इंसान अजीब मखलूक है; बरसों एक ही बस्ती में जीता है, एक ही फ़ज़ा में साँस लेता है, मगर फिर भी बा'ज़ गोशे ऐसे रह जाते हैं जो निगाहों से ओझल, शऊर से नावाक़िफ़ और दिल से अजनबी होते हैं।
मैं भी तक़रीबन एक साल से पीपाड़ में मुक़ीम हूँ। पीपाड़ सिर्फ़ एक क़स्बा नहीं, बल्कि हमारे गाँव की तहसील है, यूँ कहिए कि हमारे गाँव के वजूद का फैलाव है। मगर अफ़सोस कि इसी पीपाड़ के अंदर एक ऐसी जगह भी थी जिस से मैं आज तक नाआश्ना था।
वाक़िआ कुछ यूँ पेश आया कि एक दिन मामूली सी ज़रूरत—समोसों की तलब—मुझे एक अनजान रास्ते पर ले गई। मैं एक आदमी के पीछे पीछे चल पड़ा। रास्ता तंग होता गया, फ़ज़ा बोझल होती गई, और माहौल में एक अंजानी सी घुटन उतरने लगी।
अचानक पीछे से आवाज़ आई:
“हज़रत! यहाँ क्यों आए हो?”
यह जुमला सवाल नहीं, वार्निंग था—मगर तब तक मैं इस दुनिया के दहाने पर क़दम रख चुका था जिसे मैं जानता ही न था।
मैं जिस शख़्स के पास पहुँचा, वह भी बे इख़्तियार कह बैठा:
“आप का यहाँ आना ठीक नहीं, आप बहुत ग़लत जगह आ गए हैं।”
मगर हक़ीक़त यह थी कि ग़लती जगह की नहीं, मेरी ला इल्मी की थी।
वहाँ बैठे लोग अचानक चौंक गए। कोई चीज़ें छुपाने लगा, कोई नज़रें चुरा रहा था, और कोई मुझे इस तरह घूर रहा था गोया मैं ने कोई नाक़ाबिले माफ़ी जुर्म कर दिया हो—जैसे मैं क़ातिल हूँ, या किसी की इज़्ज़त पर हाथ डाल आया हूँ।
वह आँखें नहीं थीं, सवालिया तीर थे; वह ख़ामोशी नहीं थी, इल्ज़ाम था।
चंद लम्हों बाद पर्दा उठा। मालूम हुआ कि वह कोई “वैसी तैसी” जगह नहीं, बल्कि सट्टे बाज़ी का अड्डा था—एक ऐसी दुनिया जहाँ रिज़्क़ की बरकत हार में बदल जाती है, और मेहनत का पसीना जुए के दाँव पर लगा दिया जाता है।
इस लम्हे मुझे एहसास हुआ कि बुराई हमेशा दूर दराज़ जंगलों में नहीं होती, बा'ज़ औक़ात वह हमारे ही आँगन के पीछे साँस ले रही होती है।
हम जिन रास्तों को मामूली समझ कर छोड़ देते हैं, वही रास्ते किसी मुआशरती ज़ख़्म की तरफ़ जाते हैं।
यह वाक़िआ मेरे लिए महज़ एक इत्तेफ़ाक़ नहीं रहा, बल्कि एक आईना बन गया—अपने मुआशरे का भी, और अपनी बेख़बरी का भी।
वाक़ई!
कभी कभी समोसे लेने निकलने वाला इंसान, समाज की तल्ख़ हक़ीक़तों से टकरा जाता है।

*बरकत अल्लाह क़ासमी अफ़ी अन्हु*