शब-ए-बारात की शरई हैसियत और उम्मत-ए-मुस्लिमा का अमली
 रवैया

✍🏻बकलम मुहम्मद आदिल अररियावी 
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मुहतरम कारीईन अल्लाह रब्बुल इज्जत ने अपनी रहमत से हमें कुछ ऐसी रातें अता फरमाई हैं जिनमें बंदा खास तौर पर अपने रब की तरफ मुतवज्जेह हो सकता है शाबान की पंद्रहवीं रात भी ऐसी ही एक अजीम रात है मगर अफसोस कि इसके बारे में लोग या तो इसकी फजीलत का इंकार करते हैं या फिर इसमें हद से तजावुज कर जाते हैं।
शाबान का पूरा महीना बाबरकत और फजीलत वाला होने के साथ-साथ शाबान की पंद्रहवीं रात खुसूसियत के साथ बहुत फजीलत वाली रात है आम बोल चाल में आजकल शाबान की पंद्रहवीं रात को शब-ए-बारात कहते हैं। शब के मानी फारसी में रात के हैं और बारात अरबी का लफ्ज है जिसके मानी बरी होने और निजात पाने के हैं चूंकि इस रात में रहमत इलाही के तुफैल ला तादाद इंसान जहन्नम से निजात पाते हैं इसलिए इस रात को शब-ए-बारात कहते हैं। शाबान की यह पंद्रहवीं रात चौदह तारीख को सूरज गुरुब होने के बाद शुरू होती है क्योंकि चांद की तारीखों में आम कायदा के मुताबिक रात पहले आती है और दिन बाद में यानी रात की तारीख अगले दिन के ऐतबार से और उसके ताबे शुमार होती है। आजकल क्योंकि इस रात और इससे मुताल्लिक अहकाम के बारे में बहुत ज्यादा इफरात व तफरीत पाई जा रही है एक गिरोह वह है जो कि सिरे से इस रात की फजीलत ही का कायल नहीं और इसका दावा यह है कि शब-ए-बारात की फजीलत के बारे में जो अहादीस व रिवायत आई हैं वह सब की सब या तो मौजू व मनगढ़त हैं या शदीद किस्म की जईफ हैं हालांकि यह दावा सही नहीं। दूसरा गिरोह वह है जो शब-ए-बारात को ही सब कुछ समझे हुए है इसके नजदीक शाबान की पंद्रहवीं रात (यानी शब-ए-बारात) की अहमियत शब-ए-कद्र से भी ज्यादा है और उसने सिर्फ शाबान की पंद्रहवीं रात में जाग लेने और इबादत कर लेने को ही दुनिया और आखिरत की कामयाबी और निजात का जरिया ख्याल कर रखा है और शरीयत के दूसरे जरूरी दर्जा के अहकाम को नजरअंदाज कर रखा है जिसका नतीजा यह है कि शरीयत के दूसरे अहकाम में न हलाल व हराम की फिक्र है और न फराइज और वाजिबात का एहतिमाम है न हुकूक अल्लाह की फिक्र है और न हुकूक अल इबाद की।
 अहादीस शरीफ में इस मुबारक रात की बहुत से फजाइल वारिद हुए हैं और असलाफ उम्मत भी इसकी फजीलत के कायल चले आ रहे हैं इसको शब-ए-बारात कहते हैं इसलिए कि इस रात ला तादाद इंसान रहमत बारी ताला से जहन्नम से निजात हासिल करते हैं शब-ए-बारात के मुताल्लिक लोग इफरात व तफरीत का शिकार हैं जबकि बाज़ लोग फजीलत के कायल तो हैं लेकिन इस फजीलत के हुसूल में बेशुमार बिदआत रसूमात और खुद साख्ता उमूर के मुर्तकिब हैं इबादत के नाम पर ऐसे मुनकिरात सर अंजाम देते हैं कि अल अमान व अल हफीज इस बारे में मोतदिल नजरिया यह है कि शाबान की इस रात की फजीलत साबित है लेकिन इसका दर्जा फर्ज व वाजिब का नहीं बल्कि महज इस्तेहबाब का है सिरे से इसकी फजीलत का इंकार करना भी सही नहीं और इसमें किए जाने वाले आमाल व इबादत को फराइज व वाजिबात का दर्जा देना भी दुरुस्त नहीं। हजरत अली रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जब शाबान की पंद्रहवीं शब हो तो इस रात में कयाम करो और इस दिन रोजा रखो इसलिए कि अल्लाह रब्बुल इज्जत गुरुब आफताब के वक्त से आसमान दुनिया पर ऐलान फरमाते हैं क्या कोई है मगफिरत तलब करने वाला कि मैं उसकी मगफिरत करूं? क्या कोई है रिज़्क़ को तलाश करने वाला कि मैं उसे रिज़्क़ अता करूं ? क्या कोई मुसीबत का मारा है कि मैं उसकी मुसीबत दूर करूं ? क्या कोई ऐसा है ? हत्ता कि सुबह सादिक का वक्त हो जाता है (सुनन इब्न माजा) इस रात इशा और फजर की नमाजें वक्त पर बा जमात अदा करें अपनी हिम्मत और तौफीक के मुताबिक नफल नमाजें खास कर नमाज तहज्जुद अदा करें इनफिरादी तौर पर सलात तस्बीह पढ़ें कुरान करीम की तिलावत करें कसरत से अल्लाह का जिक्र करें अल्लाह रब्बुल इज्जत से खूब दुआएं मांगें दुनिया व आखिरत की भलाइयां मांगें खास कर अपने गुनाहों की मगफिरत चाहें इस रात कब्रिस्तान जाएं अपने और मय्यत के लिए दुआए मगफिरत करें।
शाबान की पंद्रहवीं रात में शरीयत की जानिब से इबादत का कोई खास तरीका और इबादत की कोई खास किस्म मुकर्रर नहीं है। बाज़ लोग इस रात में खास किस्म की इबादत को इस रात के लिए मखसूस समझते हैं मसलन बाज़ लोगों ने मखसूस तादाद में मखसूस तरीका पर नफलें पढ़ने को मकसूद या जरूरी समझा हुआ है और बाज़ लोग इस रात में बा जमात नफल नमाजें पढ़ते हैं यह सब चीजें गलत हैं और नफल की जमात करना तो वैसे भी मना है इसी तरह इस रात की इबादत के बारे में एक अहम बात यह है कि तन्हाई में इखलास के साथ जितनी तौफीक हो इबादत की जाए क्योंकि इस रात की इबादत फर्ज नमाजों की तरह इज्तिमाई अंदाज की नहीं है बल्कि इनफिरादी और खलवत वाली है।
ए अल्लाह रब्बुल इज्जत हम पर अपनी खास रहमत नाजिल फरमा हमारे सगीरा व कबीरा गुनाहों को माफ फरमा हमारे जाहिर व बातिन की इस्लाह फरमा हमें जहन्नम से निजात और जन्नतुल फिरदौस अता फरमा हमारे वालिदैन असातजा और तमाम मरहूमीन की मगफिरत फरमा
और हमें अपनी रजा वाले आमाल की तौफीक अता फरमा आमीन या रब्बुल आलमीन।