दलील के बिना बात पर अमल न करें!


यूट्यूबर्स, ब्लॉगर्स, और मोटिवेशनल स्पीकर्स पर अंधा विश्वास ज्ञान नहीं, अज्ञानता है!


आज हम एक ऐसे दौर में जिंदा हैं जहां हर हाथ में मोबाइल, हर आंख के सामने स्क्रीन, और हर दिल में "वायरल" होने का शौक है। ज्ञान, फहम, तहकीक और সনদ की बुनियाद पर बात सुनने और कहने का चलन कम होता जा रहा है, और इसकी जगह जज्बात, अंदाज़-ए-बयान और शोहरत ने ले ली है।


याद रखिए!

दीन जज्बात का नहीं, ज्ञान और दलील का नाम है।

और जब दीन का मामला हो, तो वहां सच्चाई का दारोमदार सिर्फ दो चीजों पर होता है:


1. সনদ (Authenticity)


2. दलील (Evidence)


आज का अलमिया


हजारों लोग सोशल मीडिया पर दीनी बातें करते नजर आते हैं:


कोई खुद को "इस्लामी मोटिवेशनल स्पीकर" कहता है


कोई "कुरान स्कॉलर" कहलाता है


कोई "रूहानी मुआलिज", "फिक्र-ए-उम्मत का दाई" या "अवामी खादिम" के उनवान से आता है


लेकिन...

न उनके पास किसी मुस्तनद इदारे से इल्म-ए-दीन की সনদ है

न उनकी बातों पर किसी आलिम-ए-रब्बानी की मोहर-ए-तस्दीक है

न वो फिकही उसूल से वाकिफ हैं, और न शरीयत के दायरे में बात करते हैं


इसके बावजूद उनके वीडियोज लाखों लोगों तक पहुंचते हैं, और लोग उन पर एतमाद कर के अपनी जिंदगी के बड़े फैसले करते हैं — अकाईद बदलते हैं, इबादतों में बिगाड़ आता है, और शरीयत से दूरी पैदा हो जाती है।


कुरान की हिदायत:


अल्लाह ताला ने फरमाया:


> قُلْ هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ

कहो: अगर तुम सच्चे हो तो अपनी दलील पेश करो! (अल-अंबिया: 24)


यही इस्लाम का उसूल है:


दलील के बगैर कोई बात कुबूल न करो!


*उम्मत की जिम्मेदारी:*


आज हर सुनने और सीखने वाले पर फर्ज है कि:*


1. जो बात सुने, उसके हवाले का मुतालबा करे


2. बात करने वाले की इल्मी असनाद (Qualifications) पर गौर करे


3. किसी मामले में शरई रहनुमाई दरकार हो तो मुफ्तीयान-ए-किराम, उलमा-ए-हक, और मुस्तनद इदारों की तरफ रुजू करे


4. हर मोटिवेशनल स्पीकर, जज्बाती मुकर्रिर, और मीठे अल्फाज वाले ब्लॉगर पर फौरन एतमाद न करे

*सुनने से पहले तस्दीक, अमल से पहले तहकीक:*


किसी भी वीडियो, पोस्ट, या बयान से मुतास्सिर हो कर:


दीन में नई बात शामिल न करें


पुरानी बात छोड़ न दें


किसी पर फतवा न लगाएं


किसी को काफिर या गुमराह न कहें


और अपनी आखिरत को ऐसे गैरजिम्मेदार लोगों के हवाले न करें जिन्हें खुद अपनी दीनी हालत का भी पता नहीं


* सही रास्ता क्या है?


दीनी मसाइल के लिए मुफ्तीयान-ए-किराम से रुजू करें


कुरान व सुन्नत की बात किसी माहिर व সনদ याफ्ता आलिम से सीखें


सोशल मीडिया पर सिर्फ अहले-इल्म की तस्दीक शुदा मजलिस व दुरूस देखें


"इल्म" को "उसूल" पर तरजीह दें


और "मशहूर होने वाले" को नहीं बल्कि "हक पर चलने वाले" को फॉलो करें


दलील के बगैर बात पर अमल करना, दीन का मजाक है।

गैर मुस्तनद अफराद से दीन लेना, दीन को जाया करना है।

सनद के बगैर फतवे देना, गुमराह की दावत है।


याद रखें:

इस्लाम सिर्फ वही है जो रसूल अल्लाह ﷺ से सही সনদ के साथ हम तक पहुंचा है।

इसमें इख्तरा, तखय्युल, जज्बात या यूट्यूब की तरमीम की कोई गुंजाइश नहीं!


अपने दीन को महफूज रखना चाहते हैं?

तो सिर्फ कुरान, हदीस और अहले सुन्नत के मुस्तनद उलमा की पैरवी करें।


अपनी आखिरत को बचाना चाहते हैं?

तो दलील के बगैर किसी बात पर अमल न करें — ख्वाह कहने वाला जितना भी फसीह, दिलकश या मशहूर हो!