हमारे समाज में प्रशिक्षण कोई नैतिक मूल्य नहीं है, बल्कि एक हथियार है और अफ़सोस कि यह हथियार हमेशा औरत, ख़ास तौर पर बहू, के ख़िलाफ़ ही इस्तेमाल होता है।
सास, बहू और ननद के रिश्ते अगर कहीं मोहब्बत की मिसाल बनते हैं तो यह ख़ुशक़िस्मती समझी जाती है, वरना उमूमी मंज़रनामा वही है जिसमें बहू की ख़ामोशी को शराफ़त, उसके सब्र को प्रशिक्षण, और उसके सवाल को बदतमीज़ी क़रार दे दिया जाता है। बहू तब तक क़ाबिल-ए-क़ुबूल रहती है जब तक वो सुनने वाली मशीन बनी रहे जो हुक्म माने, ताना बर्दाश्त करे, और अपने जज़्बात को दफ़न रखे।
ज़रा सी लग़्ज़िश हो जाए, अंजाने में कोई कोताही सरज़द हो जाए, या वो बार-बार की रोक टोक पर “क्यों” कह दे तो फ़ौरन फ़ैसला सादर हो जाता है :
“इसके माँ बाप ने यही सिखाया है।”
यह जुमला महज़ अल्फ़ाज़ नहीं, एक पूरा नज़रिया है ऐसा नज़रिया जो औरत को उसके वालिदैन समेत कटहरे में खड़ा कर देता है, मगर मर्द को हमेशा बचा कर निकाल लेता है।
सवाल यह है कि
अगर बेटा शादी के बाद बीवी का ख़र्च न दे,
अगर वो ज़िम्मेदारियों से पहलू तिही करे,
अगर वो लापरवाही, ग़ुस्सा या बेहिसी दिखाए
तो क्या कभी उसके वालिदैन कहते हैं:
“हमने प्रशिक्षण में कमी की है”?
नहीं।
वहाँ प्रशिक्षण अचानक “ज़ाती मामला” बन जाती है,
और बहू के मामले में “ख़ानदानी मसला”।
यही वो दोहरा मेयार है जो रिश्तों को खोखला करता है मायके जाना भी बहू के लिए एक आज़माइश बन जाता है , जैसे वो ससुराल नहीं, किसी सरकारी दफ़्तर में दरख़ास्त देने आई हो। पहले शौहर को राज़ी करो, फिर सास की मोहर-ए-मंज़ूरी लो, और इस पूरे अमल में अगर बहू ज़ेहनी तौर पर टूट जाए, तो भी उसकी तकलीफ़ ग़ैर अहम समझी जाती है।
अलमिया यह है कि यह सब सिर्फ़ नाम निहाद रिवायती घरों में नहीं होता। ख़ुद को “दीनी घराना” कहने वाले भी अक्सर इसी ज़ुल्म को मज़हब का लिबादा ओढ़ा देते हैं, हालानके दीन ने तो औरत को इज़्ज़त, इख़्तियार और अदल दिया था मगर हमने उसे सिर्फ़ सब्र का सबक़ थमा दिया।
यह कहना आसान है कि “हर घर ऐसा नहीं”,
मगर सच यह है कि अक्सर घरों में यही कहानी दोहराई जाती है।
जब तक प्रशिक्षण का इल्ज़ाम सिर्फ़ बहू के लिए मख़सूस रहेगा,
जब तक बेटों की कोताही को नज़रअंदाज़ और बहू की ख़ामोशी को फ़र्ज़ समझा जाएगा,
तब तक यह मुआशरा रिश्ते नहीं निभाएगा सिर्फ़ ताक़त आज़माएगा।
और ताक़त के बल पर चलने वाले रिश्ते,
आख़िरकार रिश्ते नहीं रहते…
ज़ख़्म बन जाते हैं।
शायद अब वक़्त आ गया है कि हम ख़ुद से यह सवाल करें:
क्या प्रशिक्षण वाक़ई सिर्फ़ बहू की ज़िम्मेदारी है?
या फिर बेटों की परवरिश पर भी इतनी ही ईमानदार नज़र-ए-सानी की ज़रूरत है?
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