लेख: हाफ़िज़ नईम अहमद सियाल
”आप बहुत अच्छा लिखते हैं।" कार्यक्रम खत्म होने के बाद मैं हॉल से बाहर निकल रहा था कि एक अजनबी आवाज़ मेरे पर्दे-ए-समाअत से टकराई। मैंने मुस्कुराती नज़र उस पर डाली और फ़ौरन ही आँखें झुका लीं वह कोई अजनबी लड़की थी।
”आप की कहानियाँ मैं बहुत शौक़ से पढ़ती हूँ।" वह ठहर ठहर कर बोल रही थी।
”शुक्रिया मोहतरमा।" मेरे मुँह से दो लफ़्ज़ निकले अभी वह कुछ कहना चाह ही रही थी कि मैं बग़ैर तवज्जो दिए जल्दी से आगे की तरफ़ बढ़ गया मैंने बाइक निकाली और स्टार्ट कर दी। उसके चेहरे पर پژमردگی छा गई उसकी नज़रें मेरा ताक़ुब करने लगीं और जब तक मैं उसकी नज़रों से ओझल न हो गया वह मुझे देखती रही मैं यह सब बाइक पर लगे मिरर से देख रहा था। दाएँ मिरर से उसका अक्स साफ़ नज़र आ रहा था। धुंधला धुंधला चेहरा, आँखों में सवालात बसाए वह मुझे ٹکٹکی बांधे देख रही थी। मैंने मोड़ काटी तो मिरर से उसका अक्स ख़त्म हो गया तब मुझे लगा अगर मैं मोड़ न काटता तो वह मुझे देखती रहती।
उसकी आँखों में सवालात किस चीज़ के थे? वह क्या सपने देख रही थी? उसके चेहरे पर پژمردگی क्यों छा गई थी? वह शायद कुछ कहना चाहती थी मगर मैंने उसके दो जुमले सुनने पर ही اکتفا किया और शुक्रिया कहते हुए बाइक उठा कर आ गया था। ”क्या मैं इतना बे حس हो चुका था?" बाइक चलाते हुए अचानक मुझे ख़याल आया, मगर मैं मजबूर था मैंने दोबारा मुलाज़मत पर जाना था बॉस से सिर्फ़ तीन घंटे की ही छुट्टी माँग कर आया था अगर मैं उसकी बातें सुनने में लग जाता तो शायद मुझे देर हो जाती और बॉस ग़ुस्से से गर्म हो जाता। मुझे अभी ताज़ा ताज़ा मुलाज़मत मिली थी अभी तो मैं इस कंपनी में सही तरह एतमाद भी नहीं जमा पाया था तो मैं छुट्टी करने का कैसे सोच लेता।
आज एक क़ौमी अख़बार के ज़ेरे एहतमाम लिखारियों के एज़ाज़ में तक़रीब थी। जिस में मुझे भी مدعو किया गया था और इस तक़रीब में शिरकत करना मेरे लिए बहुत ज़रूरी था। मुल्क भर से आए हुए तमाम लिखारी प्रोग्राम के बाद एक दूसरे से ख़ुश गप्पियों में मसरूफ़ थे। मिलने मिलाने का सिलसिला जारी था मगर मैं किसी से मिले बग़ैर ही वापस आ गया था और जो मुझ से मिलना चाहते थे मैं उन से भी न मिल सका। मैं जानता था यहाँ पर क़ारीईन की काफ़ी तादाद मुझ से मिलने के लिए बेताब है मेरी तहरीरों पढ़ने वालों की एक कसीर तादाद मुझ से मुलाक़ात की ख़्वाहिशमंद है और शायद वह यहाँ इस वजह से आते हैं कि हम अपने पसंदीदा ادیبوں से मिल सकें। तभी प्रोग्राम के इख़्तिताम पर मैंने कुछ लोगों को अपनी तरफ़ आते देखा मगर मैं जल्दी से बाहर निकल गया मैंने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था उनकी ख़्वाहिशात पर اوس पर چکی थी और शायद उन्हीं में से ही वह मोहतरमा थी। हो सकता है वह मुझ से यह पूछना चाहती हो कि मैं कहानियाँ कैसे लिखता हूँ। वह शायद कुछ सीखना चाहती हो मगर मेरी बे तवज्जोही से उसके चेहरे पर پژمردگی छा गई थी।
ज़ेहन की एक खिड़की खुली और यादों के دریچے बाहर आ गए बच्चों का एक अख़बार मेरे हाथ में था।
शग़फ़ ادیب की तहरीर इस दफ़ा भी ज़बरदस्त थी। अपने मुनफ़रिद क़लम से वह अल्फ़ाज़ नहीं बल्कि मोती बिखेरते थे। शुरू से ले कर इख़्तिताम तक ऐसे लगता था जैसे हीरों की माला پروئی हुई हो, लफ़्ज़ों के साथ लफ़्ज़ जुड़े हुए, रब्त के साथ रब्त, क़लम पर गिरफ्त ऐसी जैसे الفاط ख़ुद ब ख़ुद निकलते जा रहे हों। इल्म का समंदर उन के इर्द गिर्द बहता था। हर बार वह अपने क़लम के जौहर सब को दिखाते थे एक नया और अछूता अंदाज़ ले कर और इसी अंदाज़ ने बहुत जल्द ही लोगों के दिलों पर हुक्मरानी कर ली थी। तमाम ایڈیٹرز उनकी तहरीरें شائع करने को ख़्वाहिशमंद नज़र आते थे और वह भी दिल खोल कर लिख रहे थे।
”शग़फ़ ادیب ख़ुद कैसे होंगे?" यह वह सवाल था जो मेरे दिमाग़ में गूंजता था उन को देखने की ख़्वाहिश दिल में मचल रही थी। ख़ुश قسمتی से एक अदबी तक़रीब में उन से मुलाक़ात हो गई वह बड़े पुर तपाक अंदाज़ में मिले। यह अदबी تقریبات ही तो होती हैं जिस में क़ारी और लिखारी एक दूसरे को मिल सकते हैं अगर यह تقریبات न हो ں तो शायद कोई किसी से न मिल सके। इस तक़रीब में ही मैं अपने पसंदीदा लिखारी शग़फ़ ادیب से मिल चुका था। मेरी आँखों में उठने वाला सवाल उन्होंने पढ़ लिया था।
”अगर इंसान मेहनत करे तो सब कुछ पा लेता है अपने फ़न से ईमान दारी, लगन, बढ़ने की جستجو और उसे फैलाने का अज़्म इंसान को आसमान तक पहुंचाता है, حسد, बे ایمانی और धोका बाज़ी जैसी बीमारियाँ अपने दिल से निकाल कर अपने शौक़ को पूरा करने में लग जाओ तो एक दिन बहुत बड़े ادیب बन जाओगे।" शग़फ़ ادیب के यह जुमले वाक़ई मेरी कामयाबी की ज़मानत बन गए और आज मैं भी उन्हीं के मक़ाम तक पहुँच चुका था।
”सर इस फ़ाइल पर दस्तख़त कर दें।"चपरासी ने आ कर मुझे झंझोड़ा तो यादों के دریچے बंद हो गए। मैं अपने ऑफिस पहुँच चुका था वह मोहतरमा अभी तक मेरे दिमाग़ पर छाई हुई थी शायद मैं भी शग़फ़ ادیب की तरह चंद जुमले बोल लेता तो हो सकता है वह उन अल्फ़ाज़ से बहुत कुछ सीख लेती। मेरे दिल में पछतावा उठ रहा था ऐसे लगता था जैसे मैंने बदدیانتی की है मैंने शग़फ़ ادیب के जुमले भुला दिए थे उनकी नसीहतों पर अमल नहीं किया था फिर वहाँ पर मौजूद लिखारियों और क़ारीईन से बग़ैर मिले आ जाना मेरे लिए शर्मिंदगी का बाइस बन चुका था मैं अपने दिल में एक बेचैनी महसूस कर रहा था।
घर वापसी तक मेरे दिल की यही कैफ़ियत रही तक़रीब से मिलने वाला ایواڑد मुझे एक ख़ाली प्लास्टिक की मानिंद लग रहा था अगरچہ कि वह बहुत उम्दा था मगर शायद मैं इस ایوارڈ के क़ाबिल न था मैं अपने कमरे में आया ایوارڈ को एक तरफ़ रखा और हसब-ए-मामूल कहानी लिखने बैठ गया मुझे रोज़ाना एक कहानी लिखना होती थी अभी चंद जुमले ही लिख पाया था कि मेरा क़लम रुक गया अल्फ़ाज़ मुझ से रूठने लग गए थे और यह सब आज वाले वाक़े की सूरत हाल का नतीजा था जल्द ही मैंने एक फ़ैसला कर लिया।
शायद इस दुनिया को فنکاروں की ज़रूरत नहीं इस लिए शायरों, ادیبوں, और مصوروں के फ़न को पेट की आग हड़प कर लेती है क्यों कि उन के चूल्हे उन के फ़न से जल नहीं पाते और वह हाथों से क़लम और ब्रश रख कर मज़दूरी की کدال उठा लेते हैं फ़न मजबूरियों की क़ैद को नहीं मानता बल्कि आज़ादी चाहता है अपनी मर्ज़ी चाहता है और मैं अपने फ़न को यह चीज़ें नहीं दे सकता था, मैं ने अपने क़लम को आख़िरी बार देखा उसे चूमा और हमेशा के लिए ख़ैर बाद कह दिया।