*मदरसों की मुअल्लिमात और सोशल मीडिया* 

मदरसे इस्लामी शिक्षा व प्रशिक्षण के प्राचीन केंद्र हैं, जहाँ छात्रों को कुरान, हदीस, फिक़्ह और इस्लामी नैतिकता की शिक्षा दी जाती है। मुअल्लिमात (महिला शिक्षक) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे छात्रों में न केवल इल्मी बल्कि नैतिक और सामाजिक प्रशिक्षण भी प्रदान करती हैं। आज के दौर में सोशल मीडिया जीवन का लाज़िमी हिस्सा बन चुका है, और यह मदरसों के शिक्षा प्रणाली पर भी असर अंदाज़ हो रहा है। सोशल मीडिया दुरुस्त इस्तेमाल के ज़रिए मुअल्लिमात शिक्षा की रसाई को बढ़ा सकती हैं, लेकिन गैर मोहतात इस्तेमाल से ख़तरा भी लाहिक़ हो सकते हैं।


कुरान मजीद में अल्लाह ताअला फरमाता है 

اِقْرَاْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِیْ خَلَقَۚ

 (सूरह अल-अलक: 1)

तर्जुमा कंजुल ईमान: पढ़ो अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया

इस आयत करीमा से यह बात वाजेह तौर पर साबित हो जाती है कि इल्म हासिल करना हर मुसलमान पर फर्ज़ है, और यह फर्ज़ जदीद वसाइल के ज़रिए भी पूरा किया जा सकता है

सोशल मीडिया के फायदे

1. तालीमी मवाद की रसाई

सोशल मीडिया मुअल्लिमात को मौका फराहम करता है कि वह कुरान व हदीस, दुआएं, फिक़्ही मसाइल और अखलाकी तालीमात आसानी से छात्रों तक पहुंचा सकें। दूर दराज़ के छात्र भी इन वसाइल से मुस्तफीद हो सकते हैं।

हदीस पाक में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं

طلب العلم فريضة على كل مسلم (अल-मिशकात:34)

यानी इल्म हासिल करना हर मुसलमान पर फर्ज़ है

2. राब्ता और मशवरात

सोशल मीडिया के ज़रिए वालिदैन, छात्रों और मुअल्लिमात के दरमियान मुअस्सिर राब्ता कायम रहता है। इससे छात्रों के मसाइल बरवक्त हल होते हैं और शिक्षा का मेयार बढ़ता है

3. जदीद दीनी मवाद की तरसील

वीडियो, लेक्चर और मज़ामीन के ज़रिए दीनी शिक्षा ज्यादा दिलचस्प और काबिले फहम बनाई जा सकती है, जो क्लास रूम के अलावा भी छात्रों तक पहुंच सकती है

सोशल मीडिया के चैलेंजेज

1. गैर मुनासिब मवाद

सोशल मीडिया पर गैर इस्लामी या गैर अखलाकी मवाद भी मौजूद होता है, जो नौजवानों के लिए नुकसानदेह हो सकता है

अल्लाह ताअला इरशाद फरमाता है

 وَ لَا تُلْقُوْا بِاَیْدِیْكُمْ اِلَى التَّهْلُكَة ( अल-बकरा: 195)

तर्जुमा कंजुल ईमान: और अपने हाथों हलाकत में न पड़ो

2. वक्त का ज़िया

ज्यादा वक्त सोशल मीडिया पर गुजारना शिक्षा और तरबियत में रुकावट पैदा कर सकता है।

3. जाती मालूमात की हिफाज़त:

सोशल मीडिया पर जाती मालूमात का गैर महफूज इश्तराक न सिर्फ मुआशरती बल्कि शरई तौर पर भी नुकसानदेह है 

इस्लामी तरबियत के ज़रिए रहनुमाई

1. एतदाल और हुदूद का ख्याल

सोशल मीडिया इस्तेमाल में हद एतदाल रखना जरूरी है ताकि यह तालीमी और तरबियती मकसद पूरा करे

कुरान पाक में अल्लाह ताअला इरशाद फरमाता है

اِذَا حَكَمْتُمْ بَیْنَ النَّاسِ اَنْ تَحْكُمُوْا بِالْعَدْلِؕ(अन-निसा: 58)

तर्जुमा कंजुल ईमान: और यह कि जब तुम लोगों में फैसला करो तो इंसाफ के साथ फैसला करो

यहां अदल में एतदाल का पहलू भी शामिल है

2. इल्म की सदाकत और तस्दीक:

मुअल्लिमात को चाहिए कि वह सोशल मीडिया पर जो भी मवाद शेयर करें वह मुस्तनद और सही हो

3. वालिदैन और छात्रों की रहनुमाई:

सोशल मीडिया के इस्तेमाल में वालिदैन और बुजुर्गों की रहनुमाई लाज़िमी है ताकि छात्र दीनी और अखलाकी तरबियत से महरूम न हों

तजावीज़ बराए मुअस्सिर और महफूज इस्तेमाल

सोशल मीडिया को सिर्फ तालीमी और तरबियती मकसद के लिए इस्तेमाल करें

पेशावराना और अखलाकी हुदूद का ख्याल रखें

जाती मालूमात और निजी तस्वीरें का इश्तराक न करें

मेयारी और मुस्तनद दीनी मवाद को तरजीह दें

ऑनलाइन शिक्षा के साथ ऑफलाइन तरबियत और अमली रहनुमाई का तवाज़ुन बरकरार रखें

मदरसों की मुअल्लिमात मुआशरे में इल्म व तरबियत की रोशनी फैलाने का अहम जरिया हैं। सोशल मीडिया एक ताकतवर वसीला हो सकता है बशर्ते कि इसे शरई हुदूद अखलाकियात और तालीमी मकसद के तहत इस्तेमाल किया जाए। कुरान व हदीस की रोशनी में मुअल्लिमात न सिर्फ दीनी शिक्षा पहुंचा सकती हैं बल्कि छात्रों में अखलाकी और समाजी शऊर भी पैदा कर सकती हैं इसलिए जरूरी है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल मुतवाज़िन, महफूज और तालीमी तौर पर मुअस्सिर हो