बिन्त अबुल खैर आज़मीؔ

इन्सानी ज़िंदगी का हुस्न और उसकी हक़ीक़ी मअनवियत दरअसल क़द्र शनासी में मुज़्मिर है। क़द्र वो आला सिफ़त है जो इंसान को अख़लाक़ी बुलंदी अता करती है और उसे शराफ़त, मुहब्बत और इंसानियत के आला मदारिज तक पहुँचाती है। जब इंसान अपने अर्दगिर्द मौजूद नेमतों, रिश्तों और इंसानों की क़द्र करना सीख लेता है तो उसकी ज़िंदगी में सुकून, मुहब्बत और बाहमी एहतराम की फ़ज़ा क़ायम हो जाती है। लेकिन अफ़सोस कि अक्सर इंसान इस हक़ीक़त को उस वक़्त समझता है जब वो उन क़ीमती चीज़ों से महरूम हो चुका होता है।

क़द्र दरअसल शऊर-ए-क़ल्ब और बेदारी-ए-ज़मीर का नाम है। ये वो एहसास है जो इंसान को इस बात पर आमादा करता है कि वो दूसरों की मुहब्बत, ख़ुलूस और क़ुर्बानी को समझ सके और उसका एतराफ़ करे। जो शख़्स क़द्र करना जानता है वो दरअसल इंसानियत के आला अख़लाक़ी मेयार पर फ़ाइज़ होता है। इसके बरअक्स जो शख़्स बेक़दरी का मुर्तकिब होता है वो न सिर्फ़ दूसरों के दिलों को मजरूह करता है बल्कि ख़ुद भी अख़लाक़ी पस्ती का शिकार हो जाता है।

ज़िंदगी में हमें बेशुमार नेमतें अता होती हैं: वालिदैन की शफ़क़त, दोस्तों की रफ़ाक़त, असातज़ा की रहनुमाई, और मुख़लिस इंसानों की मुहब्बत। ये सब वो क़ीमती तोहफ़े हैं जिनकी क़द्र करना हर साहिब-ए-शऊर इंसान का फ़र्ज़ है। वालिदैन वो हस्तियाँ हैं जिनकी मुहब्बत बे-लौस और बे-मिसाल होती है। उनकी क़ुर्बानियाँ और दुआएँ इंसान की ज़िंदगी को कामयाबी और बरकत से हमकिनार करती हैं। इसी तरह असातज़ा की रहनुमाई और मेहनत इंसान के फ़िक्री उफ़ुक़ को रोशन करती है। अगर इंसान इन अज़ीम हस्तियों की क़द्र न करे तो ये उसकी सबसे बड़ी अख़लाक़ी कोताही शुमार होती है।

क़द्र शनासी सिर्फ़ इंसानों तक महदूद नहीं बल्कि ज़िंदगी की हर नेमत पर मुहीत है। सेहत, वक़्त, इल्म और अमन जैसी नेमतें ऐसी बेश बहा दौलत हैं जिनकी क़द्र करना ज़रूरी है। वक़्त एक ऐसा ख़ज़ाना है जो एक बार गुज़र जाए तो वापस नहीं आता। इसी तरह सेहत भी एक अज़ीम नेमत है जिसकी अहमियत अक्सर लोग बीमारी के वक़्त समझते हैं। लिहाज़ा एक दानिशमंद इंसान वही है जो इन नेमतों की क़द्र बरो वक़्त करे और उनसे भरपूर फ़ायदा उठाए।

बदक़िस्मती से मौजूदा दौर में मादियत और खुदगर्ज़ी के बढ़ते हुए रुझानत ने क़द्र शनासी के जज़्बे को कमज़ोर कर दिया है। लोग मुफ़ादात की बुनियाद पर ताल्लुक़ात क़ायम करते हैं और जब मुफ़ाद ख़त्म हो जाए तो रिश्तों की अहमियत भी मानद पड़ जाती है। यही रवैया मुआशरती बे-हिसी और अख़लाक़ी ज़वाल का बाइस बनता है। अगर मुआशरे में क़द्र शनासी का जज़्बा फ़रोग़ पाए तो मुहब्बत, एतमाद और उख़ुवत की फ़ज़ा क़ायम हो सकती है।

दरहक़ीक़त क़द्र करने वाला इंसान दूसरों के दिलों में एहतराम और मुहब्बत की जगह बना लेता है। उसकी शख़्सियत में कशिश और वक़ार पैदा हो जाता है क्योंकि वो दूसरों के एहसासात का एहतराम करता है। ऐसे अफ़राद मुआशरे में मुसबत तब्दीली का ज़रिया बनते हैं और लोगों के लिए मिसाल बन जाते हैं।

आख़िर में ये कहना बेजा न होगा कि क़द्र शनासी इंसानी अज़मत की बुनियाद है। जो शख़्स क़द्र करना सीख लेता है वो ज़िंदगी के हक़ीक़ी हुस्न से आश्ना हो जाता है। हमें चाहिए कि हम अपने वालिदैन, असातज़ा, दोस्तों और हर उस नेमत की क़द्र करें जो हमें मयस्सर है। क्योंकि हक़ीक़त यही है कि क़द्र हमेशा उस वक़्त समझ आती है जब चीज़ें हाथ से निकल जाती हैं। लिहाज़ा दानिशमंदी इसी में है कि हम वक़्त रहते हुए क़द्र करना सीखें और अपने अख़लाक़ और किरदार को इस आला सिफ़त से मुज़य्यन करें।