पिताजी की यात्रा और पुरानी यादें 
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आज दोपहर दौरान कैलाला ख्वाब में वालिद माजिद रहमतुल्लाह अलैह की जियारत हुई (नहीफ जिस्म, लागरपन, कमजोर, सकीम उल हाल मालूम हो रहे थे
गोया मर्ज उल वफात से कबल की सूरत हाल) खेत से फसल के एक मुश्त दाने अपने हाथ में फूँकते हुए घर के बरामदे की जानिब यह कहते हुए तशरीफ ला रहे थे कि आज मस्जिद के इमाम साहब की दावत है-
घर पे वालिदा, हमशीरा और बरादर कबीर बरामदा में कुर्सी पे बैठे थे
वालिद साहब रह ने हुक्म फरमाया! कि आप में से कोई इमाम साहब को इतला करदे, राकिम भी बीमारी की हालत में किसी के सहारे कमरे से बाहर आया और कहा! कि मैं इतला दूँगा 
बस आँख खुल गई -
यह ख्वाब के चंद लम्हात ने पुरानी यादों को ताजा कर दिया,
वालिद माजिद के वफात को छह साल मुकम्मल होने वाले हैं, ख्वाब में भी जियारत के बहुत दिन हो गए थे 
दिल बहुत खुश हुआ कि एक झलक ही सही पर जियारत तो हुई 
काश! कि वालिद साहब रह बकैद-ए-हयात होते तो साया-ए-पदरी से शफकत व मोहब्बत हासिल करते, उमूर मुअम्मा में उनसे मशवरा करते, बहुत सी मोहब्बत व शफकत भरी बातें होती, हँसी मजाक के पर मुसर्रत घड़ी मयस्सर आती -
मुझे वो लफ्ज आज भी याद है जब वालिद साहब मुझे इज राह मोहब्बत व शफकत अक्सर कहा करते थे गोया उनके नजदीक मेरा दूसरा नाम "सरकार" था इसी से अक्सर पुकारते थे, इस वक्त तो मुझे बुरा महसूस होता था चूंकि कमसिन और गैर शेरी की वजह से मैं यह समझता कि वालिद साहब मुझे छेड़ रहे हैं लेकिन; वालिद रह कुछ इस्तयारा कर रहे थे, किसी मकाम पर फायज करना चाहते थे, दीन की खिदमत करूँ यह ख्वाहिश अपने दिल में बिठाये हुए थे,
इसीलिए जब मैंने हिफ्ज शुरू किया था तो पहली मर्तबा वालिद साहब ने "शाबाश" और "आफरीन आफरीन के कलिमात से भी नवाजे, जिसमें मेरे लिए हौसला अफजाई पिन्हा थी -
मेरी तालीम के लिए वालिद साहब की कुर्बानियाँ कभी फरामोश नहीं की जा सकती, दिन रात में जब भी ट्रेन होती तो वालिद साहब साइकिल पे बिठा कर स्टेशन छोड़ने जाते, हत्ता कि एक मर्तबा स्टेशन लेट पहुँचने की वजह से गाड़ी छूट गई तो वापस ले कर घर आये, फिर कुछ दिनों बाद दीगर साथियों के साथ गाँव से तकरीबन 22 किलोमीटर दूर जलाल गढ़ में सवार कराया-
लेकिन वालिद साहब का वो ख्वाब जिसको वो सजाये हुए थे उनकी जिंदगी में पूरा ना हो सका था -
लेकिन अल्हम्दुलिल्लाह मेरे बरादर बुजुर्गवार हसन साहब ने उसको महसूस किया और वो मेरे तालीम को ले कर मुतफिक्र हुए और वो खुद घर की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और आज मुझे उन उमूर से फारिग करके मेरी तालीमी जिम्मेदारी को बा हसन व खूबी अदा कर रहे हैं -
अल्लाह ताला मेरे वालिद साहब रहमतुल्लाह अलैह को जन्नतुल फिरदौस के आला अलीयन में जगह अता फरमाए और उनके ख्वाब को तकमील को पहुँचाए 

और मेरे बरादर बुजुर्गवार को भी अल्लाह ताला जजाए खैर अता फरमाए कि वो मेरे लिए सई पैहम कर रहे हैं