"शीराज़! शीराज़! लो मेरी जान अब खा भी लो, बहुत मजेदार हैं।" अम्मी की अत्यंत प्यार भरी आवाज़ आई।
"नहीं, नहीं, मैं नहीं खाऊँगा, आपको अच्छी तरह मालूम है मुझे भिंडी बिल्कुल नहीं पसंद, मगर आपने फिर भी बना दी। जबकि मैंने सुबह ही कहा था कि मेरे लिए आज बिरयानी बनाइएगा," शीराज़ ने बुरी तरह चिल्लाते हुए जवाब दिया। "जान मेरी! अब्बू घर पर नहीं थे और तुम जानते हो मुलाज़िम अपने घर गया हुआ है, तुम भी स्कूल थे, बताओ मैं बिरयानी के लिए गोश्त किससे मंगवाती?"
अम्मी बदस्तूर दरवाज़े पर खड़ी उसे समझा रही थीं। "बस कह दिया मुझे नहीं खाना, तो नहीं खाना, आप खुद खा लीजिए।" "गंदी बात, बेटे! खाना ठंडा हो रहा है, मैं कब का निकालकर डाइनिंग टेबल पर रख चुकी हूँ। अच्छे बच्चे खाने को इंतजार नहीं करवाते। हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मना फरमाया है।" अम्मी मुश्तक़िल उसे समझाए जा रही थीं- आखिर कार बड़ी मुश्किल से वह माना और मुँह बनाते हुए खाना खाने बैठ गया।
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शीराज़ अपने वालिदैन का इकलौता बेटा था। जहाँ उसमें बहुत सी अच्छाइयाँ थीं, वहीं एक बुराई भी थी और वह यह कि वह रिज़्क़ का एहतराम नहीं करता था। कभी प्लेट में खाना बचा देता, तो कभी कूड़ेदान में डाल देता और अगर उसकी पसंद का खाना नहीं बनता तो बस फिर तो अम्मी की नाक में दम कर देता मगर खाना नहीं खाता।
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आज जब वह अब्बू के साथ कार में स्कूल जा रहा था तो उसने देखा कि मैले कपड़े पहने एक दस साला बच्ची कूड़े में कुछ तलाश कर रही है। वह गौर से देखने लगा, अचानक उसने देखा कि उस बच्ची ने एक मरा हुआ कबूतर उठा लिया और वह रोटी भी जो उस कूड़े के ढेर में पड़ी हुई थी।
वह यकायक चिल्ला उठा "अब्बू! अब्बू! देखें वह बच्ची क्या कर रही है?" उसके अब्बू ने देखा तो वह भी बहुत हैरान हुए कि बच्ची आखिर मरे हुए कबूतर का क्या करेगी, वह कार से उतर गए और उस बच्ची के पास पहुँच कर शफ़क़त से पूछा: "प्यारी बेटी आखिर तुम इस मरे हुए कबूतर का क्या करोगी?" बच्ची की आँखों में आँसू आ गए, वह बोली: "चाचा जान मेरे अब्बू का इंतकाल हो गया है, मेरी माँ लोगों के घर काम काज कर के हमारा पेट पालती है मगर पिछले एक महीने से वह सख्त बीमार है, हमारे घर खाने पीने का सब सामान खत्म हो चुका और अब हमारे पास खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं- मेरे छोटे बहन भाई भूख से बेहाल हो रहे हैं, इसलिए मैं कुछ ढूँढने के लिए इधर आई थी। यह कबूतर और रोटी मेरे बहन भाइयों की भूख तो नहीं मिटा सकेगी मगर कम अज़ कम इतनी तवानाई तो उनमें आ ही जाएगी से कि वह भूख से मर ही न जाएं।"
शीराज़ नन्ही बच्ची की यह सब दर्दनाक दास्तान सुनकर हैरान रह गया, वह अभी सिर्फ ग्यारह साल का था और वह सोच भी नहीं सकता था कि कोई इंसान उस रिज़्क़ की कमी से मर भी सकता है जिसकी वह ज़रा क़द्र नहीं करता था। उसने इंतिहाई शर्मिंदगी और दुख के साथ अपने अब्बू की जानिब देखा। उसके अब्बू भी बहुत उदास थे, फिर उन्होंने उस बच्ची के सर पर मोहब्बत से हाथ रखा और उसकी घर का पता पूछा। उसने बताया कि वह बस्ती के आख़िरी सिरे पर ट्रेन की पटरी के पास रहती है।
शीराज़ के अब्बू ने शीराज़ से कहा कि आज हम स्कूल नहीं जाएंगे बल्कि बच्ची की घर चलेंगे, शीराज़ के अब्बू ने बच्ची को साथ लिया और पहले बाज़ार गए, वहाँ से उसके और उसके घर के अफ़राद के लिए जूते, कपड़े और खाने पीने की ढेर सारी अशिया लें और फिर बस्ती के सिरे पर उसके घर पहुँचे।
उन्होंने वह सब सामान उसकी अम्मी की हवाले कर दिया। उसकी अम्मी चूँकि बे इंतिहा बीमार थीं इसलिए शीराज़ की अब्बू ने उन्हें इलाज के लिए एक बड़ी क़ीमत दी, ताकि वह अपना इलाज करवा लें, शीराज़ की अब्बू ने उनसे ने यह भी कहा कि जब वह ठीक हो जाएं तो घर घर काम के लिए जाने के बजाए उनकी घर में ही मुलाज़मत कर लें, इस तरह उन्हें रहने के लिए मुस्तक़िल ठिकाना भी मिल जाएगा और उनकी इज्ज़त नफ़्स भी मजरूह नहीं होगी। वह खातून उन्हें बेहद दुआएँ देने लगी।
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आज शीराज़ बहुत खुश था, उसने स्कूल न जाकर भी इंसानियत का एक अज़ीम दर्स सीखा था,