✒️ इब्न असलम इलाहाबादी 


मुक़ल्लिद का तक़लीद-ए-सही और तक़लीद-ए-शख़्सी दोनों को सही तौर से
 समझना ज़रूरी है। बाज़ दफ़ा मुक़ल्लिद तक़लीद का सही मतलब न समझने की बिना पर बड़ी बड़ी ग़लतियाँ कर जाता है। तक़लीद-ए-मुतलक़ के जवाज़ की हुदूद, ज़माना, और फिर तक़लीद-ए-शख़्सी का वुजूब इसका मक़सद, इसके तर्क पर मुज़र्रत-ए-उख़रवी इन सब को समझना ज़रूरी है। और इन सब का समझना मौक़ूफ़ है मुताला-ए-कुतुब पर और यह मौक़ूफ़ है तलब-ए-हक़ के जज़्बा पर और यह मौक़ूफ़ है फ़िक्र-ए-आख़िरत पर। लिहाज़ा इसबात-ए-तक़लीद के मुताल्लिक़ जो तसानीफ़ मौजूद हैं इनका मुताला करें इनको समझें बावजूद इसके कोई बात समझ न आए तो किसी आलिम-ए-दीन से समझने की कोशिश करें, हठधर्मी बन कर नहीं बल्कि इस्तेफ़हाम की नीयत से। लोग सिर्फ़ एतराज़ करते हैं लेकिन पढ़ते नहीं पढ़ते हैं तो समझते नहीं समझते हैं तो अपनी अक़्ल के घोड़े दौड़ाते हैं नतीजतन पढ़ते सही बात समझते ग़लत बात। इसी लिये उलमा की जानिब दौरान-ए-मुताला रुजू करना ज़रूरी है।