अल्लाह रब्बुल इज्जत ने इंसान को तमाम मखलूकात में सबसे मुनफ़रिद बनाया और उसे लिबास जैसी अज़ीम नेमत अता फरमाई। कुरान-ए-करीम में इरशाद-ए-बारी ताला है: ﴿يَا بَنِي آدَمَ قَدْ أَنْزَلْنَا عَلَيْكُمْ لِبَاسًا يُوَارِي سَوْآتِكُمْ وَرِيشًا ۖ وَلِبَاسُ التَّقْوَىٰ ذَٰلِكَ خَيْرٌ﴾ (सूरह अल-अ'राफ, आयत 26) यानी: “ऐ आदम की औलाद! हमने तुम्हारे लिए लिबास उतारा जो तुम्हारे सतर को छुपाता है और तुम्हारे लिए ज़ीनत है, और तकवा का लिबास इससे बेहतर है।” यह आयत-ए-करीमा ऐलान कर रही है कि लिबास महज जिस्म ढांपने का जरिया नहीं, बल्कि अल्लाह की दी हुई नेमत और इंसान की इज्जत व शराफत का निशान है। यह वह नेमत है जिससे इंसान का खाकी बदन नूर की चादर ओढ़ लेता है। लिबास अक्ल की दलील है, हया का इजहार है, ईमान की पहचान है, और मोमिन के जाहिर में छुपा हुआ उसके बातिन का अक्स है। कुरान व सुन्नत के मुताबिक लिबास के तीन बुनियादी मकासिद हैं: एक, सतर-ए-बदन कि जिस्म के उन हिस्सों को छुपाया जाए जिन्हें जाहिर करना शरअन नाजायज है। फुकहा किराम ने फरमाया: “सतर-ए-औरत वाजिब है, और नमाज में सतर-ए-औरत शर्त है।” (अल-दुर अल-मुख्तार, ज2, स85) दूसरा मकसद ज़ीनत व वकार है कि लिबास इंसान की शख्सियत का आईना बने मगर इसमें तकब्बुर न हो। रसूल अल्लाह ﷺ ने फरमाया: “إن الله جميل يحب الجمال” (मुस्लिम) यानी “अल्लाह खुद जमील है और जमील को पसंद करता है।” लेकिन गुरूर और नुमूदो नुमाइश को नापसंद फरमाता है। तीसरा मकसद लिबास-ए-तकवा है, यानी ऐसा लिबास जो दिल को आजिजी, हया और बंदगी की तरफ ले जाए। यही असल ईमान का लिबास है, और यही वह नूर है जो मोमिन के खाकी बदन को आसमानी चमक अता करता है। अफसोस कि आज के दौर में यह तीनों मकासिद मधम पड़ते जा रहे हैं। न सतर बाकी रहा, न हया, न वकार। तंग लिबास, छोटी आस्तीनें, जिस्म के अ'ज़ा का नुमायाँ होना—यह सब गैर शरई बातें हैं बल्कि फुकहा के नजदीक ऐसी हालत में नमाज मकरूह-ए-तहरीमी बल्कि बातिल हो जाती है। (फतावा आलमगीरी, ज1, स74) नबी करीम ﷺ ने लिबास के बारे में वाजेह हिदायत फरमाई: “كلوا واشربوا وتصدقوا والبسوا في غير إسراف ولا مخيلة” (नसाई) यानी “खाओ, पियो, सदका करो, लिबास पहनो मगर इसराफ और गुरूर के बगैर।” एक और हदीस में फरमाया: “من جر ثوبه خيلاء لم ينظر الله إليه يوم القيامة” (बुखारी) यानी “जो शख्स तकब्बुर से अपना लिबास नीचे लटकाएगा, अल्लाह कयामत के दिन उस पर नजर नहीं फरमाएगा।” इससे जाहिर है कि लिबास का मकसद बंदगी, शुक्रगुजारी और वकार है, न कि नुमाइश और तफाखुर। नबी ﷺ का लिबास सादगी और अजमत का हसीन इम्तेजाज था। हजरत आइशा रज़ी अल्लाह अन्हा फरमाती हैं: “كان أحب الثياب إلى رسول الله ﷺ القميص” (तिरमिजी) यानी नबी ﷺ को कमीज पसंद थी, वह सादा, पाकीजा और टखनों से ऊपर हुआ करती थी। आप ﷺ कभी रेशमी लिबास नहीं पहनते और हमेशा सर ढांप कर रहते। हजरत अनस रज़ी अल्लाह अन्हु फरमाते हैं: “كان رسول الله ﷺ يكثر لبس القلنسوة” (शमाईल तिरमिजी) यानी “नबी ﷺ अक्सर टोपी पहना करते थे।” जुमा और ईद के मौके पर आप ﷺ इमामा बांधते। यह सब अंदाज बंदगी और वकार के मजाहिर थे। वह लिबास जो नबी ﷺ के बदन-ए-अतहर पर था, वह दरअसल ईमान की रोशनी का लिबास था। इसमें सादगी थी मगर दिलकशी भी, आजिजी थी मगर अजमत भी — वह लिबास जिसने खाकी वजूदों को नूरानी बना दिया। सहाबा किराम रिज़वान अल्लाह अलैहिम अजमईन ने अपने आका ﷺ के तर्ज़-ए-जिंदगी को हर्ज़-ए-जां बनाया। उनका लिबास सादा, पाकीजा और तकब्बुर से पाक होता। हजरत उमर रज़ी अल्लाह अन्हु फरमाया करते: “जो लिबास तकब्बुर का बाइस बने, वह लिबास नहीं वबाल है।” औलिया एज़ाम का भी यही शेआर था। हजरत अली हुजवेरीؒ फरमाते हैं: “लिबास अगर तकवा से खाली हो तो बदन ढांपता है मगर दिल नंगा रहता है।” (कश्फ अल-महजूब) यही वह मकाम है जहां लिबास, महज कपड़ा नहीं रहता बल्कि ईमान का आईना बन जाता है — मोमिन का लिबास, उसके खाकी बदन पर नूर का हाला बन जाता है। इस्लामी लिबास के नुमायाँ अज्जा में सर-ए-फहरिस्त टोपी है, जो ईमान का ताज है। फुकहा ने लिखा है: “सर ढांपना सुन्नत-ए-मुअक्किदा है, खुसूसन नमाज और अज़ान के वक्त।” (फतावा शामी) इमामा वकार व इज्जत की अलामत है। नबी ﷺ ने फरमाया: “العمائم تيجان العرب” (अबू दाऊद) यानी “पगड़ियां अरबों के ताज हैं।” उलमा ने फरमाया: “العمامة شعار الإسلام، وترکها یشبہ الکفار” (फतावा रशीदिया) यानी “इमामा इस्लाम की अलामत है, इसे छोड़ना कुफ्फार से मुशाबहत है।” कुर्ता सादगी और सुन्नत का मजहर है और पायजामा हया की मुहाफिज दीवार। रसूल ﷺ ने फरमाया: “ما أسفل من الكعبين من الإزار ففي النار” (बुखारी) यानी “जो कपड़ा टखनों से नीचे हो वह जहन्नम में है।” यह वह लिबास है जो जमीन से जुड़ा हुआ होने के बावजूद आसमान की रोशनी को जज्ब करता है। जो लोग कहते हैं कि लिबास-ए-सुन्नत मामूली बात है, वह दरअसल नबी ﷺ के तरीके की अजमत से गाफिल हैं। आप ﷺ ने फरमाया: “من رغب عن سنتي فليس مني” (बुखारी) यानी “जिसने मेरी सुन्नत से मुंह मोड़ा, वह मुझसे नहीं।” इसलिए लिबास-ए-सुन्नत को मामूली समझना ईमान के नूर को कमजोर करना है। दुनिया में हर पेशे और इदारे का अपना यूनिफार्म है, जो उसकी पहचान है। स्कूल, फौज, पुलिस, यहां तक कि एक आम मजदूर तक अपने लिबास से पहचाना जाता है। तो क्या उम्मत-ए-मुहम्मद ﷺ की कोई पहचान नहीं होनी चाहिए? मुसलमान का यूनिफार्म सुन्नत का लिबास है—टोपी, इमामा, कुर्ता और पायजामा—यही इस्लाम का रूहानी यूनिफार्म है। यही लिबास-ए-मोमिन है जो खाकी बदन पर नूर की परछाइयां डाल देता है। इस्लामी लिबास दरअसल अदब, हया और ईमान का आईना है। यह लिबास नहीं, किरदार का पैराहन है; यह मोमिन के चेहरे की शर्म, दिल की पाकीजगी और रूह की बुलंदी को जाहिर करता है। रसूल ﷺ ने फरमाया: “إن الله إذا أنعم على عبدٍ نعمةً يحب أن يرى أثر نعمته عليه” (तिरमिजी) यानी “अल्लाह चाहता है कि बंदे पर अपनी नेमत का असर जाहिर हो।” और सबसे हसीन इजहार यही है कि बंदा अपने लिबास में अल्लाह की नेमत, नबी की सुन्नत और ईमान की रोशनी को जाहिर करे। यही लिबास-ए-मोमिन है — खाकी बदन पर नूर का हाला, जो तकवा से चमकता, हया से महकता, और बंदगी से जगमगाता है।