समाज में बे नमाज़ी का बढ़ता रुझान

कारण, प्रभाव और व्यावहारिक हल


٭भूमिका٭

नमाज़ इस्लाम का बुनियादी स्तम्भ और मोमिन की रूहानी जिंदगी की बुनियाद है। कुरान-ए-मजीद में बार-बार नमाज़ कायम करने का हुक्म दिया गया है, मगर अफसोस कि मौजूदा दौर में समाज में बे नमाज़ी का रुझान तेजी से बढ़ रहा है। यह सिर्फ एक फर्द का जाती मसला नहीं बल्कि पूरे समाज की अखलाकी व रूहानी ज़बूं हाली की अलामत है।
٭बे नमाज़ी के असबाब٭
٭दीनी तालीम से दूरी
जब घरों और तालीमी इदारों में नमाज़ की अहमियत उजागर नहीं की जाती तो नई नस्ल इससे गाफिल हो जाती है।

٭ दुनिया परस्ती और मसरूफियत
मोबाइल, सोशल मीडिया, कारोबार और तफरीह ने इंसान को इस कदर मशगूल कर दिया है कि नमाज़ के लिए वक्त निकालना मुश्किल समझा जाने लगा है।

٭ घरेलू माहौल का असर
अगर वालिदैन खुद नमाज़ के पाबंद न हों तो बच्चों में भी इसकी आदत पैदा नहीं होती।

٭कमजोर इमानी कैफियत
अल्लाह के खौफ और आखिरत के एहसास की कमी इंसान को इबादतों से दूर कर देती है।
٭ बुरी सोहबत
ऐसे दोस्त और माहौल जो नमाज़ को अहमियत न दें, इंसान को भी गफलत की तरफ ले जाते हैं।
٭बे नमाज़ी के असरात٭


٭ अखलाकी बिगाड़
नमाज़ इंसान को बुराई से रोकती है, इसके बगैर झूठ, बददियानती और बेहयाई आम हो जाती है।
 ٭रूहानी खला
बे नमाज़ी के दिल में सुकून और इतमिनान बाकी नहीं रहता, बेचैनी और इज्तिराब बढ़ जाता है।
٭ माशरती बिगाड़
जब अफराद की इस्लाह नहीं होती तो पूरा समाज बदअमनी और ना इंसाफी का शिकार हो जाता है।
٭आखिरत का नुकसान
नमाज़ तर्क करना अल्लाह की नाराज़ी और आखिरत में सख्त पकड़ का सबब बन सकता है।
٭व्यावहारिक हल٭

٭दीनी तालीम का فروغ
घरों, स्कूलों और मदरसों में नमाज़ की फर्जियत और फजीलत
 को मुअस्सिर अंदाज़ में सिखाया जाए।
٭घरेलू तरबियत
वालिदैन खुद नमाज़ के पाबंद बनें और बच्चों को मोहब्बत और मिसाल के जरिए नमाज़ का आदी बनाएं।
٭ मसाजिद का फाल किरदार
मसाजिद को सिर्फ इबादत गाह नहीं बल्कि तरबियती मराकिज़ बनाया जाए, जहां नौजवानों की इस्लाह हो।
٭अच्छा माहौल और सोहबत
नेक लोगों की सोहबत इख्तियार की जाए जो नमाज़ की तरफ रागिब करें।
٭ज़राए अबलाग का मुसबत इस्तेमाल
मीडिया और सोशल मीडिया पर नमाज़ की अहमियत को उजागर करने वाला मावाद पेश किया जाए।

नतीजा
बे नमाज़ी का बढ़ता हुआ रुझान एक संजीदा समाजी मसला है जिसके असरात फर्द से ले कर पूरे समाज तक फैल जाते हैं। अगर हम हकीकी इस्लाह चाहते हैं तो हमें नमाज़ को अपनी जिंदगी का लाज़मी हिस्सा बनाना होगा। यही नमाज़ फर्द की इस्लाह और समाज की फलाह की ज़ामिन है।