मौत और मा बाद अल मौत एक फ़िक्र अंगेज़ ख़िताब।
✍🏻 ख़ामा बकफ़ मोहम्मद आदिल अररियावी
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आज जुमा से क़ब्ल बंदा-ए-नाचीज़ को जामा मस्जिद सिसौना जोकि हाट अररिया बिहार में एक निहायत अहम और संजीदा मौज़ू (मौत व मा बाद अल मौत) पर ख़िताब करने का शर्फ हासिल हुआ। ये वो उनवान है जो हर ज़िंदा इंसान के ज़मीर को झंझोड़ने वाला, दिल को दहलाने वाला और रूह को जगा देने वाला है।
ख़िताब में नाचीज़ ने ये वाज़ेह करने की कोशिश की है कि मौत ज़िंदगी का इख़्तिताम नहीं बल्कि एक नए और अबदी सफ़र की शुरुआत है। दुनिया फ़ानी है और इसका हर लम्हा एक इम्तिहान। क़ब्र की तन्हाई, हश्र का मंज़र, मीज़ान का पलड़ा, सिरात का सफ़र ये सब एक हक़ीक़त हैं जिनसे इनकार मुमकिन नहीं।
ये बात भी उजागर की गई कि जो लोग दुनिया में नेकी के साथ जीते हैं वो मौत को दर-ए-रहमत पाते हैं जबकि ग़ाफ़िलों के लिए यही मौत दर-ए-अज़ाब बन जाती है। ईमान, आमाल-ए-सालेहा और तकवा ही वो तोशा है जो मा बाद अल मौत के सफ़र में इंसान के काम आता है।
अल्लाह रब्बुल इज्ज़त से दुआ है कि हमें मौत की तैयारी की तौफ़ीक़ अता फरमाए, हम सब ख़ातमा ईमान पर करे और हमारी आखिरत को कामयाब बनाए। आमीन सुम्मा आमीन या रब्बुल आलमीन।