✍️ मोहम्मद सुलेमान कुरेशी
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
इन्सानी वजूद एक ऐसी इमारत की मानिंद है जिस की पायदारी का इनहेसार उस की बुनियादों की मज़बूती पर है। इस्लाम एक मुकम्मल निज़ाम-ए-हयात के तौर पर इंसान को महज़ रूहानियत तक महदूद नहीं रखता, बल्कि उसे एक "मेमार" की सूरत में देखता है जो अपनी ज़िंदगी, मुआशरे और मुस्तक़बिल की तामीर खुद करता है। एक कामयाब मेमार-ए-हयात बनने के लिए तीन फिक्री सुतून नागुज़ीर हैं: जिस्मानी तवानाई, अखलाकी वक़ार, और फन्नी उबूर।*१। कुव्वत-ए-जिस्मानी: अमानत-ए-इलाही की हिफाज़त*
इस्लाम में इंसानी जिस्म को अल्लाह की अमानत करार दिया गया है। एक कमज़ोर और नातवां जिस्म इस अज़ीम मक़सद का बोझ नहीं उठा सकता जो ज़िंदगी ने इस के कांधों पर डाला है। रसूल अल्लाह ﷺ का फरमान-ए-आली शान का हिस्सा है: المؤمن القوي خيرٌ وأحبُّ إلى الله من المؤمن الضعيف، "कवी मोमिन अल्लाह के नज़दीक कमज़ोर मोमिन से बेहतर और ज़्यादा पसंदीदा है" (सही मुस्लिम)।
अदबी लिहाज़ से देखें तो जिस्म वो मुरक्कब है जिस पर सवार हो कर रूह अपनी मंज़िल तक पहुंचती है। अगर सवारी ही मुज़्महिल हो तो मुसाफिर मंज़िल नहीं पा सकता। चुनांचे अपनी गिज़ा में हलाल व तय्यब का एहतेमाम, बाकायदा वर्ज़िश और जिस्मानी मज़बूती महज़ एक शौक नहीं बल्कि एक फरीज़ा है। एक तवाना जिस्म ही वो बुनियाद फराहम करता है जिस पर एक मज़बूत किरदार की इमारत खड़ी की जा सकती है।
*२। तहज़ीब-ए-नफ़्स: सीरत की ताबानी और समाजी वक़ार*
तामीर-ए-हयात का दूसरा मरहला शख्सियत की वो तराश खराश है जो उसे समाज में "मक़बूल व मोतबर" बनाती है। इस्लामी अक़दार में इसे "अदब" और "हुस्न-ए-खुल्क" से ताबीर किया गया है। कुरान करीम ने रसूल अल्लाह ﷺ के बारे में फरमाया: "وَإِنَّكَ لَعَلَىٰ خُلُقٍ عَظِیمࣲ" آية 4 في سورة القلم "बेशक आप अखलाक के बुलंद तरीन मरतबे पर फायज़ हैं" ।
सुन्नत-ए-नबवी हमें सिखाती है कि किस तरह खामोशी में वक़ार और गुफ्तगू में हिकमत पैदा की जाए। जब आप के लहजे में मिठास और बर्ताव में नफासत आती है, तो आप की शख्सियत एक ऐसी मिकनातीसी कुव्वत बन जाती है जो दिलों को फतह करती है।
*३। तस्खीर-ए-कायनात: जदीद उलूम और मसनूई ज़हानत (AI)*
कुरान हकीम बारहा "तस्खीर-ए-कायनात" की दावत देता है। आज के दौर में कायनात की तस्खीर का एक अहम ज़रिया "डिजिटल ख़ला" और "मसनूई ज़हानत" (Artificial Intelligence) है। एक जदीद मेमार-ए-हयात के लिए AI से दूरी दरअसल वक़्त की रफ़्तार से कट जाने के मुतरादिफ़ है।
इस टेक्नोलॉजी को इस्लामी फहम के साथ जोड़ने के लिए दर्ज ज़ैल महारतें हासिल करना ज़रूरी हैं:
*पराउम्पट इंजीनियरिंग (फहम-ए-सवाल): इसे इल्मी इस्लाह में *"दुरुस्त सवाल करने की सलाहियत"* कहा जा सकता है। AI से काम लेना दरअसल अपनी ज़हानत को मशीन के साथ हम आहंग करना है।
*अलगरिथमक फहम (Algorithmic Logic):* यह समझना कि मशीनें कैसे फैसले करती हैं, यह तरीका आप को पेचीदा मसाइल के हल में दूसरों से मुमताज़ कर देता है।
यह दोनों महारतें खुद से ही मश्क करने से यह किसी तजरबा कार की निगरानी में आसानी से हासिल की जा सकती है ।
*ए ए और अखलाक़ियात : (Ethical AI)*
एक मुसलमान माहिर-ए-फन (Technocrat) के तौर पर, AI का इस्तेमाल सच्चाई की तरवीज और इंसानियत की फलाह के लिए करना ही असल कामयाबी है।
खुलासा कलाम यह है कि
"मेमार-ए-हयात" वो है जो अपने जिस्म को नज़्म व ज़ब्त का पाबंद रखे, अपने अखलाक को उसवा-ए-हसना के सांचे में ढाले और अपने हुनर को वक़्त के जदीद तरीन तकाज़ों (AI) से लैस करे। ज़िंदगी संवारने का यह सफर जिस्म की तवानाई से शुरू होता है, शख्सियत की रानाई से गुज़रता है और हुनर की दनाई पर मुकम्मल होता है। जब एक इंसान का जिस्म मज़बूत हो, इस का किरदार बा वक़ार हो और इस के हाथ में वक़्त का सब से बड़ा हुनर हो यही कामयाब ज़िंदगी की अलामत समझी जा सकती है।
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