मस्जिदों को आबाद करें
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लेख:
तूफ़ान अहमरी
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आज हमारी आबादी कितनी है, और नमाज़ पढ़ने वालों की तादाद कितनी है?
हालांकि कुरान मजीद में अल्लाह ताला ने क्या खूबसूरत इरशाद फरमाया:
(वأن المساجدلله فلاتدعو مع اللہ أحدا)
और आप अलैहिस्सलातो वस्सलाम का इरशाद है जिसका मफहूम है:
"जिसने अल्लाह के लिए मस्जिद बनाई, अल्लाह उसके लिए जन्नत में घर बनाएंगे"
मस्जिद नमाज़ के लिए बनाई जाती है, और यकीनन एक मोमिन का दिल हर वक्त मस्जिद के लिए बेताब रहता है।
नबी अलैहिस्सलातो वस्सलाम का इरशाद मुबारक है जिसका मफहूम है:
"मोमिन मस्जिद में ऐसे खुश रहता है, जैसे मछली पानी में"
जैसे मछली पानी से बाहर तड़पती रहती है, मोमिन बंदा भी मस्जिद से बाहर ऐसे ही मस्जिद आने के लिए तड़पता रहता है, उसे सुकून और इतमिनान मस्जिद ही में मिलता है,
अफसोस की बात तो यह है कि हमारी मस्जिदों में से चंद मस्जिदें कुफ्फार के कब्जे में हैं।
जैसा कि बाबरी मस्जिद,
मस्जिद कुरतुबा, मस्जिद अक्सा।
हम इन मस्जिदों की एक-एक ईंट के बदले जान देने की बजाए हमने तो नमाज़ से ही गफलत बरतनी शुरू कर दी, आज आप देख लें, मस्जिदें वीरान हैं,
आज हमारी करोड़ों में आबादी है, मगर नमाज़ी मफकूद।
जब मैंने सहाबा इकराम का कुरान मजीद से शगफ, नमाज़ में, खुशु व खुजू का आलम देखा, फिर एक नजर उम्मत पर डाली तो यकीन जानिए, मैंने अहले गजा को सहाबा इकराम के नक्शेकदम पर चलते हुए देखा। जिन्होंने न सिर्फ मस्जिद से मोहब्बत का हक अदा किया, बल्कि उम्मत को बदर व खंदक और उहद की याद भी दिलाई।
जहां उन्होंने "मस्जिद अक्सा" के जख्मों पर मरहम रखा, अपने जख्मों से चूर बदन के साथ सजदा करके जिस्म से माजूर होने के बावजूद नमाज़ अदा करके जहां यह अहले गजा के लिए आखिरत का जखीरा है, वहीं उम्मत के लिए मस्जिद से मोहब्बत का, दीन से उल्फत का एक सबक है।
आइए हम अहले गजा की तरह अहले अजीमत तो नहीं हैं, मगर अहले गजा की तरह नमाज़ी तो बन सकते हैं।
इंशा अल्लाह एक दिन जब मस्जिद-ए-अक्सा आजाद होगी, तो हम इस काबिल तो हों कि हमने नमाज़ से मोहब्बत आपके बासियों से सीखी।
शायद कि हमारी इसी निस्बत से बरोजे महशर हमें भी कुद्स के मुहाफिजों में शुमार कर लिया जाए।