वाक्पटुता एक ऐसी कला है जिसका सबूत कुरान करीम की आयत "अलमहु अल-बयान" से मिलता है, बारी ताला ने हर इंसान को इस सिफत से नवाजा है लिहाजा इससे कोई भी फर्द इंसान मुस्तसना नहीं है, यह वस्फ हर इंसान में बदरजा-ए-अतम मौजूद है-
इंसान अगर इसको निखारे और इसमें कमाल पैदा करे तो उसे खतीब या मुकर्रर कहा जाता है, और जो अपने माफ़ी अल-ज़मीर को मौके व महल के ऐतबार से बेहतरीन तर्ज़ गुफ्तगू और हुस्न अंदाज़, आवाज़ की सोज़ व गुदाज़ के साथ अल्फाज़ व ताबीरात को बेहतरीन पैराये में पिरो कर पेश करे ऐसा शख्स फसीह अल-लसान व बलीग अल-बयान कादिर अल-कलाम कहलाता है-
खताबत की अहमियत हर शख्स जानता है कि अल्लाह ताला ने फन खताबत को इशाअत दीन का जरिया बनाया, तालीम व ताल्लुम, दरस व तदरीस भी खताबत पर मौकूफ है -
रब करीम ने अंबिया कराम को वस्फ खताबत से मुत्तसिफ किया,
इसी के जरिए इंसानों में खुदा का तार्रुफ कराया, और इसी के जरिए गुम गुश्त-ए-राह इंसान को राह रास्त पे लाया, कुरान करीम बे शुमार आयतें ऐसी है हैं जिस सलीक-ए-गुफ्तगू हुनर वाशिगाफ होता है-
फी ज़मानाना अवाम में जो भी खिदमत दीन का काम अंजाम पा रही है इसी खताबत का कमाल है, जबान दानी उरूज व सुऊद और तरक्की-ए-कौम की पहली सीढ़ी है, इंसान अपना तार्रुफ भी इसी के जरिए कराता है, हर मैदान में खताबत की जरूरत है, कोई भी मैदान ऐसा नहीं है जो इससे खाली हो, जो शख्स कादिर अल-कलाम न हो आमता उसे लायक व फायक नहीं समझा जाता और न उसको किसी मनसब आली फायज किया जाता, सियासत में भी आदमी का खतीब होना है जरूरी है, लोगों को अपने इल्तिफात का महवर और गुरुविदा बनाना इसी वक्त मुमकिन है जब आप लसानियत के माहिर हों, वरना तो आपकी बातें बे इल्तिफात की नजर हो जाएंगी है, अगर आप एक आलम दीन हैं मगर तकरीर व खताबत से नावाकिफ हैं तो आप अवाम के लिए नाफे नहीं है, क्योंकि अवाम दीन समझता है खताबत से है, एक मुअल्लिफ की तालीफ सिर्फ खास फायदा पहुंचा सकती है, जबकि एक खतीब की खताबत अवाम व खवास दोनों को फायदा पहुंचा सकती है-
इतनी अहमियत के बावजूद हम इस फन से बे रूखी और रू गर्दानी इख्तियार कर रहे हैं, इसके कई वजुहात हैं
१ हम इसकी अहमियत व अफादियत से नावाकिफ हैं
२ हम कुछ बनना नहीं चाहते
३ हम इसे मुश्किल समझते हैं
४ अहम इसकी जरूरत महसूस नहीं करते, जिस की वजह से बाद में दर पेश मसाइल से वाकिफियत होने के बावजूद माफ़ी अल-ज़मीर को अदा करने से आजिज होते हैं और लोगों के सामने रुसवाई के दामन से खजालत के आंसू पूछते हैं -
रब करीम हमें इस फन से बहरावर फरमाये और इसमें नुमायाँ मकाम पैदा करने की तौफीक मयस्सर फरमाये- आमीन