ज़माना फ़ितना व इंतिशार का है। क़द्रें मिट रही हैं। बुज़ुर्गों वक़ार पामल हो रहा है। नौजवान खुद को अक़्ल व फ़हम का मेहवर समझने लगे हैं। ज़बानों में कड़वाहट है, आँखों में बेअदबी है। मगर हक़ीक़त यह है कि बड़ों का अदब ही ज़िन्दगी की ज़ीनत है। एहतराम ही इंसानियत का सरमाया है। बेअदबी वह ज़हर है जो रिश्तों को खोखला कर देता है। क़ुरान और हदीस हमें दरस देते हैं कि बड़ों की ताज़ीम दरअसल ईमान का हिस्सा है। क़ुरान मजीद में अल्लाह ताला फ़रमाता है:
﴿وَمَن نُّعَمِّرْهُ نُنَكِّسْهُ فِي الْخَلْقِ أَفَلَا يَعْقِلُونَ﴾ (यसीन)यानी "हम जिस को लम्बी उम्र देते हैं उस की जिस्मानी साख़्त को पलट देते हैं, क्या यह लोग नहीं समझते?"। यह आयत एक आईना है। बुढ़ापा बचपन की तरफ़ पलटना है। हाथ काँपने लगते हैं। क़दम डगमगाने लगते हैं। समाअत कमज़ोर हो जाती है। आँखों की रौशनी मध्यम पड़ जाती है। यह सब अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ हैं। सबक़ यह है कि जो बूढ़े और नातवां हैं, वह एहतराम और ख़िदमत के सब से ज़्यादा हक़दार हैं।क़ुरान के औराक़ में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का वाक़िया मिलता है। वह मदयन पहुंचे। कुँवें पर हुजूम था। मर्द अपने जानवरों को पानी पिला रहे थे। एक तरफ़ दो लड़कियाँ खड़ी थीं। मूसा अलैहिस्सलाम ने पूछा, तुम क्यों नहीं पानी पिलातीं? उन्होंने जवाब दिया: हमारे वालिद बूढ़े हैं, वह बाहर नहीं आ सकते। मूसा अलैहिस्सलाम ने यह सुन कर उन के जानवरों को पानी पिलाया। यह ख़िदमत सिर्फ लड़कियों की नहीं थी, बल्कि एक बूढ़े बाप की ख़िदमत थी। क़ुरान ने इस मंज़र को महफ़ूज़ किया ताकि क़यामत तक लोग समझें कि बूढ़ों की मदद, उन का सहारा बनना, दरअसल शरीयत का तक़ाज़ा है।
हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की दास्तान में भी यही सबक़ है। जब बिनयामीन को रोक लिया गया तो बरादरान यूसुफ़ ने अर्ज़ किया: हमारे वालिद बूढ़े हैं, हम पर रहम कीजिए। इस "बूढ़े वालिद" का वास्ता दिया गया। यह वास्ता खुद बुढ़ापे की अज़मत की दलील है।
क़ुरान ने वालिदैन के साथ हुस्न सुलूक की सख़्त ताकीद की है। फ़रमाया: "जब वह दोनों या उन में से कोई एक बुढ़ापे को पहुंच जाए तो उन्हें उफ़ तक न कहो"। उफ़ तक कहना मना है तो फिर गुस्ताख़ाना जुमले कैसे जायज़ हो सकते हैं? माँ बाप की ख़िदमत जन्नत का रास्ता है, और बेअदबी हलाकत का सामान है।
अहादीस भी इसी हक़ीक़त को बयान करती हैं। रसूल अकरम ﷺ ने फ़रमाया: "इन मिन इजलालिल्लाह इकराम ज़िशशैबतिल मुस्लिम"। यानी सफ़ेद बालों वाले मुसलमान की इज़्ज़त करना अल्लाह की ताज़ीम करना है। एक और हदीस में फ़रमाया: "इन मिन इजलाली तौक़ीरशशैख़ मिन उम्मती"। यानी मेरी उम्मत के बूढ़ों की ताज़ीम करना, दरअसल मेरी ताज़ीम है। एक और मौक़ा पर इरशाद फ़रमाया: "अलबरकतु माअ अकाबिरकुम"। यानी बरकत तुम्हारे बुज़ुर्गों के साथ है।
सीरत-ए-नबवी भी इस अदब का जीता जागता आईना है। एक मरतबा आप ﷺ के सामने दूध का प्याला पेश किया गया। आप ने नोश फ़रमाया। दाईं तरफ़ एक कम उम्र लड़का था और बाईं तरफ़ बुज़ुर्ग बैठे थे। आप ने इस लड़के से इजाज़त चाही कि यह प्याला बुज़ुर्गों को पेश कर दूँ। सोचिए! यह अदल भी है, अदब भी है। एक और मंज़र देखिए। फ़तह मक्का के बाद हज़रत अबु बक्र सिद्दीक़ؓ अपने वालिद हज़रत अबू क़हाफ़ाؓ को, जो बिल्कुल बूढ़े हो चुके थे, इस्लाम क़ुबूल करने के लिए लाए। उन के सर और दाढ़ी सफ़ेद हो चुकी थी। आप ﷺ ने फ़रमाया: अबु बक्र! इन्हें घर पर रखते, मैं खुद इन के पास आ जाता। यह जुमला सुन्नत के आईने में बूढ़ों की इज़्ज़त का ऐसा अक्स है जो क़यामत तक नहीं मिटेगा।
यह वाक़ियात और नुसूस हमें चीख़ चीख़ कर कह रहे हैं कि बड़ों का अदब ज़िन्दगी का सरमाया है। माँ बाप की इज़्ज़त लाज़िम है। असातज़ा का एहतराम फ़र्ज़ है। उलमा की ताज़ीम ईमान है। जो उम्र में बड़े हैं, जो इल्म में बड़े हैं, जो तकवा में बड़े हैं, सब हमारे लिए बाइस-ए-बरकत हैं।
आज के दौर में यह सबक़ और ज़्यादा ज़रूरी है। सोशल मीडिया ने ज़बानें बेलगाम कर दी हैं। नौजवान बड़ों को कमतर समझने लगे हैं। उस्ताद की कुर्सी पर उंगलियाँ उठ रही हैं। माँ बाप की नसीहतों को मज़ाक़ समझा जा रहा है। यह रविश ख़तरनाक है। बेअदबी क़हर इलाही को दावत देती है। कहा गया है: "बा अदब बा नसीब, बेअदब बे नसीब"। अदब ही सआदत है, गुस्ताख़ी महरूमी है।
पस ज़रूरत इस बात की है कि हम बड़ों की ख़िदमत को सआदत जानें। उन की दुआओं को अपनी ज़िन्दगी का सरमाया बनायें। उन के क़दमों को जन्नत का रास्ता समझें। उन्हीं के साए में ज़िन्दगी का सुकून है, उन्हीं के चेहरे में अल्लाह की रहमत की झलक है।