तड़प हो जिसमें इल्म की... वही रहता है कारवाँ में


*कल एक रूह परवर मंज़र देखने और सुनने को मिला, जो दिल के निहाँ खानों तक उतर गया। एक अज़ीम मजलिस, जहाँ इफ्ता कोर्स की तकमील की तक़रीब मुनअक़िद की गई थी। नात-ए-रसूल-ए-मकबूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और इल्म व हिकमत से भरपूर बयानात ने दिलों को गरमा दिया। लेकिन एक मंज़र ऐसा था जिसने दिल को एक नई रोशनी, एक नई फ़िक्र दी ـــ एक झंझोड़ देने वाली हक़ीक़त।*

*वो लम्हा, जब मुझे ये इल्म हुआ कि* `एक 55 साला बावक़ार खातून ने इफ्ता जैसा अज़ीम, मेहनत तलब और पेचीदा कोर्स मुकम्मल कर लिया है।` *दिल रुक सा गया ... हैरत और अक़ीदत के मिले जज़्बात से आँखें भगने लगीं।*

*यही खातून जो बुखारी शरीफ़ जैसी जलील-उल-क़द्र किताब की मुअल्लिमा भी हैं, इस उम्र में भी इल्म-ए-दीन की तड़प लिए मैदान-ए-इल्म में मसरूफ़-ए-अमल हैं। आज जब कई नौजवान लड़कियाँ थकावट, बोझ या वक़्ती मसरूफियात को वजह बना कर इल्म का सफ़र दरमियान में छोड़ देती हैं, वहाँ ये बाहिम्मत, पुख़्ता उम्र की बहन हमारे लिए जीती जागती मिसाल बन कर सामने आईं।*

*उन का बयान सुनने का शरफ़ भी हासिल हुआ। उन के अल्फ़ाज़ दिल में तीर की मानिंद पैवस्त होते गए। जब उन्होंने पुर जोश अंदाज़ में ये कहा:*

`"मरते दम तक ये तड़प बाक़ी रहेगी!"`

*तो न जाने क्यों आँखें नम हो गईं, दिल काँप उठा। हम ने कब ये जज़्बा खो दिया? वो तलब, वो दीवानगी, वो बेचैनी, जो एक सच्चे तालिब-ए-इल्म की पहचान होती है, वो कहाँ गई?*
*काश! हमारी नौजवान तालिबात इस पैग़ाम को सुनें, इस जज़्बे को महसूस करें, और समझें कि* `इल्म-ए-दीन उम्र का मोहताज नहीं।` *ये तो दिल की प्यास है, रूह की भूख है, जो हर लम्हा सैराबी मांगती है। अफ़सोस, आज हम ज़ाहिरी मशगूलियात, वक़्ती रुकावटों और सुस्ती के सबब इस राह-ए-इल्म से किनारा कश हो जाते हैं।*

`ये बहन हम सब के लिए एक आईना हैं, जो हमें दिखा रहीं हैं कि:`

*न उम्र कभी रास्ता रोकती है, न मसरूफियात रुकावट बनती है न ज़िम्मेदारियाँ बहाने बनती हैं।*

`फ़क़त एक सच्ची तड़प, एक खालिस जुनून, और अल्लाह के लिए खुलूस चाहिए।`

*आज हमें झंझोड़ने की ज़रूरत है, बेदार होने की हाजत है। अगर हम ने इस मौक़ा को ज़ाया कर दिया, तो कल हमारे पास न इल्म होगा न वक़्त,*

`ऐ तालिबात-ए-दीन!`
*उठो, जागो और इस बहन के क़दमों पर निशान रखो।*
*क्यों कि वो तुम्हें दिखा रही हैं कि राह-ए-इल्म की कोई इंतिहाई नहीं... ये सफ़र तो क़ब्र तक जारी रहता है।*

*अल्लाह तआला हमें भी खुलूस-ए-नीयत तलब-ए-सादिक़ और फ़हम-ए-दीन के साथ जुड़ने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।*
*आमीन या रब्बुल आलमीन*

✍🏻 `तालिबा-ए-सालिहात`