हमें नाज़ है कि हम उम्मती हैं उनके ﷺ
वो रहमत-ए-आलम, वो शमा-ए-हिदायत हैं
हमें नाज़ है कि हम उम्मती हैं उनके ﷺ।
हमें फ़ख़्र है, हमें नाज़ है और हमें दिल की गहराइयों से यह सआदत महसूस होती है कि हम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के उम्मती हैं। यह महज़ एक दावा नहीं बल्कि एक अज़ीम ज़िम्मेदारी, एक एज़ाज़ और एक रूहानी निस्बत है जो अल्लाह ताला ने हमें अता फ़रमाई। नबी करीम ﷺ की उम्मत में शामिल होना अल्लाह की ख़ास नेमत है, क्योंकि आप ﷺ वो हस्ती हैं जिन्हें तमाम जहानों के लिए रहमत बना कर भेजा गया।
हज़रत मुहम्मद ﷺ की ज़िंदगी सरापा हिदायत है। आप ﷺ ने जहालत, ज़ुल्म और नफ़रत में डूबी हुई दुनिया को इल्म, अदल और मुहब्बत का दरस दिया। आप ﷺ ने इंसानियत को यह सिखाया कि रंग, नस्ल और क़बीले की बुनियाद पर कोई बर्तरी नहीं, बल्कि असल फ़ज़ीलत तक़वा में है। हमें नाज़ है कि हम उस नबी के उम्मती हैं जिन्होंने ग़ुलामों को इज़्ज़त, औरतों को हुक़ूक़ और कमज़ोरों को तहफ़्फ़ुज़
अता किया।
,तेरा शुक्र करूँ कितना अदा।।।
तूने उम्मती मुझे इनकाﷺ कर दिया।।।
नबी करीम ﷺ की सबसे बड़ी सिफ़त रहमत है। आप ﷺ ने अपने दुश्मनों को भी माफ़ किया, ताइफ़ के पत्थरों के बदले बद्दुआ नहीं बल्कि हिदायत की दुआ दी। आप ﷺ की यह शफ़क़त हमें सिखाती है कि उम्मती होने का मतलब सिर्फ़ नाम लेना नहीं बल्कि आप ﷺ के अख़लाक़ को अपनाना है। सच बोलना, अमानतदारी, सब्र, बर्दाश्त और हुस्न-ए-सुलूक—यह सब वो औसाफ़ हैं जो एक सच्चे उम्मती की पहचान हैं।
हमें इस बात पर भी नाज़ है कि हमारे नबी ﷺ ने हमें इल्म की अहमियत से रोशनास कराया। “इल्म हासिल करना हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है” जैसा पैग़ाम दे कर आप ﷺ ने उम्मत को फ़िक्री बुलंदी अता की। आप ﷺ ने तालीम को इबादत का दर्जा दिया, ताकि मुसलमान दुनिया व आख़िरत दोनों में कामयाब हों। एक उम्मती होने के नाते हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इल्म, अमल और अख़लाक़ तीनों में रसूल-ए-अकरम ﷺ की सुन्नत को अपनाएँ।
नबी करीम ﷺ को अपनी उम्मत से बेपनाह मुहब्बत है। अहादीस में आता है कि आप ﷺ अपनी उम्मत की फ़िक्र में रातों को रोया करते थे और क़यामत के दिन भी “उम्मती उम्मती” पुकारेंगे। यह सोच कर दिल मुहब्बत और शुक्र से भर जाता है कि इतने अज़ीम नबी ﷺ ने हमें अपनी फ़िक्र में शामिल रखा। वाक़ई, यह हमारे लिए बाइस-ए-फ़ख़्र है कि हम उस नबी के उम्मती हैं जो अपनी उम्मत के लिए सरापा दुआ थे।
आज के दौर में उम्मत-ए-मुस्लिमा को जिन चैलेंजेज़ का सामना है, उन का हल भी सीरत-ए-नबवी ﷺ में मौजूद है। अगर हम आप ﷺ की तालीमात को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लें तो हमारे इनफ़िरादी और इज्तिमाई मसाइल खुद ब खुद हल हो सकते हैं। इत्तेहाद, उख़ुवत, अदल और रहम—यह वो उसूल हैं जो हमें एक मज़बूत उम्मत बना सकते हैं।
आख़िर में यह कहना बजा है कि उम्मती होना सिर्फ़ एक शिनाख़्त नहीं बल्कि एक अहद है—उस नबी ﷺ के पैग़ाम को आम करने का, उन की सुन्नत पर चलने का और उन के अख़लाक़ को दुनिया के सामने पेश करने का। हमें नाज़ है कि हम उम्मती हैं उनके, और इस नाज़ को अमल से साबित करना ही असल कामयाबी है।
निस्बत-ए-मुस्तफ़ा ﷺ का यह अनमोल तोहफ़ा है,
हमें नाज़ है कि हम उम्मती हैं उनके ﷺ।