सामाजिक नैतिकता और महिलाओं की सुरक्षा: भाई कहने की ज़रूरत
हमारा समाज आज नैतिक और सामाजिक सीमाओं के हिसाब से काफ़ी संवेदनशील हो चुका है। महिलाओं को अक्सर गैर-महरम पुरुषों से बात करते हुए अपनी बात में *“भाई”* का लफ़्ज़ शामिल करना पड़ता है। यह महज़ सम्मान या आदाब की बात नहीं, बल्कि एहतियात और अपनी सुरक्षा का एक ज़रिया है। सामाजिक रवैये और मर्दाना सोच ने इसे महिलाओं के लिए एक ज़रूरत बना दिया है, ताकि किसी भी गैर-मुनासिब मफ़हूम या ग़लतफ़हमी से बचा जा सके।
नफ़्सियात के मुताबिक़ मर्द और औरत के दरमियान बात चीत की तर्जुमानी मु्तलिफ़ हो सकती है। मर्द अक्सर किसी भी जुमले या अंदाज़ को अपनी सोच के मुताबिक़ मानी दे लेते हैं, जबकि औरत की नीयत महज़ बात चीत या मालूमात फ़राहम करना हो सकती है। यही फ़र्क़ औरत को मोहतात बनाता है। *भाई कहने का अमल* इस फ़र्क़ को कम करता है और गैर-महरम ताल्लुक़ात में वाज़ेह हदबंदी क़ायम करता है।
यह रवैया न सिर्फ़ हिफ़ाज़ती है बल्कि महिलाओं की ज़ेहनी सुकून के लिए भी ज़रूरी है। सामाजिक दबाव, गैर ज़रूरी तनक़ीद और मर्दाना रवैये अक्सर औरत की नफ़्सियाती सेहत पर असर डाल सकते हैं। एहसास-ए-महरूमी, तन्हाई, डिप्रेशन और बेचैनी जैसे मसाइल पैदा हो सकते हैं। जब औरत बात करते वक़्त वाज़ेह हदबंदी इख़्तियार करती है, तो वह अपने ज़ेहन को महफ़ूज़ रखती है और किसी भी नफ़्सियाती दबाव से बचती है।
माशरती नुक्ता-ए-नज़र से भी भाई कहने का अमल महिलाओं के लिए एक *सोशल प्रोटेक्शन* का किरदार अदा करता है। यह न सिर्फ़ उनके रवैये की वज़ाहत करता है बल्कि गैर-महरम ताल्लुक़ात में किसी भी क़िस्म की ग़लतफ़हमी या छेड़छाड़ के इमकानात को कम करता है। औरतें अक्सर रोज़मर्रा ज़िंदगी में, काम या तालीम के दौरान, किसी गैर-महरम के साथ बात करती हैं। ऐसे में यह छोटा सा लफ़्ज़ एक बड़ी हिफ़ाज़त की ज़मानत बन जाता है।
नफ़्सियाती तहक़ीक़ बताती है कि वाज़ेह हुदूद और बात चीत में एहतियात औरत के अंदर एतमाद और ज़ेहनी सुकून पैदा करती है। जब वह खुद को महफ़ूज़ महसूस करती है, तो उसकी जज़्बाती सेहत बेहतर रहती है और अज़दवाजी ताल्लुक़ात या सामाजिक ज़िंदगी में भी मुसबत असर डालती है। यह भी देखा गया है कि ख़वातीन जो अपने हुदूद वाज़ेह करती हैं, वह कम ज़ेहनी दबाव और कम घबराहट का शिकार होती हैं।
ख़ुलासा यह है कि भाई कहने की आदत सिर्फ़ सामाजिक ज़रूरत नहीं बल्कि महिलाओं की हिफ़ाज़त, नफ़्सियाती सुकून और जज़्बाती तहफ़्फ़ुज़ के लिए भी ज़रूरी है। यह लफ़्ज़ औरत को अपने इर्दगिर्द की दुनिया में खुद को महफ़ूज़ और क़ाबिल-ए-एतमाद महसूस करने में मदद देता है। ऐसे छोटे मामूलात हमारे सामाजिक अख़लाक़ियात को भी बेहतर रखते हैं और महिलाओं की ज़िंदगी को आसान बनाते हैं।
शुक्रिया ۔۔۔