आज का दौर ???

आज के दौर का फितना असल मोबाइल फ़ोन हैं!!!

  • एक ज़माना था जब फितना पहचानना आसान था, मगर आज फितना मुस्कुरा कर आता है। मोबाइल की स्क्रीन, सोशल मीडिया, झूठी चमक दमक और नफ़्स की ख्वाहिशात इंसान के ईमान को आहिस्ता आहिस्ता कमज़ोर कर देती हैं। एक नौजवान आदिल की कहानी है, जो नमाज़ पढ़ता था मगर आहिस्ता आहिस्ता मसरूफ़ियत के नाम पर ताख़ीर करने लगा। फिर एक दिन नमाज़ छूटने लगी और उसे एहसास भी न हुआ।


  • फितना यही है कि गुनाह को मामूली बना दिया जाए। दिल सियाह होता है और इंसान को एहसास नहीं रहता। आदिल की ज़िन्दगी में एक मोड़ उस वक़्त आया जब उसने एक बुज़ुर्ग को कहते सुना: "ईमान की हिफ़ाज़त ऐसे करो जैसे शीशे के बर्तन की।" यह बात उसके दिल में बैठ गई। उसने मोबाइल के इस्तेमाल में एहतियात शुरू की, बुरी सोहबत छोड़ दी, क़ुरान से ताल्लुक़ जोड़ा और नमाज़ की पाबंदी की।


  • ईमान की हिफ़ाज़त के लिए ज़रूरी है कि हम अपने माहौल, दोस्तों और आदतों पर नज़र रखें। ज़िक्र-ए-इलाही, दुआ और नेक सोहबत ईमान को मज़बूत करती है। आज के दौर में फितनों से बचना मुश्किल ज़रूर है, मगर नामुमकिन नहीं। जो अल्लाह पर भरोसा करे, अल्लाह उसके ईमान की हिफ़ाज़त फरमाता है।


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