घरेलू झगड़ों के माहौल में परवरिश पाने वाला बच्चा सिर्फ़ हालात का मुशाहिदा नहीं करता बल्कि उन्हें अपनी शख्सियत में जज़्ब कर लेता है। उसका ज़ेहन बचपन ही में यह सीख लेता है कि तहफ़्फ़ुज़ मुस्तक़िल नहीं और मुहब्बत ग़ैर यक़ीनी हो सकती है, जो उसकी नफ़सियाती तश्कील पर गहरा असर डालती है।
ऐसे बच्चे अक्सर हद से ज़्यादा मोहतात हो जाते हैं और हर आवाज़ या ख़ामोशी को ख़तरे के तौर पर महसूस करने लगते हैं। उनमें खुद को क़ुसूरवार ठहराने का रुझान भी पाया जाता है, जो आगे चलकर कमज़ोर खुद एतमादी और मुस्तक़िल बेचैनी में बदल सकता है।
रिश्तों में यह बच्चे या तो हद से ज़्यादा ख़ामोश हो जाते हैं या खुद को नज़रअंदाज़ करके ताल्लुक़ निभाने लगते हैं। उनका ज़ेहन ज़रूरत से ज़्यादा जल्द बालिग़ हो जाता है, मगर इस पुख़्तगी की क़ीमत उन्हें अपने जज़्बात को आज़ादाना महसूस करने की सूरत में अदा करनी पड़ती है।