बे नमाज़ी की सबसे बड़ी वजह दीनी शऊर का फ़क़दान है। नमाज़ को अक्सर लोग एक रस्मी इबादत समझते हैं, ज़िंदगी की ज़रूरत नहीं। जब नमाज़ की हक़ीक़त, उसकी रूह और उसके फ़वाइद से आगाही न हो तो इबादत बोझ बन जाती है।
दुनिया की मसरूफ़ियात, मोबाइल, सोशल मीडिया, कारोबार और आराम पसंदी ने इंसान को ग़फ़लत में मुब्तला कर दिया है। फज्र की अज़ान नींद में दब जाती है, ज़ुहर व अस्र काम का बहाना बन जाती है और मग़रिब व इशा थकन की नज़र हो जाती है।
जिन घरों में वालिदैन खुद नमाज़ के पाबंद नहीं होते, वहां बच्चों से नमाज़ की उम्मीद रखना महज़ खुश फ़हमी है। बच्चा वही सीखता है जो देखता है, न कि वो जो उसे सिर्फ़ कहा जाए।
नमाज़ की आदत बचपन में डाली जाती है। अगर बचपन में नमाज़ की तरफ़ रग़बत न दिलाई जाए तो बड़े हो कर इस का एहतिमाम मुश्किल हो जाता है।
एक ख़तरनाक सोच ये भी पैदा हो गई है कि नमाज़ मस्जिद तक महदूद है, और दुनियावी ज़िंदगी इस से अलग। नतीजा ये है कि दीन ज़िंदगी से कटता जा रहा है।
बे नमाज़ी के दीनी और दुनियावी असरातक़ुरान मजीद में अल्लाह ताला फ़रमाते हैं:
"فَوَيْلٌ لِّلْمُصَلِّينَ الَّذِينَ هُمْ عَن صَلَاتِهِمْ سَاهُونَ"
(सूरۃ अल-माऊन)
नमाज़ से ग़फ़लत इंसान को आहिस्ता आहिस्ता गुनाहों की तरफ़ ले जाती है। हदीस में आया है कि क़यामत के दिन सबसे पहले नमाज़ का हिसाब होगा। अगर नमाज़ दुरुस्त हुई तो बाक़ी आमाल भी दुरुस्त होंगे
नमाज़ इंसान को बे हयाई और बुराई से रोकती है, जब नमाज़ छूटती है तो किरदार भी कमज़ोर पड़ जाता है। झूठ, बददियानती और ज़ुल्म आम हो जाता है।
बे नमाज़ी के दिल में सुकून नहीं रहता। ज़ाहिरी आसائشें होने के बावजूद दिल बेचैन और मुज़तरिब रहता है, क्योंकि हक़ीक़ी सुकून अल्लाह के ज़िक्र में है।
जब एक फ़र्द नमाज़ छोड़ता है तो इस का असर ख़ानदान और फिर पूरे मुआशरे पर पड़ता है। नमाज़ से दूरी इज्तिमाई ज़वाल का सबब बनती है।
बे नमाज़ी के रुझान का अमली हल (अहम तरीन हिस्सा)वालिदैन खुद पांच वक़्त की नमाज़ का एहतिमाम करें।
बच्चों को हुक्म नहीं बल्कि मुहब्बत, तरग़ीब और अमली नमूने से नमाज़ का आदी बनाएं।
घर में नमाज़ का माहौल बनाएं, बा जमाअत नमाज़ की कोशिश करें।
मदारिस और स्कूलों में नमाज़ की अमली तरबियत दी जाए।
सिर्फ़ निसाब नहीं बल्कि किरदार साज़ी को तरजीह दी जाए।
असातिज़ा खुद नमाज़ के पाबंद हों, क्योंकि उस्ताद का अमल सबसे मुअस्सिर सबक होता है।
मसाजिद को सिर्फ़ इबादत गाह नहीं बल्कि तरबियत गाह बनाया जाए।
नौजवानों के लिए दीनी नशिस्तें, सवाल व जवाब और मुसबत सर गर्मियां रखी जाएं।
आइम्मा किराम खुतबात में सिर्फ़ तन्क़ीद नहीं बल्कि उम्मीद, हल और हिकमत का अंदाज़ अपनाएं।
नमाज़ की अहमियत को सिर्फ़ वअज़ तक महदूद न रखा जाए बल्कि अमली मिसालें पेश की जाएं।
नौजवानों की ज़बान और मसाइल को समझ कर गुफ़्तगू की जाए।
सख़्ती के बजाए हिकमत, नरमी और खैरख़्वाही से दावत दी जाए
सोशल मीडिया पर नमाज़ की तरग़ीब पर मबनी मुख़्तसर, मुअस्सिर पैग़ामात फैलाए जाएं।
अच्छे किरदार और नमाज़ी नौजवानों को बतौरे रोल मॉडल पेश किया जाए।
क़ुरान मजीद में इरशाद है:
"وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ إِنَّ الصَّلَاةَ تَنْهَىٰ عَنِ الْفَحْشَاءِ وَالْمُنكَرِ"
(सूरۃ अल-अंकबूत)
रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"नमाज़ दीन का सुतून है"
(तिरमिज़ी)
हज़रत उमरؓ फ़रमाया करते थे:
"जिस का नमाज़ में हिस्सा नहीं, इस का इस्लाम में हिस्सा नहीं।"
ये दलाइल वाज़ेह करते हैं कि नमाज़ महज़ इबादत नहीं बल्कि पूरे दीन की बुनियाद है।
मुआशरे में बे नमाज़ी का बढ़ता रुझान एक संगीन दीनी और समाजी मसला है, जिस का हल सिर्फ़ तन्क़ीद या जज़्बाती तक़रीरों में नहीं बल्कि अमली इक़दामात में है। अगर वालिदैन, असातिज़ा, उलमा और मुआशरा मिल कर ज़िम्मेदारी अदा करें तो ये रुझान कम हो सकता है। नमाज़ को ज़िंदगी का मरकज़ बनाया जाए, तब ही फ़र्द संवरेगा, ख़ानदान संवरेगा और मुआशरा संवरेगा।
आइए! हम सब अहद करें कि पहले खुद नमाज़ी बनें, फिर दूसरों को नमाज़ की तरफ़ बुलाएं। यही हमारी दुनिया की इस्लाह और आखिरत की कामयाबी का रास्ता है।
*बरकत अल्लाह क़ासमी अफ़ी अन्हु*