بسم اللہ الرحمن الرحیم
اما بعد
قارئین حضرات
यह एक बहुत ही संक्षिप्त, शक्तिशाली और गहरे अर्थ की दुआ है जो हज़रत नूह अलैहिस्सलाम से मनसूब है।
رَبِّ اِنِّىْ مَغْلُوْبٌ فَانْتَصِرْ
हिंदी अनुवाद: "ऐ मेरे रब! मैं मग़लूब हो चुका हूँ, पस तू मेरी मदद फ़रमा (या बदला ले)।"
यह दुआ एक ऐसा नुक्ता पेश करती है जहाँ एक इंसान अपनी तमाम तर कोशिशों के बाद सिर्फ़ अल्लाह की ताक़त और नुसरत पर भरोसा करता है।
मैं मग़लूब हो चुका हूँ
यह सिर्फ़ एक जुमला नहीं, यह शदीद थकावट का इक़रार है। यह वह लम्हा है जब इंसान अपने हाथों से अपने बाज़ू नीचे गिरा देता है। "या अल्लाह! मैंने अपनी नौकरी बचाने की पूरी कोशिश की, मैंने अपने रिश्ते को टूटने से बचाने की हर तदबीर की, मैंने बीमारी के ख़िलाफ़ हर मुमकिन जद्दोजहद की... मगर नतीजा सिफ़र रहा। मुझ में अब लड़ने की हिम्मत बाक़ी नहीं रही। मेरा ज़ेहनी, जज़्बाती और माद्दी ज़ख़ीरा ख़ाली हो चुका है।
नूह अलैहिस्सलाम की तरह, हम भी अपने वसाइल और तदबीरों पर भरोसा करते हैं। जब हमारे बनाए गए तमाम प्लान A, B, और C नाकाम हो जाते हैं, तो हम इस सच्चाई को क़बूल करते हैं कि हमारी ताक़तें बहुत महदूद हैं। यह खुद को कमतर समझना नहीं, बल्कि अल्लाह को सबसे बड़ा समझना है। यह नफ़सियाती सुकून का पहला क़दम है: ज़िम्मेदारी का बोझ अपने कमज़ोर कंधों से हटा कर उसे कायनात के मालिक के सुपुर्द कर देना।
“रब" का लफ़्ज़ तमाम तर रस्मी पुकार से पाक होता है। यह वह पुकार है जो बच्चा रोते हुए माँ को देता है। यह किसी इदारे के सरबराह को ख़त नहीं, यह अपने सबसे क़रीबी, सबसे ताक़तवर सहारे को दिल की गहराई से पुकारना है। "आप मेरा ख़ालिक़ हैं, आप मेरी कमज़ोरी से वाक़िफ़ हैं, आप ही जानते हैं कि यह जद्दोजहद कितनी मुश्किल थी, और आप ही जानते हैं कि मेरे इरादे नेक थे।
यह दुआ नूह अलैहिस्सलाम की रस्मी दुआ से ज़्यादा आख़िरी उम्मीद की पुकार है। यह उस शख्स के लिए है जो:
सब्र से थक चुका है।
तन्हाई और बेबसी महसूस कर रहा है।
अब अपनी तक़दीर सिर्फ़ अल्लाह के हाथ में देना चाहता है।
यह दुआ हमें सिखाती है कि हार मानना कोई कमज़ोरी नहीं, बल्कि यह पहचानना कि हमेशा कोई है जो हमारे लिए लड़ने को तैयार है, यह सबसे बड़ी ताक़त है।