उस्ताद: किताबों से आगे शऊर की सल्तनत बनाने वाले
✒️ मुफ़्ती मुहम्मद तस्लीम उद्दीन अल-महमूदी
हर तालिब इल्म की ज़िंदगी में एक ऐसा दौर ज़रूर आता है जब वह अपने वजूद की गहराईयों, अपने सवालात की उलझनों, और अपनी ख़ामोशियों की बेज़बानी को किसी ऐसे फ़र्द के रूबरू रखना चाहता है, जो महज़ पढ़ाने वाला न हो, बल्कि समझने वाला, संभालने वाला, और निखारने वाला हो।
इसी लम्हे एक शख़्सियत उभरती है — जिसे दुनिया "उस्ताद" के मुअज़्ज़ज़ लक़ब से याद करती है।
मगर हक़ीक़त यह है कि उस्ताद महज़ निसाबी इल्म का निगरान नहीं होता। वह तो किरदार साज़ी का मेमार, फ़िक्र ओ शऊर का निगहबान, और इंसानियत के बुनियादी औसाफ़ का ख़ामोश ज़ारे होता है।
उस्ताद बच्चों को सिर्फ़ यह नहीं बताता कि "यह सवाल यूँ हल होता है", बल्कि यह सिखाता है कि "ज़िंदगी के पेचीदा सवालात से कैसे निबर्द आज़मा होना है"।
वह महज़ इल्म का प्याला नहीं थमाता, बल्कि शऊर ओ आगही का ज़ौक़ अता करता है। वह बच्चों को इज़हार ए ख़याल का हुनर देता है — और साथ ख़ामोशी के वक़ार का दरस भी।
वह उनके क़लम को अलफ़ाज़ से भर देता है — मगर साथ दिल को एहसासात की रौशनी भी अता करता है।
कभी वह बस इतना कहता है:"तुम में सलाहियत है, बस ख़ुद पर एतमाद रखो!"
और यही एक जुमला किसी मुतज़लज़िल वजूद को एक पुरअज़्म क़ाइद में तब्दील कर देता है।
उस्ताद के रोज़मर्रा के छोटे छोटे अफ़आल जैसे तमाम तलबा को बराबरी का मौक़ा देना, किसी को तज़हीक का निशाना न बनने देना, या किसी ग़लती पर डांटने के बजाए शफ़क़त से राहनुमाई करना। दरअसल वह ख़ामोश बीज होते हैं जो बच्चों के बातिन में इज़्ज़त, हौसला, बर्दाश्त और मसावात जैसे औसाफ़ की नशोनुमा करते हैं।
दुनिया के हर अज़ीम मुफ़क्किर, मुसलिह और रहनुमा के पस ए पर्दा एक उस्ताद की ख़ामोश तरबियत कारफ़रमा होती है। वह उस्ताद जो कभी दरख़्तों के साए में इल्म बांटता है, तो कभी किसी गांव के मटियाले कमरे में अफ़कार ए अज़ीम की आबियारी करता है।
आज जब मुआशरा अख़लाक़ी ज़वाल, फ़िक्री तअस्सुब, और बे सब्री जैसे बुहरानों से दोचार है, तो ऐसे माहौल में उस्ताद वह रौशन चराग़ है जो ज़ेहनों को जला, दिलों को वुसअत, और रवैयों को शाएस्तगी अता करता है।
हमें उस्ताद को महज़ "तालिमी निगरान" नहीं, बल्कि "किरदार का मेयारी नमूना" समझना होगा।
क्योंकि उस्ताद सिर्फ़ निसाब नहीं पढ़ाता — वह तो इंसान को ज़िंदगी की ज़बान, रवैये का वक़ार, और वजूद का मानी सिखाता है।
अगर तुम ने ज़िंदगी में कभी सच बोलने का हौसला किया हो, सब्र की चादर ओढ़ी हो, या किसी को माफ़ करने का ज़र्फ पैदा किया हो, तो यक़ीनन इस की कहीं न कहीं जड़ें एक उस्ताद के दर्द मंद दिल और संजीदा तरबियत में पैवस्त होंगी।