"तख्त-ए-ताऊस"
यह कोई आम तख्त नहीं था। यह दुनिया के इतिहास का सबसे कीमती और शाही तख्त था - जिसे "तख्त-ए-ताऊस" कहा जाता था।
सन 1628... मुगल बादशाह शाहजहां - जिसने ताजमहल जैसा अजूबा तामीर कराया - ने एक और नाकाबिले-ए-तसव्वुर ख्वाब देखा: एक ऐसा तख्त बनाया जाए जो जमीन पर जन्नत का मंजर पेश करे। शाहजहां ने हुक्म दिया, और सल्तनत के बेहतरीन सुनार, जवाहरात तराशने वाले, और फनकारों को इकट्ठा कर लिया गया।
सात साल की शबो-रोज मेहनत के बाद, वह शाहकार वजूद में आया, जिसे दुनिया "तख्त-ए-ताऊस" के नाम से जानती है।
यह तख्त खालिस 1150 किलोग्राम सोने से ढाला गया। इस पर 230 किलोग्राम के करीब हीरे, याकूत, जमर्रद, नीलम, और मोती जड़े गए।
तख्त के पीछे दो मोर (ताऊस) की शक्लें बनी थीं, जिनके परों में सैकड़ों जवाहरात चमकते थे। इन्हीं मोरों के बाइस इसका नाम "तख्त-ए-ताऊस" पड़ा।
यह तख्त सिर्फ ताकत की अलामत न था, यह खुद एक खजाना था।
शाहजहां जब इस तख्त पर बैठता, तो ऐसा लगता जैसे किसी आसमानी तख्त पर फरिश्ता बैठा हो। हर दरबारी, हर सफ़ीर, और हर दुश्मन इसकी झलक पा कर सहम जाता।
तारीख दान कहते हैं: "यह कोई शाही कुर्सी नहीं थी, यह एक एलान था - मुगल सल्तनत की शानो-शौकत का एलान।"
फिर आया वह मनहूस साल - 1739।
ईरान का फ़ातेह नादिर शाह, जिसने फारसी सरजमीन को खून से रंगा था, दिल्ली की जानिब बढ़ा। करनाल की जंग में मुगल افواج को शिकस्त हुई, और नादिर शाह दिल्ली में दाखिल हो गया।
तारीख कहती है: "दिल्ली का हर कूचा नारा-ए-'नादिर शाह जिंदाबाद' से गूंज रहा था... लेकिन यह नारे नहीं, नौहे थे।"
नादिर शाह ने सिर्फ खजाना नहीं लूटा, वह इस तख्त-ए-ताऊस को फतह की अलामत बना कर ईरान ले गया।
इसके साथ साथ कोह-ए-नूर और दरिया-ए-नूर जैसे अजीम हीरों को भी छीन लिया, जो आज भी भारत, ईरान, और ब्रिटेन के तारीखी तनाज़आत का मरकज हैं।
1999 में आलमी माहिरिन आसार-ए-कदीमा ने तख्त-ए-ताऊस की कदरी कीमत का तखमीना लगाया:
तकरीबन साढ़े चार अरब पाकिस्तानी रुपये - और यह 1999 की बात है।
आज की कीमत? अगर इसमें शामिल जवाहरात, सोना और तारीखी कद्र को शामिल किया जाए, तो यह रकम मुमकिना तौर पर 1.5 अरब डॉलर (यानी 400 अरब रुपये) से भी तजावुज कर सकती है।
अफसोस कि यह तख्त वक्त के हाथों बिखर गया।
नादिर शाह के बाद ईरान में सियासी इंतशार ने इस खजाने को टुकड़ों में बिखेर दिया।
आज तख्त-ए-ताऊस अपनी असल हालत में कहीं मौजूद नहीं, लेकिन इसकी चमक तारीख के सफहात पर अब भी जगमगा रही है।
तख्त-ए-ताऊस सिर्फ एक बादशाही कुर्सी नहीं थी, यह उस दौर की ताकत, फन, दौलत, गुरूर, और अंजाम की मुकम्मल दास्तान थी - जो हमें बताती है कि
"दुनिया की कोई भी अजमत, अगर तकब्बुर से भर जाए, तो उसे जवाल जरूर आता है..