(6) مضمون

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बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

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मुश्किल ازدواجی हालात में सब्र इस्लाह. और शरई रहनुमाई

    सवाल:

अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाही व बरकातुहु

हुज़ूर! मेरा एक मसला है जिस पर मैं शरई रहनुमाई चाहता हूँ।

किसी का निकाह एक ऐसी लड़की से हुआ जिसके बारे में उसके घर वाले और दोस्त सभी मना कर रहे थे, लेकिन उसने जज़्बात में फैसला किया। निकाह के बाद हालात सख्त खराब हो गए हैं। बीवी और उसके घर वाले बार बार बदज़बानी और बेइज्जती करते हैं, और उसके खानदान वाले भी साथ नहीं देते क्योंकि वह पहले ही इस निकाह के खिलाफ थे।

अब उसकी हालत यह है कि:

1. अगर तलाक दे तो बीवी की तरफ से झूठे मुक़दमात और धमकियों का खतरा है।

2. अगर तलाक नहीं दे तो यह रिश्ता उसके लिए जिंदगी भर का बोझ और शर्मिंदगी बन जाता है।

3. दूसरी शादी भी इस हालत में मुमकिन नहीं।

बराए करम कुरान व सुन्नत की रोशनी में रहनुमाई फरमाएं कि ऐसे हालात में उसके लिए शरई तौर पर सही रास्ता क्या है?

अल्लाह आपको जज़ाए खैर अता फरमाए।

        वस्सलाम

जवाब:

अज़ कलम महमूदुलबारी mahmoodulbari342@gmail.com 8292552391 

       ( नोट) 

यह तहरीर महज इल्मी मशवरा है, इसे फतवा हरगिज़ न समझा जाए।

शरई फतवा के लिए मुस्तनद दारुल इफ्ता से रुजू फरमाया जाए

...... 

अलहम्दुलिल्लाह वस सलातु वस सलाम अला रसूल अल्लाह, अम्मा बाद:

यह मसला चंद पहलूओं से समझना जरूरी है:

1. निकाह में मशवरा और तहकीक की अहमियत

इस्लाम ने निकाह के वक्त दीनदारी, अखलाक, खानदान और माहौल देखने की तलकीन की है।

रसूल अल्लाह ﷺ ने फरमाया:

"अगर कोई शख्स तुम्हारे पास निकाह का पैगाम भेजे जिसके दीन और अखलाक से तुम राजी हो तो उससे निकाह कर दो।" (तिरमिज़ी)

और फरमाया:

"औरत से निकाह चार चीजों की बुनियाद पर किया जाता है: माल, हसब व नसब, हुस्न और दीन। तुम दीनदार को तरजीह दो।" (बुखारी व मुस्लिम)

यहां जज्बाती फैसला करना और घर वालों के मशवरे को नजर अंदाज करना गलती थी।

2. ازدواجی اختلافات

अगर बीवी और उसके अहले खाना की तरफ से बदज़बानी और बेइज्जती का सिलसिला हो तो यह शौहर के लिए सख्त आजमाइश है।

कुरान का उसूल है:

"فَإمْسَاكٌ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌ بِإِحْسَانٍ"

(या तो अच्छे तरीके से साथ रखो या अच्छे तरीके से जुदा हो जाओ) [अल-बकरा:229]

3. इस्लाह और सब्र की कोशिश

बीवी के साथ नरम रवैये और हिकमत इख्तियार की जाए।

अगर झगड़ा बढ़े तो सबूत महफूज रखे जाएं।

किसी नेक नीयत बुजुर्ग या आलिम को बीच में डाल कर सुलह की कोशिश की जाए।

कुरान का हुक्म है:

"فَابْعَثُوا حَكَمًا مِّنْ أَهْلِهِ وَحَكَمًا مِّنْ أَهْلِهَا"

(शौहर और बीवी के घर वालों से एक एक सालिस मुकर्रर करो) [अन-निसा:35]

4. बदज़बानी और इज्जत का तहफ्फुज

सख्त कलामी के बावजूद हाथ न उठाया जाए ताकि झूठे मुक़दमात का खतरा न हो।

बदज़बानी और धमकियों के ऑडियो, वीडियो और तहरीरी सबूत महफूज किए जाएं।

तन्हाई में ऐसा मौका न दिया जाए जिससे इल्जाम लगने का खतरा हो।

   5. तलाक की सूरत

अगर इस्लाह की हर कोशिश नाकाम हो जाए तो तलाक इस्लाम में जायज और आखिरी हल है।

तलाक अदल व एहसान के साथ दी जाए।

महर और इद्दत का खर्च अदा किया जाए।

कानूनी तौर पर वकील के मशवरे से कागजात तैयार किए जाएं।

6. झूठे केसेस से बचाव

हिंदुस्तानी कानून के मुताबिक अक्सर खवातीन 498A (Domestic Violence & Dowry Harassment) के तहत केस दायर करती हैं। इससे बचने के लिए:

लेन देन और तोहफे की रसीदें महफूज रखी जाएं।

झगड़ों के सबूत जमा किए जाएं।

वकील के मशवरे से पहले ही कानूनी तैयारी कर ली जाए।

7. दूसरी शादी

अगर पहली बीवी के साथ निबाह न हो सके और अलहदगी हो जाए तो दूसरी शादी जायज है।

शर्त यह है कि पहली बीवी के हुकूक अदा किए जाएं।

दूसरी शादी में दीनदारी और किरदार को तरजीह दी जाए।

   🔸 अमली चेक लिस्ट

✅ अल्लाह से तौबा और इस्तगफार

✅ सब्र व हिकमत से इस्लाह की कोशिश

✅ सालिसी और बुजुर्गों की शमूलियत

✅ सबूत महफूज रखना

✅ हाथ न उठाना (कानूनी खतरा)

✅ शरई व कानूनी तरीके से तलाक देना (आखिरी हल)

✅ वकील से मशवरा और कानूनी तैयारी

✅ दूसरी शादी में दीनदारी को मुकद्दम रखना

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   आखिरी नसीहत

ऐसे शख्स को चाहिए कि दुआ, सब्र और तदबीर को अपना हथियार बनाए।

अल्लाह ताला फरमाता है:

"وَمَن يَتَّقِ اللَّهَ يَجْعَل لَّهُ مَخْرَجًا ۝ وَيَرْزُقْهُ مِنْ حَيْثُ لَا يَحْتَسِبُ"

(जो अल्लाह से डरता है अल्लाह उसके लिए निकलने का रास्ता बना देता है और उसे वहां से रिज़्क देता है जहां से वह गुमान भी नहीं करता) [अत-तलाक:2-3]

लिहाजा बेहतर यही है कि अगर निबाह मुमकिन न हो तो शरई और कानूनी तकाजों को पूरा करते हुए अलहदगी इख्तियार की जाए, और आइंदा के लिए हर बड़े फैसले में दीनदारी, मशवरे और तहकीक को लाजमी बनाया जाए

 वल्लाहू आलम बिस्सवाब

वस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाही व बरकातुहु