना देना ये सब इफ़रात व तफ़रीत और गलत है, बाकी इसकी कोई अलग फजीलत नहीं है, लिहाज़ा अगर कोई पंद्रह शाबान का रोज़ा रखना चाहता है तो रख सकता है। सुनन इब्ने माजा में हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है:
"अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: जब निस्फ शाबान की रात हो तो रात को इबादत करो और आइंदा दिन रोज़ा रखो, इसलिए कि इसमें गुरुबे शम्स से तुलूए फज्र होने तक आसमान-ए-दुनिया पर अल्लाह तआला नुज़ूल फरमाते हैं और ये कहते हैं: है कोई मगफिरत का तलबगार कि मैं उसकी मगफिरत करूं! है कोई रोजी का तलबगार कि मैं उसको रोजी दूं! है कोई बीमार कि मैं उसको बीमारी से आफियत दूं है! यहां तक कि फज्र तुलू हो जाती है।"
"सुनन इब्ने माजा" में है:
"عن عليِّ بن أبي طالبٍ-رضي الله عنه- قال: قال رسول الله - صلّى الله عليه وسلّم -: "إذا كانتْ ليلةُ النصف من شعبانَ فقومُوا ليلَها وصومُوا نهارَها، فإنّ الله ينزِلُ فيها لغروب الشمس إلى سماء الدنيا، فيقول: أَلا من مستغفِرٍ لي فأغفِرَ له، أَلا مسترزِقٍ فأرزُقَه، أَلا مُبتلًى فأُعافيَه، أَلا كذا أَلا كذا، حتّى يطلعَ الفجرُ".
(أبواب إقامة الصلوات والسنة فيها، باب ما جاء في ليلة النصف من شعبان، ج:2، ص:399، رقم:1388، ط:دار الرسالة العالمية)
फतावा आलमगीरी में है:
"(المرغوبات من الصيام أنواع) أولها صوم المحرم والثاني صوم رجب والثالث صوم شعبان وصوم عاشوراء، وهو اليوم العاشر من المحرم عند عامة العلماء والصحابة - رضي الله تعالى عنهم."
(کتاب الصوم ، الباب الثالث فیما یکرہ للصائم و ما لایکرہ جلد: ۱، ص : ۲۰۲، ط : دارالفکر)
फकत वल्लाहु आलम
मुफ्ती सादिक अमीन कासमी