हम जहाँ कहीं भी हों जो कुछ भी कर रहे हों मौत हमारे पीछा में होती है...!!
हम कहीं भी चले जाएं मौत से दूर नहीं भाग सकते मौत का वक्त मुतअय्यन है हर गुज़रता दिन हम को हमारी मौत के करीब ले जा रहा है मौत हर वक्त हमारे पीछा में लगी होती है हम दीन से बेज़ार, दुनिया की रंगीनियों में मस्त, मौत को भुलाए हुए, गुनाहों में लिपटे हुए आखिरत की फिक्र से ला परवाह, दुनिया की जिंदगी में मगन ना मौत की कोई तैयारी ना आखिरत की फिक्र
कब्र हर रोज हमें आवाज़ देती है और हम हर दिन किसी ना किसी की मौत की खबर सुन कर भी अपनी मौत से गाफिल हैं जनाज़ों में शरीक होते हैं मय्यत को कब्र में उतारते हैं मिट्टी डाल कर दो गज़ जमीन में तन्हा छोड़ कर चले आते हैं और इस तरह बेफिक्र हो जाते हैं जैसे बस उनको ही जाना था हमारे लिए दुनिया अबदी है
`كل نفس ذائقة الموت`
`हर ज़ी रूह को मौत का मज़ा चखना है`
यह दुनिया अबदी नहीं है मेरे प्यारे आज कोई और गया है तो कल हम भी जा सकते हैं दुनिया मुसाफिर खाना है हम अभी मंजिल पे नहीं पहुंचे हम तो अभी सफर में हैं यह सफर तवील भी हो सकता है और बहुत कलील भी आज जिंदा हैं सलामत हैं अपनी आखिरत की फिक्र कर लें गुनाहों से खुद को बचा लें नेकियों में सबकत ले जाने वाले बनें कल को हमारे जाने के बाद कोई हमारे लिए कुछ नहीं करेगा जब हम खुद अपनी आखिरत की फिक्र नहीं करते तो कोई और कैसे? और क्यों करेगा..?
जिस तरह हम अपने प्यारों को कब्र तक पहुंचा के उन्हें भूल जाते हैं इसी तरह हमारे प्यारे भी हमें लहद में उतार कर फरामोश कर देंगे....
हमें अपनी आखिरत की फिक्र खुद ही करनी है क्योंकि मौत जब आए गी तो आप को और मुझे मोहलत नहीं देगी
लिहाजा अपनी आखिरत को संवार लें ताकि जब मौत का अचानक हमला हो तो कब्र व हश्र के अज़ाबों के दिफा के लिए हमारे पास आमाल सालेहा मौजूद हों हम अल्लाह से बख्शीश व रहमत और उसकी जन्नत की उम्मीद रख सकें...!!
"اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ، وَمِنْ عَذَابِ النَّارِ، وَمِنْ فِتْنَةِ الْمَحْيَا وَالْمَمَاتِ، وَمِنْ فِتْنَةِ الْمَسِيحِ الدَّجَّالِ"
तर्जुमा: "ए अल्लाह! मैं आप की पनाह मांगता हूं कब्र के अज़ाब से, और आग के अज़ाब से, और जिंदगी और मौत की फितने से, और दज्जाल के
फितने से"
आमीन या अरहम अर राहिमीन
✍️बिन्त शहाब💫