ख़ालिक़ की मोहब्बत के बिना
मख़लूक़ की मोहब्बत फ़ितना है,
मोहब्बत नहीं बल्कि ज़ुल्मत है,
इश्क़ नहीं बल्कि फ़िस्क़ है,
और इसका मुर्तकिब आशिक़ नहीं बल्कि फ़ासिक़ है। इसी लिए लाज़िम है कि
सबसे पहले महबूब-ए-हक़ीक़ी से मोहब्बत हो, फिर हर जायज़ मोहब्बत अपना हक़ अदा करते हुए
दुरुस्त और मुकम्मल हो जाती है।

*✍️... बंदा अज़हर उद्दीन*