(28) مضمون
:बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम:
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मकतबों की अहमियत और इसका फिक्र:.
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आज के फितना खेज़ दौर में, जब ईमान के चिराग बुझाने के लिए हर सिम्त से साज़िशों के तूफान उठ रहे हैं, हर दर्द मंद दिल यह सवाल करता है कि हमारी नई नस्ल कहां जा रही है? हमारे बच्चों के दिलों से इस्लाम की मोहब्बत क्यों मानद पड़ गई है? उनके चेहरों से सजदे की चमक, ज़बान से कुरान की मिठास, और दिलों से ईमान की हरारत क्यों कम हो गई है?
इस ज़वाल की एक बड़ी वजह यह है कि हमने मकतबों की असल रूह खो दी है।
वह मकतब जो कभी ईमान के किले, किरदार के चिराग और उम्मत के मुस्तकबिल के निगहबान हुआ करते थे, आज अक्सर रस्मी इदारों में बदल गए हैं। चंद घंटों की तदरीस, नाज़िरा कुरान के चंद अस्बाक — और बस! नतीजा यह कि बच्चा कुरान पढ़ तो लेता है मगर कुरान उसके दिल में नहीं उतरता।
इस्लाम में तालीम व तरबियत की बुनियाद मस्जिद से रखी गई।
मस्जिद न सिर्फ इबादत का मरकज़ है बल्कि ईमान, इल्म और अख़लाक़ की तरबियत का सरचश्मा भी है। नबी अकरम ﷺ ने जब मदीना मुनव्वरा में मस्जिद-ए-नबवी कायम की तो उसी के साथ तालीम व तदरीस का निज़ाम भी शुरू फरमाया। वही मकतब-ए-नबवी था जहां से ईमान की रोशनी फैल कर दुनिया को मुनव्वर कर गई।
आज जब फितनों का सैलाब हर तरफ से उमड़ आया है, ईमान व अक़ीदा पर हमले हो रहे हैं, और मग़रिबी तहज़ीब इस्लामी अख़लाक़ को बहा ले जाने के दरपे है, तो मकतबों की अहमियत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। यही वह किले हैं जिनमें हमारी नस्लों के ईमान की हिफाज़त मुमकिन है।
अल्लाह ताला फरमाता है:
> "क़ूआ अन्फुसकुम व अहलीकुम नारा"
(अल-तहरीम: 6)
"अपने आप को और अपने घर वालों को उस आग से बचाओ जिस का ईंधन इंसान और पत्थर हैं।"
यह आयत वाज़ेह तौर पर वालिदैन, असातज़ा और अहले ईमान सब को तालीम व तरबियत की ज़िम्मेदारी सौंपती है। घर वालों को जहन्नम की आग से बचाने का मतलब यही है कि उनके अक़ीदा व ईमान की हिफाज़त की जाए — और यह उसी वक़्त मुमकिन है जब कुरान व सुन्नत की तालीमात बचपन से ही दिलों में रासिख की जाएं।
मगर अफसोस कि हमने इस फरीज़े को या तो भुला दिया है या इसे सिर्फ खुतबों और वाइज़ों तक महदूद कर दिया है।
आज के बेस्तर स्कूलों में बच्चों के सामने ऐसे अफकार व तसव्वुरात रखे जा रहे हैं जो उन्हें ईमान और इस्लाम से दूर ले जाते हैं।
कभी "आज़ादी-ए-फिक्र" के नाम पर मज़हब का मज़ाक उड़ाया जाता है, कभी "बराबरी" के नाम पर हिजाब और हया को जबर करार दिया जाता है, और कभी "जदीदियत" के पर्दे में लादीनियत को ज़ेहनों में उतारा जाता है।
ऐसे माहौल में अगर मकतब मज़बूत, बामकसद और बाअमल न हुए तो हम अपनी आने वाली नस्ल को ईमान के मैदान में अकेला छोड़ देंगे।
रसूल अल्लाह ﷺ ने फरमाया:
> "मुरु औलादकुम बिस्सलाति वहुम अब्नाउ सबई सिनीन"
(सुनन अबी दाऊद)
"जब तुम्हारे बच्चे सात साल के हो जाएं तो उन्हें नमाज़ का हुक्म दो।"
यह हदीस वाज़ेह करती है कि दीनी तरबियत की इब्तिदा बचपन ही से होनी चाहिए — और यही मकतब का असल मकसद है: बच्चों के दिलों में ईमान, नमाज़, कुरान और अख़लाक़-ए-इस्लामी को रासिख करना।
मुअस्सिर मकतब के लिए ज़रूरी उसूल
1. अक़ीदा व ईमान की बुनियाद:
बच्चों को तौहीद, रिसालत, आखिरत और ईमान के बुनियादी अरकान सिखाए जाएं।
2. कुरान से मोहब्बत:
नाज़िरा के साथ तर्जुमा व मफहूम की आसान तशरीह हो ताकि कुरान दिल में उतर जाए।
3. अख़लाक़ी तरबियत:
सच्चाई, अमानत, हया, एहतराम-ए-वालिदैन व असातज़ा, अदल और खिदमत का शऊर दिया जाए।
4. अमली माहौल:
मकतब में नमाज़, अज़कार और इस्लामी आदाब का अमली निज़्म हो।
5. असातज़ा की तरबियत:
मुअल्लिमीन के लिए तरबियती नशिस्तें हों ताकि वह इल्मी व अख़लाक़ी तौर पर मज़बूत हों
6. वालिदैन का तावुन:
मकतब और वालिदैन का ताल्लुक गहरा हो ताकि घर और मकतब दोनों तरबियत में हम आहंग रहें।
7. अस्र-ए-हाज़िर के तकाज़े :
बच्चों को जदीद फितनों — इंटरनेट, मोबाइल, लिबरल इज्म वगैरा — से आगाह और महफूज़ रखने की तरबियत दी जाए।
अल्लाह ताला का फरमान है:
> "वज़्कुरु निअमतल्लाहि अलैकुम वमा अन्ज़ला अलैकुम मिनल किताबि वल हिक्मति यइज़ुकुम बिही"
(अल-बक़रा: 231)
"और अल्लाह की इस नेमत को याद करो जो उस ने तुम पर नाज़िल की — यानी किताब व हिकमत — जिस के ज़रिए वह तुम्हें नसीहत करता है।"
अगर कुरान व सुन्नत हमारी नस्लों की तरबियत का मरकज़ बन जाएं तो यही मकतब ईमान के किले, तहज़ीब के मदरसे और उम्मत के रोशन चिराग बन जाएंगे।
मकतब महज एक तालीमी इदारा नहीं बल्कि उम्मत-ए-मुस्लिमा के मुस्तकबिल का मुहाफिज़ है।
अगर मकतब मज़बूत होगा तो मस्जिद आबाद होगी, मस्जिद आबाद होगी तो दिल आबाद होंगे, और जब दिल आबाद होंगे तो उम्मत का ईमान ज़िंदा रहेगा।
लिहाज़ा हर इमाम, हर वालिदैन, हर आलिम और हर मोहल्ले के ज़िम्मेदार पर लाज़िम है कि वह मकतबों के निज़ाम को नई रूह अता करें —
इल्म के साथ मोहब्बत, तरबियत के साथ किरदार, और ईमान के साथ शऊर।
अल्लाह ताला हमें ऐसे मकतब कायम करने की तौफीक दे जो उम्मत के ईमान, किरदार और तहज़ीब की हिफाज़त का ज़रिया बनें।
आमीन या रब्बुल आलमीन।
بقलम महमूदुलबारी
mahmoodulbari342@gmail.com