*इश्क़ की व्याख्या शायरी में*
 
एक आशिक़ से सर-ए-राह मुलाक़ात हुई
बड़ी तफ़सील से फिर उस से मिरी बात हुई
मैं ने पूछा तिरी पोशाक ये धानी क्यों है
चश्म-ए-वीराँ में छुपा दर्द का पानी क्यों है
मैं ने पूछा कि ये गेसू हैं परेशाँ क्योंकर
चाक कर रखा है तू ने ये गिरेबाँ क्योंकर
क्यों है चेहरे पे ये सदियों की मुसाफ़त साहिब!
उलझी उलझी सी है क्यों तेरी तबीयत साहिब!
तेरी पोशाक की शिकनों में शिकायत क्यों है
तेरी आँखों में ये दरियाओं सी वहशत क्यों है
पाँव ज़ख़्मी हैं ज़मीं पर भी नहीं टिकते हैं 
मैं समझता हूँ तिरे पाँव में भी छाले हैं 
आँख चुप चाप है अश्कों से बहुत भारी है
ऐसा लगता है छलक जाने की तैयारी है
होंट लगता है कि सदियों से किसी आस में हैं 
उन की ख़ामोशी से लगता है बहुत प्यास में हैं 
मेरी बातों का तसल्सुल था कि रुकता ही न था
ऐसा लगता था कि शायद उसे सुनता ही न था

वह बहुत देर ख़मोशी से मुझे सुनता रहा
कभी खुद को कभी चेहरे को मिरे तकता रहा
फिर हँसा इतना हँसा इतना कि हँसता ही गया
मैं डरा इतना डरा इतना कि डरता ही गया

फिर मुझे प्यार से पहलू में बिठाया उस ने
बड़ी तफ़सील से यूँ इश्क़ पढ़ाया उस ने
तुझ को हैरत मिरे गेसू मिरी पोशाक से है
ज़ख़्मी पैरों से है और सर में पड़ी ख़ाक से है
तुझ को बतलाता हूँ ऐसा मुझे क्या लाहेक है
तुझ से इस लम्हा मुख़ातिब इक आशिक़ है
इश्क़ का नाम तो तू ने भी सुना हो शायद 
कैसे होता है ये कम बख़्त पढ़ा हो शायद
इश्क़ हस्ती भी है मस्ती भी है पिंदार भी है
इश्क़ आँसू भी है नौहा भी है आज़ार भी है
इश्क़ पागल है दीवाना भी है उस्ताद भी है
इश्क़ गिरिया भी तमन्ना भी है फ़रियाद भी है
इश्क़ बस्ती भी है जंगल भी है ज़िंदान भी है
इश्क़ मज़हब है अक़ीदा भी है ईमान भी है
इश्क़ मकतब भी है, उस्ताद भी, उसलूब भी है
इश्क़ यूसुफ़ؑ भी है ईसाؑ भी है याक़ूबؑ भी है
इश्क़ यूनुसؑ भी है मंसूर भी तबरेज़ भी है
इश्क़ कोमल सा तबस्सुम भी जुनूँ ख़ेज़ भी है
इश्क़ हमज़ाؓ भी अलीؓ भी ये बिलाल-ए-हब्शी
और ये मक्का का है क़रिया यही ताइफ़ की गली
इश्क़ असग़रؓ भी है अकबरؓ भी है हसनैनؑ भी है 
इश्क़ ज़ैनबؓ भी है अब्बासؓ भी है ज़ैनؓ भी है
इश्क़ आदमؑ भी है इदरीसؑ, ख़लीलؑ अल्लाह भी 
इश्क़ के दाई रहे मूसा कलीम अल्लाह भी 
इश्क़ ही नार-ए-तौहीद है इस्लाम भी है
इश्क़ आग़ाज़ भी दौरान भी अंजाम भी है
इश्क़ जो ऐन भी है शीन भी है क़ाफ़ भी है
इश्क़ दावा भी है मुंसिफ़ भी है इंसाफ़ भी है
इश्क़ ज़ालिम है जो बाज़ार में बिकवाता है
बीच बाज़ार में आशिक़ को ये नचवाता भी है
इश्क़ ने चीर के आशिक़ को भी दो लख़्त किया
जब भी चाहा किसी बद बख़्त को ख़ुश बख़्त किया
ये तो मामूली सी लग़्ज़िश पे सज़ा देता है
कर के मदहोश ये साँसों को सुला देता है
इश्क़ पागल है दुआओं से उलझ पड़ता है
इतना खुद सर है पेशवाओं से उलझ पड़ता है
इश्क़ आतिश से न सूली से कभी डरता है
इश्क़ दुनिया के क़ातिलों से नहीं मरता है
पर्दे इक और हक़ीक़त से उठाने होंगे
हज़रत-ए-इश्क़ के औसाफ़ बताने होंगे
इस ने जंगल में भी बस्ती का नज़ारा देखा
इस ने हर रोज़ मोहब्बत का शुमारा देखा
इस ने बिफरी हुई मौजों से लड़ाई की है
जो भी पोशीदा थी उस को वह दिखाई दी है
इस ने जलती हुई आतिश में क़दम रखा है
ज़हर-ए-क़ातिल का भी हँस हँस के मज़ा चखा है
इस ने तपती हुई आतिश को ज़बाँ पर रखा
इस ने हँसते हुए हर ज़ुल्म को जाँ पर रखा
हुस्न-ए-लैला ने मोहब्बत की ज़ियारत की है
उस की फ़रियाद ने मजनूँ ने वज़ाहत की है
हुस्न-ए-यूसुफ़ؑ में है पोशीदा जवानी इस की
नौ-ए-इंसान से पहले थी कहानी इस की
इस को मारे हैं ज़माने ने उठा कर पत्थर
इस ने रखे हैं वह सीने से लगा कर पत्थर
इस के बाज़ू कभी गर्दन कभी सर कटता है
फिर भी महबूब के मक़सद से नहीं हटता है
मज़हब-ए-इश्क़ का आईन अनोखा देखा
असल के नाम पे होता यहाँ धोका देखा
इश्क़ आशिक़ से बग़ावत का अक़ीदा माँगे
इश्क़ आशिक़ से मोहब्बत का वज़ीफ़ा माँगे
इन की पोशाक की शिकनों पे न जाओ साहिब
वहशत-ए-चश्म के समझो गे न भाऊ साहिब
इन की मीरास है पाँव के उबलते छाले
बड़े मज़बूत हैं होंटों पे लगाए ताले
जैसे इस इश्क़ की तारीफ़ नहीं मुमकिन है
ऐसे आशिक़ की भी तोसीफ़ नहीं मुमकिन है
ज़ुल्फ़ ओ रुख़सार के रसिया को न आशिक़ कहना
जब भी कहना है उसे इश्क़ का फ़ासिक़ कहना
 जो भी बतलाया मोहब्बत से सँभाले रखना
याद ये क़िस्से ये हिकमत ये हवाले रखना
आज के वास्ते इतनी ही नसीहत है बहुत
इश्क़ की राह में सदमे हैं सुऊबत है बहुत
मैं ये बोला कि बता दो तो चला जाऊँगा
क्या कभी इश्क़ के ओहदे को समझ पाऊँगा 
कह उठा फ़ाल निकाली है तेरा नाम भी है
हलक़ा-ए-इश्क़ में दानिशؔ तेरा कोई काम भी है

             *✍️मुतअल्लिम अल-जामिया अल-अशरफ़िया✍️*