बज़्म-ए-सहाफ़त तुलबा-ए-इलाक़ा-ए-मेवात मज़ाहिर उलूम (वक़्फ़) सहारनपुर के माहनामा "अल-तबलीग़" की रूदाद


(क़िस्त-ए-शशुम) 


सालाना मक़ालात की जाँच 

और मुफ़्ती मोहम्मद जाबिर मेवाती 


       दो तीन जगहों से मायूसी मुक़द्दर ठहरी थी, जिस की वजह से मैं ने अपने आप को तन्हा महसूस किया और मैं काफ़ी परेशान हो गया कि आख़िर जाँच का मरहला बहुत अहम है, दिन सिर्फ़ तीन बाक़ी हैं, करूँ तो आख़िर क्या ? दोपहर की छुट्टी के बाद उसी कश्मकश में था अचानक ख़याल आया कि दार-ए-जदीद मज़ाहिर उलूम सहारनपुर में हमारे मेवात का क़ीमती सरमाया हज़रत मौलाना मुफ़्ती मोहम्मद जाबिर मेवाती मज़ाहिरी हफ़िज़हुल्लाह ताला भी तो हैं, क्यों न उन से मज़ामीन की जाँच करा ली जाए, मुफ़्ती साहब का नाम ज़ेहन में आते ही ये ख़याल शिद्दत पकड़ता चला गया और मुझे तक़रीबन यक़ीन हो चला था कि इंशाअल्लाह ताला मुफ़्ती साहब बह ख़ुशी क़ुबूल फ़रमा लेंगे, चुनांचे मैं ने फ़ौरन बज़रीया-ए-फ़ोन मुफ़्ती मोहम्मद जाबिर मेवाती मज़ाहिरी से राब्ता किया, मुलाक़ात की दरख़ास्त की, अर्ज़ क़ुबूल हुई, दार-ए-जदीद के सदर दरवाज़े पर मुलाक़ात हुई, मैं ने बज़्म सहाफ़त का मुख़्तसर अल्फ़ाज़ में तार्रुफ़ कराते हुए सालाना मुसाबिक़ा-ए-सहाफ़त के मक़ालात की जाँच से मुताल्लिक़ दरख़ास्त की, जिस से मुफ़्ती साहब बहुत ख़ुश हुए और यक़ीनन ख़ुश दिली से क़ुबूल फ़रमा लिया, मगर मसला ये था कि पाँच मक़ाले मुफ़्ती नासिर उद्दीन साहब को दे रखे थे और अब बाक़ी दस मुफ़्ती मोहम्मद जाबिर साहब को तो मुफ़्ती साहब ने ख़दशा ज़ाहिर किया कि इस तरह तो नंबरात में तफ़ावुत का इमकान है और यक़ीनन है, क्यों कि हर आदमी का नंबर देने का मिज़ाज अलग होता है, इस से पहले मैं ये ख़दशा मुफ़्ती नासिरउद्दीन मज़ाहिरी की ख़िदमत में भी अर्ज़ कर चुका था, मैं ने हिम्मत करते हुए मुफ़्ती मोहम्मद जाबिर मेवाती साहब से अर्ज़ किया कि जी हज़रत! आप ही थोड़ी हिम्मत कर के मज़ीद एहसान फ़रमा दीजीए कि मुफ़्ती नासिर उद्दीन साहब के चेक करने के बाद वो पाँच मज़ामीन भी आप ही को दे दूँ गा और उन को भी आप ही जाँच लीजीएगा, इस तरह सारे मज़ामीन आप के ज़रीये ही चेक हो जाएँगे और नंबरात व पोजीशन का एतबार आप की जाँच ही पर होगा, अल्लाह ताला जज़ा-ए-ख़ैर दे हज़रत मुफ़्ती साहब को कि मुफ़्ती साहब ने बिस्यार मशग़ूलियात के बावजूद तमाम मक़ालात की जाँच का वादा फ़रमा लिया, ये हज़रत मुफ़्ती मोहम्मद जाबिर मेवाती मज़ाहिरी की हम तुलबा मेवात पर बहुत बड़ी करम फ़रमाई और वाक़ई एक बड़ा एहसान था कि दरमियानी हफ़्ते में ढेरों मशग़ूलियात के बावजूद हमारी इस दरख़ास्त को क़ुबूल फ़रमा लिया। अल्लाह ताला हज़रत मुफ़्ती साहब को इस के एवज़ अजर-ए-जज़ील अता फ़रमाए आमीन।


     इस के दो दिन बाद यानी ١٠/ रजब अल-मुरज्जब बह रोज़ बुध की शाम को मुफ़्ती नासिरउद्दीन मज़ाहिरी साहब की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और मुफ़्ती साहब से उन पाँच मज़ामीन को ले कर बाद-ए-नमाज़-ए-इशा मुफ़्ती मोहम्मद जाबिर मेवाती मज़ाहिरी की ख़िदमत में पहुँच गया, सुबह तीसरे घंटा में मुफ़्ती साहब का पैग़ाम मौसूल हुआ कि "किसी वक़्त आ कर वो मज़ामीन ले लेना" मैं इस के बाद जल्द ही हज़रत मुफ़्ती साहब की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और यूँ हमारे सारे मक़ाले एक ही मुम्तहिन के क़लम से नतीजा पर आ पहुँचे, हज़रत मुफ़्ती साहब ने मज़ीद एहसान ये फ़रमाया कि इन मक़ालात के साथ मौलाना अब्दुल अज़ीम बलियावी दामत बरकातहुम अल-आलिया की तस्नीफ़ लतीफ़ "अल-मुल्ख़्ख़स फ़ी उलूम अल-हदीस" के तीन नुस्ख़े पोजीशन वाले हज़रात के लिए इनायत फ़रमाए और मज़ीद ये कि हमारी हौसला अफ़ज़ाई की ख़ातिर आने का वादा यूँ कि कर फ़रमाया कि मैं इंशाअल्लाह ताला ज़रूर आऊँगा। जज़ाहुम अल्लाह ख़ैरन कसीरन व अहसन अल-जज़ा (जारी) 


 

मोहताज-ए-दुआ: अब्दुल्लाह यूसुफ़ 

 रजब अल-मुरज्जब ١٤٤٧ हिजरी। 

अवाइल-ए-जनवरी ٢٠٢٦ ईसवी